अजब तेरी सरकार के सेट पर रीना रॉय

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मायापुरी अंक 4.1974

इस बार रीनारॉय से मेरी मुलाकात ‘अजब तेरी सरकार’ के सैट पर हुई जहां रीनारॉय किसी सरकारी मेहमान की तरह बैठी हुई थी। बिल्कुल नही लगता था कि वह एक एक्ट्रेस है। लगता था कि वह कोई कॉलेज में पढ़ने वाली लड़की है जो गलती से किताबें घर भूलकर शूटिंग में चली आई हो।

लोगों ने ‘जरूरत’ की नायिका को समझने की जरूरत के बजाय रीनारॉय को ज्यादा जरूरी समझा और उसे ‘जरूरत गर्ल का टाइटिल दे दिया। वह लड़की जो जरूरत के लिए अपनी पहली फिल्म में जिस्म का सहारा लिया ? मैंने रीना से स्पष्ट पूछा।

‘जी नही, रीना ने गम्भीरता पूर्वक कहा। ‘पहली बात तो यह कि ‘जरूरत’ मेरी पहली फिल्म नही है। मेरी पहली फिल्म है ‘नई दुनिया नये लोग’ जो लेट हो गई है। दूसरी बात यह है कि मैंने सफलता के लिए किसी भी तरह का कोई समझौता नही किया। ‘जरूरत’ की मजबूर नायिका को जो करना चाहिए वही मैंने किया। ठीक उसी तरह जिस तरह ‘दस्तक’ की नायिका या ‘पाकीजा’ की नायिका करती है। फर्क इतना रहा कि मैंने रियालिटी के लिए अपनी कला के साथ अपना जिस्म भी फिल्म को दे दिया। क्योंकि कला भी जिस्म में ही रहती है. या जिस्म भी कला का एक पार्ट है। लेकिन जब फिल्म रिलीज हुई तो दर्शकों ने सिर्फ मेरा जिस्म देखा, कला नही ! कला देखने वाले लोग कम निकले !

रीना का यह कहना उसकी नजर में काफी सीमा तक ठीक है. क्योंकि उस समय वह वास्तव में एक ऐसी स्टेज पर थी कि इशारा साहब को ‘जरूरत के रोमांटिक दृश्यों के लिए मिठाई के डिब्बे मंगवाने पड़े।

‘अब तुम मिठाई की तरफ देखती रहों, जैसे हीरो मिठाई की जगह पर है।’

रीना के मुंह में पानी भर आता, आंखों में एक चमक और फिर लगता कि रीना रोमांटिक एक्सप्रेशन सीखने लगी है। यह इशारा जैसे निर्देशक का ही बूता था कि उसने एक ऐसी लड़की में भी जिन्दगी के इस खास हिस्से को जगा दिया जो अब तक रीना के भीतर सोया पड़ा था। यहां तक कि हाल में सोने वाले दर्शक भी जाग-जागकर पर्दे पर देखते थे। यूं फिल्म में डैनी भी था लेकिन उसका रोल देखकर तो जागते दर्शक भी सो गए। लेकिन जहां-जहां रीना पर्दे पर आती वे जाग जाते।

‘क्या आप अब भी रियलिटी के लिए फिल्मों को अपना जिस्म सौंपने को तैयार है ?’ ‘यस, सच्ची बात तो यह है कि अब कैमरे के सामने काम करते समय मैं इस कदर खो जाती हूं कि लगता ही नही मेरा कोई जिस्म भी है। उसका पता तो तब चलता है, जब शाम को शूटिंग से थकी टूटी घर लौटती हूं। यूं भी मैं समझती हूं वह आर्टिस्ट क्या जो काम करते समय अपनी पर्सनेलिटी को याद रखे।

‘आप ज्यादातर किस तरह के रोल पसंद करती है?

‘जिन्हें देखकर खुद ‘किस’ कर लेने को मन करे। मुझे वे रोल्स ज्यादा अच्छे लगते है जिनमें मैं सिर्फ ‘शोकेस’ की मॉडल न महसूस होऊ। सबसे बड़ा रोल तो वह होता है जो आर्टिस्ट को ‘सैल्फ सेटिस्फैक्शन दे सके।

आपको अभी तक कोई ऐसा रोल मिला है जो आपको ‘सैल्फ सैटिस्फैक्शन (आत्मसंतोष) दे सके ? हां, कई एक है। एक फिल्म है ‘वरदान इस फिल्म में अपने रोल को भी मैं एक वरदान समझती हूं इसके अलावा एक फिल्म है ‘नागिन’ जिसमें मैं टाइटिल रोल कर रही हूं। इस फिल्म में कई बड़े-बड़े कलाकारों के साथ काम करने का खूबसूरत मौका मिल रहा है। ताहिर हुसैन की फिल्म ‘जख्मी में भी मेरी भूमिका दर्शक भुला नही सकेंगे।

वास्तव में रीना एक ऐसी अभिनेत्री है जिसमें अभिनय की पूरी-पूरी क्षमताएं है लेकिन शर्त सिर्फ यह है कि हमारे निर्माता उसके जिस्म में सैक्स ढूंढने की बजाय कला ढूंढने की कोशिश करें।

लेकिन हमारे निर्माताओं को क्या कहें जो जिस्म में कला की बजाय सिर्फ सैक्स की तलाश करते है। क्योंकि वे समझते है यही एक बेचने को चीज फिल्मों में है।


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Mayapuri

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