कारपोरेट्स फिल्मों को नुकसान पहुंचा रहे हैं : विनोद पांडे

1 min


chaloomovie-2009-3b

जिस तरह की फिल्में आजकल मल्टीप्लेक्स के दौर में बनाई जा रही हैं उससे कहीं बेहतर फिल्म विनोद पांडे ने 34 वर्ष पहले ही 1980 में बना दी थी। फिल्म स्टार्स के दबदबे वाले उस दौर में ‘एक बार फिर’ (1980) फिल्म विनोद पांडे ने सुरेश ओबेरॉय और दीप्ति नवल जैसे कलाकारों को लेकर बनाई थी, जिनकी बॉक्स ऑफिस वैल्यू खास नहीं थी। लेकिन विनोद पांडे के कुशल निर्देशन और दमदार कंटेंट के कारण फिल्म हिट रही। कोलकाता में फिल्म ने गोल्डन जुबिली और देश के कई शहरों में सिल्वर जुबिली बनाई। इसके बाद विनोद ने कई बेहतरीन विषय पर फिल्में बनाईं। बोल्ड सब्जेक्ट को लेकर उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। ब्रिटिश सरकार के लिए काम करने वाले विनोद ने कुछ विज्ञापन एजेंसी भी चलाई और फिल्मों का शौक उन्हें फिल्मी दुनिया में खींच लाया। पेश है विनोद पांडे से बातचीत के मुख्य अंश :

आप हमेशा समय से आगे के फिल्मकार रहे हैं। जिस तरह की फिल्में आज बन रही हैं वैसी आप वर्षों पूर्व बना चुके हैं। इस वक्त तो आप को लगातार फिल्में बनाना चाहिए?
हंसते हुए विनोद कहते हैं ‘समय से आगे होना खतरनाक है।’ फिर बात आगे बढ़ाते हुए बोलते हैं ‘मेरे दिमाग में कई आइडियाज हैं जिन्हें मैं फिल्म के रूप में परिवर्तित कर चुका हूं, लेकिन इस समय फिल्म इंडस्ट्री कॉरपोरेट ग्रुप्स के हाथों में आ गई है। इन्हें एमबीए कर मोटी तनख्वाह लेने वाले लोग चला रहे हैं जिन्हें फिल्म कला की कोई समझ नहीं है। फिल्म बनाना उनके लिए साबुन बनाने के समान है। लैपटॉप में भरे आंकड़ों के जरिये वे अजीबोगरीब तुलना कर निर्णय लेते हैं। अपनी नौकरी बचाने के लिए और अपने को सही साबित करने के लिए वे ऐसी फिल्मों पर पैसा लगाने से बचते हैं जिनमें कंटेंट महत्वपूर्ण होता है। छोटी फिल्मों पर इसका असर हो रहा है।

क्या आपको भी इस तरह के अनुभव हुए हैं?
अनुभव के आधार पर ही बोल रहा हूं। मैंने कुछ वर्ष पूर्व ‘चालू मूवी’ नामक फिल्म बनाई थी, जिसे रिलायंस वालों ने रिलीज ही नहीं होने दी। फिल्म में राजपाल यादव, सयाली भगत, शेखर सुमन जैसे कलाकार हैं।

रिलीज नहीं करने की वजह?
फिल्म के पूरा होते-होते राजपाल यादव की कुछ फिल्में बॉक्स ऑफिस पर असफल हो गईं। उनका मानना था कि अब ‘चालू’ को प्रदर्शित करने में कोई फायदा नहीं है। फिल्म की पब्लिसिटी में 5-6 करोड़ रुपये क्यों बरबाद किया जाए। रिलीज के पहले ही फिल्म का परिणाम उन्होंने तय कर लिया। मैंने उनसे कई बार इस बारे में बात की, लेकिन उनकी समझ में मेरी बात ही नहीं आती थी। वहां बैठे लोगों को इस बारे में कोई समझ नहीं थी। मेरी एक अच्छी-भली फिल्म दर्शकों के सामने ही नहीं आ पाई। यह पूरी तरह नासमझी भरा फैसला था। जब मैंने फिल्म शुरू की थी तो वे बेहद उत्साहित थे, लेकिन फिल्म के पूरे होते ही उनका रूख बदल गया। आखिरकार ऐसे माहौल में कोई फिल्म बनाना कैसे पसंद करेगा। सिर्फ सितारों से सज्जित फिल्मों के लिए ही जगह है। बिना सितारों के फिल्म बनाना और रिलीज करना बहुत कठिन हो गया है। यदि आप अपने दम पर फिल्म बनाते हैं तो इसे रिलीज करने में मल्टीप्लेक्सेस वालों की मिन्नतें करना होंगी। वे चाहेंगे तभी फिल्म रिलीज होगी। फिल्म इंडस्ट्री का रूख व्यावसायिक हुआ है, लेकिन इसे चलाने वाले लोगों की समझ पर मुझे शक है। कॉरपोरेट वर्ल्ड फिल्म जगत को नुकसान पहुंचा रहे हैं।

