एक कवि की आवाज जो कल भी सच थी, और आज भी बहुत ज्यादा सच है

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एक सच्चा कवि उस समय यहां तक की हर समय के लिए एक आवाज है जो वह लिखते हैं। एक सच्चा कवि लोगों और देश और यहां तक की दुनिया की भावना, प्रेम, दोस्ती, शांति और समृद्धि का एक कवि है। एक सच्चा कवि एक फिलॉसफर, गाइड और भगवान और मनुष्य के बीच का भी एक ऐम्बेसडर होता है, यदि कवि वास्तव में एक अच्छा कवि हो जो सत्य और सच्चाई का अनुसंधान करता हो। – अली पीटर जॉन

भारत और यहाँ के लोगों को कुछ महान कवियों के साथ रहने का सौभाग्य मिला है। एकमात्र समस्या यह है कि उनमें से कुछ को सभी मान्यता और प्रसिद्धि मिली है और कुछ को नहीं मिली जिन्होंने जीवन पर अच्छी कविता लिखी हैं। और निश्चित रूप से कवि प्रदीप उनमें से एक रहे हैं।

जो हिंदी कविता और हिंदी फिल्मों के गीतों के बारे में कुछ भी जानते हैं, उन्हें पता चल जाएगा कि प्रदीप वह कवि है जिसने ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ गीत बनाया था। जिसे सुन भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू नई दिल्ली के लाल किला मैदान में खुलकर रो पड़े थे और लता मंगेशकर ने अपनी आवाज से इस गीत को अमर बना दिया था।

कवि प्रदीप को उनके सरल लेकिन सार्थक गीतों के लिए भी जाना जाता है, जैसे ‘देख तेरे संसार की हालत क्या हो गयी भगवान, कितना बदल गया इन्सान’, ‘हम लाए है कश्ती तूफानों से निकाल के, इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के’, “ये दुनिया गोल है” और अन्य।
मैंने भारत और भारतीयों के बदलते मामले के लिए देशभक्ति और चिंता के उनके सभी गीत सुने थे। इंडियन एक्सप्रेस का मैनेजमेंट चाहता था कि मैं कंपनी के थीम सॉन्ग के रूप में एक स्पेशल प्रेयर लिखूँ। लेकिन उन्होंने (प्रदीप) मुझे साफ तौर पर इसे लिखने से इन्कार कर दिया था और कहा कि उन्होंने जो लिखा उसकी किसी को कोई परवाह नहीं है। मैं उन्हें मनाता रहा और उन्होंने कहा, “मैं आपके लिए चाहिए तो लिख सकता हूँ, लेकिन मैं ऐसे लोगों के लिए क्यों लिखंू जिनको ना मेरी कदर है ना मेरी कविता की कदर है” वह अपने सिद्धांतों के साथ खडे रहे और मुझे कवि और गीतकार अंजान द्वारा लिखा गया भजन मिला, जो कवि प्रदीप के शिष्य थे और मैं केवल उस अनुभवी कवि के कुछ गीतों के साथ जी सकता था।

मुझे वायरस के द्वारा कुछ भी देखने के लिए मजबूर किया गया है जो मुझे सोचने या अतीत में वापस जाने और भावनात्मक होने के लिए मजबूर कर सकता है जो कभी मुझे हंसाता है और कभी मुझे रुला देता है और कभी-कभी अतीत में गुम कर देता है।

आज सुबह जब मैं बिना मन से उठा, मेरे दोस्त नितिन आनंद ने मुझे एक ऑडियो भेजा था, जिसमें कवि प्रदीप की तस्वीर थी जो कवि और देशभक्ति के संयोजन की तरह लग रही थी, जो आज के हमारे खोखले देशभक्तों की तरह नहीं हैं, बल्कि एक सच्चे देशभक्त हैं। और फिर मैंने कवि प्रदीप से लगभग 50 साल पहले देश के मामलों की स्थिति के बारे में अपनी कुछ सबसे दिल को छू लेने वाली पंक्तियाँ को सुना, और मैंने उन पंक्तियों के बीच एक अलौकिक समानता देखी जो कवि ने वर्षों पहले लिखी थी और आज हम जिस दुनिया और देश में रह रहे हैं से मिलती है। क्या कवि प्रदीप आने वाले वर्षों और समय में क्या कुछ होगा इसकी भविष्यवाणी कर रहे थे? कवि प्रदीप द्वारा लिखी गई पंक्तियों को बहुत ध्यान से पढ़ें और आप इसकी आग और यहां तक कि अपने दिल, आत्मा और मन में चिंता की आशंकाओं को महसूस कर सकेंगे। आपके लिए यह जानना भी एक परीक्षा होगी कि क्या आप इन दिनों में एक देशभक्त है, जब यह जानने के लिए एक खतरनाक संघर्ष हो रहा है कि कौन एक देशभक्त है और कौन एक देशद्रोही है।

