तस्करी विदेशी फिल्मों की कथाओं की

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Loafer_1973

मायापुरी अंक 12.1974

चोरी या तस्करी शब्द न केवल व्यक्ति विशेष के लिए बल्कि देश के लिये भी घातक है मजबूरी में की गई चोरी के लिये कानून भी अपराधी के प्रति दया भावना से निर्णय देता है। लेकिन घर में हीरे-जवाहरातों का भंडार हो और दूसरे के घर में चोरी करने जाये, तो यह हरकत न केवल अनैतिक होगी। वरन अपराधी की गिरी हुई मानोवृत्ति का भी सबूत होगा यही हाल हमारे हिन्दी फिल्म-निर्माताओं का कहा जाता है। देश में 16-17 भाषाएं व उनके साहित्य मौजूद है। कई प्रकार की जातियां है। उनके रीति-रिवाज है। सम्पूर्ण भारत का आदि से लेकर अन्त तक स्वर्णिम इतिहास व साहित्य मौजूद है। इस देश की एक मिश्रित संस्कृति है जिस पर हमें गौरव है। परन्तु इतना सब कुछ होने के बावजूद हमारे हिन्दी फिल्म निर्मातागण का मस्तिष्क बिल्कुल कोरा कागज है या यों भी कहा जा सकता है कि उन्होंने (निर्मातागण) स्वयं को ही जन मानस से अलग कर रखा है। कल्पनाओँ व कहानियों के उस अपूर्व अम्बार को छोड़, जिसकी गिनती संसार की श्रेष्ठ कृतियों में होती है, विदेशी फिल्मों की व्यभिचार व अश्लील घटनाओं की तस्कारी करना, उनकी (विदेशी) संस्कृति व सभ्यता को बिना समझे हुए अश्लील व भोंडा बनाकर पेश करना। यही उनका उद्देश्य है। धन कमाने का गलत तरीका है। इसे, क्या गिरी हुई मनोवृति का प्रतीक नही कहा जा सकता ?

दरअसल हिन्दी फिल्म निर्माता यथार्थवादी कम है और पलायनवादी अधिक। मेहनत करके मिली आत्मिक शांति की अनुभूति व यथार्थ से वह कोसों दूर है। और फिर जब विदेशी फिल्म के रूप में पकी-पकायी खिचड़ी मिल रही है तो क्यों न मेहनत व सृजनशीलता से जो चुराया जाये नमूने के तौर पर जब किसी विदेशी फिल्म के चटपटे व गरमागरम मसाले को बम्बई की मेलपुरी में बदलना होता है तो उक्त फिल्म का एक विशेष प्रदर्शन यूनिट व समस्त कलाकारों के लिये आयोजित कर लिया गया। थोड़ी-बहुत औपचारिकता निभाने के लिये कुछेक दृश्यों, शाट्स, चरित्र चित्रण, परिस्थितियों आदि को बदल कर पटकथा तैयार करवा ली गई। संवाद भी लिख लिये गये। हालांकि सेट्स पर उनका कोई महत्व नही होता, क्योंकि कलाकार अपने संवाद स्वंय ही या फिर सेक्रेटरी से तैयार करवा लेते हैं। नतीजा यह होता है कि कलाकार ऐसी फिल्मों में अपनी मौलिकता को घास चरने के लिए छोड़कर सारी अक्ल इसी में खर्च कर देता है कि उक्त विदेशी फिल्म के कलाकार ने कैसे अभिनय किया था, धांसू डायलाग्स झाड़े थे। रही संगीत की बात तो सभी जानते है कि हमारे भारतीय संगीतकार देशी-विदेशी संगीत के मिश्रण से एक ऐसा अभूतपर्व ‘क्लासिकल म्यूजिक तैयार करते है कि बड़े-बड़े संगीतज्ञ सूरमा भी भौंचक्के हो, कानों में उंगलियां डाल कर जमीन पर सिर दे मारते है।