पुराने दौर में भी स्टुडियो का ही दबदबा था। क्या वह दौर फिर लौट आया है?
वह दौर ज्यादा अच्छा इसलिए था क्योंकि स्टुडियो मालिकों को फिल्म के बारे में बहुत अच्छी समझ थी।

किस तरह की फिल्म है ‘चालू’?
चालू में गहरी बात को हंसी-मजाक के जरिये पेश किया गया है। इसका ह्यूमर गजब का है। फिल्म में दिखाया गया है कि एक फिल्म निर्माता का अपने निर्देशक से झगड़ा हो जाता है और वह अपने स्पॉटबॉय को निर्देशक बना देता है। यह फिल्म अवैध तरीके से यू-ट्यूब पर डाउनलोड कर दी गई। मुझे एक दिन फोन आया कि आपकी फिल्म तो यू-ट्यूब पर है। यह सुन मैं दंग रह गया। इस फिल्म को ढेर सारे लोगों ने देखा है जो यह बात साबित करता है कि मेरी फिल्म को लोगों ने पसंद किया है। इसी तरह मेरी एक ओर अप्रदर्शित फिल्म ‘अकेली- ए लोनली वूमैन’ भी यू-ट्यूब पर है जिसे मैंने आर माधवन को लेकर बनाया था। यह फिल्म सेंसर बोर्ड को इतनी पसंद आई थी कि उन्होंने देखने के बाद मुझे बुलाया और कहा कि हम इस फिल्म को कहीं से भी कांट नहीं सकते हैं। आप ‘ए’ प्रमाण-पत्र ले लीजिए।

इस समय कौन सी फिल्म पर काम कर रहे हैं?
‘दिन के अंधेरे में’ नामक फिल्म बनाने की कोशिश कर रहा हूं। कॉरपोरेट्स की मदद नहीं चाहता, लेकिन मुझे भी उम्र के कारण लोन नहीं मिलता है। मैंने ज्यादातर फिल्में खुद के पैसे से बनाई है। मेरी पहली फिल्म के लिए लंदन स्थित एक बैंक मैनेजर ने मदद की थी। पहले वितरक भी जोखिम उठाते थे, लेकिन अब वैसी स्थिति नहीं है।

टीवी के लिए आपने ‘रिपोर्टर’ और ‘एअर होस्टेस’ जैसे धारावाहिक बनाए हैं। टीवी के जरिये भी आप अपना काम कर सकते हैं?
फिल्मों जैसी स्थिति टीवी की भी है।

आपकी फिल्मों में महिला-पुरुष के संबंध को काफी बारीकी से उकेरा गया है। थीम भी बोल्ड रही है। कोई खास वजह?
महिला-पुरुष संबंध बड़ा अनोखा है और इस पर बहुत कुछ बनाया जा सकता है। ‘एक बार फिर’ तथा ‘ये नजदीकियां’ बनाने के बाद मुझे लगा कि कुछ और बाकी रह गया है और मैंने ‘सच’ बनाई। ‘रेड स्वास्तिक’ भी महिला प्रधान फिल्म थी। ‘सींस’ भी मेरे दिल के करीब है। यश चोपड़ा जी से मेरे बेहतरीन संबंध रहे हैं। ‘सींस’ की स्क्रिप्ट उन्हें पसंद आई। पैसा भी उन्होंने लगाया, लेकिन रिलीज होते ही विवाद शुरू हो गए और मेरी फिल्म को सिनेमाघरों से उतारना पड़ा। इन दिनों किताब लिख अपनी क्रिएटिविटी को जारी रखा है। महावीर पब्लिकेशन ने मेरी किताब को जारी किया है। इसे पढ़ कर आपको लगेगा कि फिल्म देख रहे हैं। अच्छी बात यह है कि किताब लिखने के लिए मुझे किसी पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।

आप अपनी फिल्मों का रीमेक क्यों नहीं बनाते?
बना सकता हूं, लेकिन फिर मुझे फायनेंस के लिए चक्कर लगाना पड़ेंगे। मैं चमचागिरी नहीं कर सकता। आखिर आत्मसम्मान भी कोई चीज होती है।


Like it? Share with your friends!

Mayapuri

अपने दोस्तों के साथ शेयर कीजिये