आज के इंसान को ये क्या हो गया
किसका पुराना प्यार कहाँ पर खो गया
कैसी ये मनहूस घड़ी है
भाईयों में जंग छिड़ी है
कही पे खून कही पर ज्वाला
जाने क्या है होने वाला
सबका माथा आज झुका है
आजादी का जुलूस रुका है
चारों ओर दाग ही दाग है
हर चुरे पर खून लगा है
आज दुखी है जनता सारी
रोते हैं लाखों नर नारी
रोते हैं आँगन गलियारे
रोते आज मोहल्ले सारे
रोती सलमा सोती है सीता
रोती है कुरान और गीता
आज हिमालय चिल्लाता है
कहां पुराना वो नाता है
डस लिया सारे देश को जहरी नागों ने
घर को लगा दी आग घर के चिरागों ने
अपना देश वो देश था भाई
लाखों बार मुसीबत आयी
इंसानों ने जान गवाई
पर बहनों की लाज बचाई
लेकिन अब वो बात कहां है
अब तो केवल घाट यहाँ है
चल रही है उल्टी हवायें
काँप रही थर-थर अबलायें
आज हर एक आँचल को है खतरा
आज हर एक घूँघट को है खतरा
खतरे में है लाज बहन की
खतरे में चुड़िया दुल्हन की
डरती है हर पावों की पायल
आज कहीं हो जाये न घायल
आज सलामत कोई न घर है
सबको लुट जाने का डर है
हमने अपने वतन को देखा
आदमी के पतन को देखा
आज तो बहनो पर भी हमला होता है
दूर किसी कोने में मजहब रोता है
किसके सर इल्जाम धरे हम
आज कहां फरियाद करे हम
करते हैं जो आज लड़ाई
सबके सब हैं अपने ही भाई
सबके सब हैं यहाँ अपराधी
हाय मोहब्बत सामने भुला दी
आज बहि जो खून की धारा
दोषी उसका समाज है सारा
सुनो जरा ओं सुनने वालो
आसमान पर नजर घुमा लो
एक गगन में करोडों तारे
रहते हैं हिलमिल कर सारे
कभी न वो आपस में लड़ते
कभी न देखा उनको झगड़ते
कभी नहीं वो चुर्रे चलाते
नहीं किसी का खून बहाते
लेकिन इस इंसान को देखो
धरती की संतान को देखो
कितना है ये हाय कमीना
इसने लाखों के सुख है छीने
की है इसने जो आज तबाही
देंगे उसकी मुखड़े गवाही
आपस की दुश्मनी का ये अंजाम हुआ
दुनिया हंसने लगी देश बदनाम हुआ
कैसा ये खतरे का पहाड़ है
आज हवाओं में भी जहर है
कही भी देखो बात यही है
हाय भयानक रात यही है
मौत के साये में हर घर है
कब क्या होगा किसे खबर है
बंद है खिड़की बंद है द्वारे
बैठे हैं सब डर के मारे
क्या होगा इन बेचारों का
क्या होगा इन लाचारों का
इनका सब कुछ खो सकता है
इनपे हमला हो सकता है
कोई रक्षक नजर नहीं आता
सोया है आकाश पे दाता
ये क्या हाल हुआ अपने संसार का
निकल रहा है आज जनाजा प्यार का।
मैं तब तो था नहीं जब आपने ये लिखा था, कविराज, लेकिन मुझे आपकी आत्मा की पुकार आज भी सुनाई देती है, मेरी ख्वाईश है कि आप की ये पंक्तियाँ सारे देश में और हर दिल में गूंजती रहे।


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Mayapuri

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