एक ऐसा शख्स जो यादों, किस्सों और निशानी में बदल गया- मेहदी हसन

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गुलज़ार एक ऐसे आदमी है जिनकी शब्दों और दोस्तों के साथ ऐसी दोस्ती है कि उनके दोस्तों ने उन्हें किसी भी मौके और हालातों में झुकने नहीं दिया। लेकिन एक ऐसा समय था जब उनके दोस्तों ने उन्हें धोखा दिया था और उन्हें अपने दोस्तों को ढूंढने के लिए संघर्ष करना पड़ा था और एक पल के लिए तो वह अपनी बनाई हुई दुनिया में कई खो गए थे। इस बार उनके दोस्त कुछ इस प्रकार के मूड में है। उन्हें एक शताब्दी के मशहूर गज़ल गायक मेहदी हसन के निधन पर बोलना पड़ा। गुलज़ार ने छत की तरफ देखा, अपनी आँखों को मला, नाक को सुनका और कुछ समय तक कुछ नहीं कहा, लेकिन उन्होंने अपने दोस्तों पर भरोसा नहीं छोड़ा और जब वह उनके पास आए तो वह सभी उनकी मदद करने के लिए एक टीम बनाकर आए। उन्होंने गज़ल की दुनिया में मेहदी हसन के महान योगदान की बात कहीं। आगे बिना कुछ कहे उन्होंने अपने दोस्तों के साथ मेहदी हसन के जाने पर अपनी भावनाओं को व्यक्त किया। वह बोलते रहे…

आँखों को वीज़ा नहीं लगता
सपनों की सरहद होती नहीं
बन्द आँखों से रोज़ मैं सरहद पार चला जाता हूँ मिलने ‘मेहदी हसन’ से!
सुनता हूँ उनकी आवाज़ को चोट लगी है
और गज़ल खामोश है सामने बैठी हुई
कांप रहे हैं होंठ गज़ल के!
फिर भी उन आँखों का लहजा बदला नहीं-
जब कहते हैं….
सूख गये हैं फूल किताबों में
यार ‘फराज़’ भी बिछड़ गये हैं, शायद मिलें वो खवाबों में!
बन्द आँखों से अकसर सरहद पार चला जाता हूँ मैं!
आँखों को वीज़ा नहीं लगता
सपनों की सरहद, कोई नहीं!!

गुलज़ार को मीडिया के अलग अलग सेक्शन से उनके रिएक्शन के लिए गुज़ारिश आने लगी और गुलज़ार ने सोचा कि कैसे कोई अलग अलग लोगों को एक ही महान आदमी, जो इस दुनिया को छोड़ कर चला गया है, के प्रति अपनी अलग अलग प्रतिक्रिया दे सकता है। उन्होंने ऊपर लिखी पंक्तियों के साथ गज़ल के मास्टर को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

दूसरी जगह मनोज कुमार ‘गज़ल के शहंशाह’ को याद करते हुए मेहदी हसन साहब के साथ लाहौर में हुई अपनी अनेक मुलाकातों को याद कर रहे थे। उन्होंने मेहदी हसन के साथ दिल्ली एयरपोर्ट पर हुई खास मीटिंग को याद किया जिसमें उनके साथ युवा म्यूजि़क डायरेक्टर लक्ष्मीकांत भी थे। उन्होंने जावेद अख्तर साहब के घर हुई महफिल को याद किया जहाँ मेहदी हसन ने शहंशाह की तरह राज़ किया था। मनोज उदास थे क्योंकि वह आदमी महान होने के बावजूद भी बहुत साधारण मनुष्य थे, जो आखिरी मौके तक दोस्त थे।

धर्मेन्द्र, जो कनाडा में थे, को जब मेहदी हसन साहब के निधन के बारे में पता चला तो उन्होंने मेरे फोन का जवाब देते हुए दर्द भरी आवाज़ में कहा, ‘गज़लों का जहान चला गया, अब कौन उनकी जगह लेगा, कहाँ हो गुलाम अली साहब, अभी तुम्ही संभाल सकते हो उनका तख्त।’

खय्याम, जो मेहदी हसन साहब के समकालीन व्यक्ति थे, ने उनके साथ बिताए अच्छे समय को याद किया और कैसे मेहदी साहब को पता होता था कि वह अपनी फिल्म के लिए कौन सा संगीत तैयार कर रहे है। आखिरी बार मेहदी साहब ने उनसे फिल्म ‘कभी कभी’ के संगीत के बारे में बात की थी और वह उस बात को लेकर जिज्ञासू थे कि क्यों खय्याम ने शीर्षक गाने के लिए मौहम्मद रफी को ना चुनकर मुकेश को गाना गाने के लिए चुना। और कैसे (खय्याम) ने उन्हें मनाया कि उन्होंने मुकेश को क्यों चुना। यह दोनों हमेशा एक दूसरे के संपर्क में रहते थे और खय्याम को मेहदी हसन के साथ हुई हर मीटिंग याद थी क्योंकि जैसा वह कहते है कि उनके लिए मास्टर को मिलना
एक पाठ था क्योंकि वह महान गज़ल गायक के अलावा एक अध्यापक थे।

हरिहरण, नई पीढ़ी के गज़ल गायक ने उन्हें ‘गज़ल का विश्वविद्यालय’ बताया और फिर उन्होंने इस कथन को बदलते हुए ‘गज़लों का स्मारक’ कहा। हरिहरण को यकीन था कि जो गज़ल भारत से वंछित होती जा रही थी, उसे मेहदी साहब ने तब जिंदा किया जब पहली बार सन् 1978 में वह भारत आए और उन्होंने हर घर में गज़ल को जिंदा किया। उनके आने पर बड़े सितारें (रेखा उनकी सबसे बड़ी प्रशंसक थी), दिलीप कुमार ने अपने बंगले में कई मेहफिलों का आयोजन किया जिसमें अच्छा खाना, पीना और बहुत अच्छी गज़लों का आदान प्रदान किया गया। इसके बाद गज़ल गायकों जैसे पंकज उदास, हरिहरन, तलत अजीज़, अनूप जलोटा, पीनाज़ मसानी ने एक नई मुहिम शुरू की।

मेहदी हसन को सबसे बड़ी श्रद्धांजलि भारत रत्ना लता मंगेश्कर ने दी, जिन्होंने उनके पांच सितारा होटल में फोन करके कहा, ‘भगवान की आवाज़’, इस महान श्रद्धांजलि से बेहतर मेहद° हसन साहब के लिए क्या श्रद्धांजलि होगी।
बहुत लोग यकीन करते है कि यह मास्टर कहीं नहीं गया है, सिर्फ उनके शरीर ने हमें छोड़ा है और यह हर उस शख्स के साथ होता है जिसका जन्म होता है। लेकिन कुछ लोगों का जन्म हमेशा जि़ंदा रहने के लिए होता है। वह अपनी यादों, अपने काम और अपने जीने के अंदाज़, लोगों की जि़ंदगियां बदलने के बाद सबके दिलों में हमेशा जिंदा रहते है। एक मेहद° हसन कहीं हज़ारों साल में एक बार आते हैं और रहते हैं दिलों में हमेशा हमेशा के लिये…यही हमारी उम्मीद हैं…

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Mayapuri