ऋषिकेश मुखर्जी का अलग स्टाइल है

1 min


mukharjee_600x450

 

मायापुरी अंक 9.1974

हिन्दी फिल्मों के सामान्य प्रबुद्ध दर्शक का यह हमेशा दुर्भाग्य रहा है कि उसकी जरूरत को, उसकी रुचि को फिल्मकार कभी समझ नही सका। हां, हिन्दी फिल्मों की दुनिया में अवश्य एक नाम ऐसा है, जो शुरू से लेकर अब तक ऐसी सुन्दर कला-फिल्में बनाने में लगा हुआ है, जो दर्शको में अच्छी फिल्मों के लिए रुचि पैदा करने का काम कर रही है. उस फिल्मकार का नाम है ऋषिकेश मुखर्जी !

फिल्म-सम्पादक के रूप में ऋषिकेश फिल्मों के साथ बहुत पहले से जुड़े हुए है> पर निर्देशक के रूप में पहली फिल्म 1957 में आई थी मुसाफिर यह एक प्रयोगात्मक फिल्म थी। फिल्म में तीने अलग कहानियां थी जो क्रमश मानव जीवन के तीन महत्वपूर्ण पहलुओं जन्म, विवाह और मृत्यु को लेकर चलती है। तीन कथाओं में विभाजित होने पर भी फिल्म एक कड़ी में बंधी हुई थी। उस समय के चोटी के कलाकारों दिलीप कुमार किशोर कुमार, निरूपाराय और ऊषा किरण ने इस फिल्म में अभिनय किया था।

उसकी पहली फिल्म होने के बावजूद ‘मुसाफिर’ ऋषिकेश की श्रेष्ठ कलाकृतियों में गिनी जाती है।

1959 में ऋषिकेश की ‘अनाड़ी प्रदर्शित हुई। जिसमें राजकपूर हीरो थे। फिल्म में एक वृद्ध ईसाई महिला के स्नेह और प्यार को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया था। ललिता-पवार से ईसाई महिला के रूप में ऋषिकेश ने इस फिल्म में एक अविस्मरणीय भूमिका अभिनीत करवाई थी। अगले वर्ष यानि 1960 में निर्माता-निर्देशक के रूप में ऋषि ने अनुराधा का निर्माण किया, जिसे उस वर्ष का श्रेष्ठ कथा चित्र का राष्ट्रपति पुरस्कार मिला। फिल्म में अपने पेशे में व्यस्त एक ऐसे व्यक्ति की पत्नी की कहानी है, जो अपने अकेलेपने से जूझते हुए भी कभी पति से शिकायत नही करती। पति को प्रसन्न करने के लिए वह अपने एकमात्र प्रिय शौक संगीत को भी छोड़ देती है।

अपनी चरित्र प्रधान फिल्म ‘मेम दीदी में ऋषिदा ने विभिन्न चरित्रों को लेकर उनके मनोवैज्ञानिक रूप को बखूबी उभारा था। मेंम दीदी हिन्दी की पहली फिल्म थी जिसमें चरित्र भूमिकाओं की प्रधानता के बावजूद भरपूर मनोरंजन था। निर्देशक ने डेविड, जयनत और ललिता पवार से इतना सुन्दर काम लिया था कि दर्शक बरबस वाह’ कह उठे।

हालांकि 1964 में गुरुदत्त और मीना कुमारी को लेकर ऋषिदा ने सांझ और सवेरा’ का निर्माण किया। एक बार फिर उसे प्रशंसा मिला ‘अनुप्रमा’ से। ‘मुसाफिर’ ‘अनुराधा’ और ‘अनुपमा’ के बाद ‘सत्यकाम’ ही ऋषि की श्रेष्ठ कृति थी।

ऋषिकेश की हर फिल्म श्रेष्ठ ही रही हो, ऐसी बात नही। कई बार उस ने भी बॉक्स ऑफिस के साथ समझौता किया। ’दो-दिल, ‘असली-नकली’ ‘बुड्ढा मिल गया’ मंझली दीदी और ‘बीवी और मकान ऋषि की ऐसी ही फिल्में है, पर उन दिनों बनने वाली फिल्मों के मुकाबले में तो वह निश्चय ही सुरुचिपूर्ण फिल्में थी। ऋषिकेश में एक मौलिकता है और वह जो भी फिल्म बनाता है उसमें अपनी छाप छोड़ ही देता है।

सातवें दशक में ऋषिकेश, जो फिल्म इंडस्ट्री में ऋषि दा के नाम से जाने जाते है, अब तक पांच फिल्में दे चुके है। पहली ‘आनंद’ निश्चय ही इस दशक की श्रेष्ठ फिल्मों में से एक है। इस फिल्म के माध्यम से ऋषि ने पहली बार अमिताभ-बच्चन को एक अच्छा रोल देकर उसे दर्शकों से परिचित करवाय। जया भादुड़ी को भी पहला अवसर उसने ही फिल्म ‘गुड्डी में दिया। फिल्म के माध्यम से निर्देशक ने केवल नायिका का ही नही लाखों ऐसे दर्शकों का भी जो फिल्म नगरी को केवल ग्लैमर की दुनिया समझ बैठे है, तिलिस्म तोड़ा है,

‘बावर्ची का नायक ‘आनन्द’ का ही दूसरा रूप था। जो हर घर में खुशियां बांटता फिरता है। किस प्रकार एक संयुक्त परिवार को वह टूटने से बचाता है ऋषिकेश की नमक हराम’ हालांकि ‘बैकेट पर आधारित थी, पर कथा को भारतीय परिवेश में ढालकर बहुत अच्छे ढंग से प्रस्तुत किया गया था। मालिक-मजदूर आंदोलन की अन्दरूनी बातों को उसने गहराई से समझा और फिल्माया था।

ऋषिकेश ने हिन्दी फिल्मों को नई दिशा दी है, कलात्मक फिल्मों के लिए जमीन तैयार की है। बिमल रॉय स्कूल के छात्र के रूप में उसने न केवल बिमल रॉय की परम्पराओं को आगे बढ़ाया है, बल्कि उसमें नये सन्दर्भ जोड़े है।


Like it? Share with your friends!

Mayapuri

अपने दोस्तों के साथ शेयर कीजिये