चूंकि अधिकांश निर्मातागण की प्रवृति व्यावसायिक होती है, अत: इन्हें ‘रिस्क’ ‘एडवेंचर’ ‘आर्ट’ आदि के नाम से सख्त चिढ़ है। घृणा-सी है। यों भी कहा जा सकता है कि इन्हें मालूम ही नही कि हर ‘विद्या की एक कला विद्यामान है, जिसके ज्ञान के अभाव में विद्या कभी पूर्ण नही कही जा सकती। अपूर्ण विद्या सदैव अर्थ का अनर्थ ही बनाती है। इन्हें यह भी नही मालूम कि जो घटना विदेशों में घटती है, आवश्यक नही कि भारत में भी उसी रूप में घटित हो। भारत व पश्चिमी देशों की संस्कृति, सभ्यता, नैतिक मूल्यों-मान्यताओं, रहन-सहन व सोचने-समझने के नजरिये में जमीन-आसमान का अंतर है। इस अंतर को बिना जाने व समझे विदेशी फिल्म की नकल करने का परिणाम यह होता है कि जिस विदेशी फिल्म का जब हिन्दी संस्करण तैयार होकर पर्दे पर प्रस्तुत होता है तो वह जन-जीवन की कहानी तो हो ही नही सकती, हां हास्यास्पद कला का प्रतीक जरूर बन जाता है। और पैसे व्यर्थ चले जाने के गम में दर्शक खोपड़ी अलग से पीटता है। जैसे एफ.सी. मेहरा की मनोरंजन’ जो इरमा ला दूस की प्रतिलिपि है। इस फिल्म की केवल कथा ही नही चुराई बल्कि कई दृश्य, संवाद व कलाकारों के ‘एक्शन तक ज्यों के त्यों रख लिये गये है। सैक्स की समस्या पश्चिम में उतनी गम्भीर नही जितनी कि भारत में है। लन्दन या न्यूयार्क की जनता के लिए ‘प्रास्टियूशन (वेश्यावृति) मनोरंजन का साधन हो सकता है, पर भारत मे इस समस्या से निदान पाने हेतु अध्ययन हो रहा है। जब मनोरंजन सेट पर थी तो एफ. सी. मेहार की ही खून-खून पर हॉलीवुड की एक फिल्म कम्पनी ने मुकदमा चला दिया, क्योंकि खून-खून’ अंग्रेजी फिल्म ‘डर्टी हेरी’ की ‘डर्टी कापी’ (गन्दी नकल) थी। श्री मेहरा ने तब तुरन्त ऐलान किया था कि ’मनोरंजन की कथावस्तु ‘इरमा ला दूस’ पर आधारित है। फिल्म के विज्ञापन तक में भी यही बात दोहरायी गयी। परन्तु फिल्म देखकर आश्चर्य हुआ कि ‘क्रेडिट’ में नही दिया गया था। पिछले दिनों जब ‘दि बोस्टन स्ट्रेंगलर’ की नकल पर शैतान’ बम्बई में प्रदर्शित हुई तो निर्माता की चोरी की कलई खुल गई। मुकदमे और बची हुई थोड़ी-बहुत साख को बचाने के लिए निर्माता ने तुरन्त सारे प्रिन्ट्स वापस मंगाये और एक की बजाय दो शत्रुघ्न सिन्हा डालकर फिल्म को दोबारा प्रदर्शित किया गया। ‘किस दि गर्ल एन्ड मेक देम डाई’ का खलनायक जिन्दा मनुष्यों को एक अमानुधिक विधि द्वारा मोम के पुतलों में बदल डालता है और उन्हें एक शीशे के जार में सजा लेता है। ‘गीता मेरा नाम’ में लेखक-निर्देशक ने उक्त दृश्यों को हूबहू फिल्माने में झिझक नही दिखाई थी ‘लोफर’ व ‘जगन’ में धर्मेन्द्र द्वारा हीरे व सोने की मछली चुराने के रोमांचक व साहसिक दृश्य निर्देशको की बुद्धि की रचना का नमूना नही थे बल्कि अंग्रेजी फिल्म ‘टोप कापी’ से ज्यों के त्यों उड़ा लिये गये थे।

निर्माता जब कभी थोड़ी-सी बुद्धि अपने पास रखते है तो किसी विदेशी फिल्म से ‘प्रेरणा’ भर लेकर चुराई कथा को भारतीय परिवेश में ढलवाने का परिश्रम भी करते है। चूंकि, पट कथाकारक व निर्देशक के दिमाग पर विदेशी भूत बुरी तरह से सवार रहता है, अत: वे कथा की गहराई को छूने में असफल रहते है। साथ ही फिल्म बॉक्स ऑफिस पर दर्शकों की भीड़ जमा करने में नाकामयाब रहती है। जैसे ‘छुपा रुस्तम’ (मेकनाज गोल्ड) यें गुलिस्तां हमारा’ (ब्रिजिस ऑन दि रिवर क्वाई), सुहाना सफर’ (रोमन हॉली डे) आदि ‘कम सेप्टेम्बर’ से ‘मेरे सनम बनाने वाले जी. पी. सिप्पी के सुपुत्र रमेश सिप्पी ‘ए मैन एण्ड ए वूमैन’ से ‘अन्दाज’ चुराकर लाये थे। इन्हीं पिता-पुत्र की जोड़ी ने हिन्दी की ही ‘राम और श्याम’ का स्त्री संस्करण ‘सीता और गीता’ बना डाला और अब ‘थ्री मस्कीटर्स’ का हिन्दी संस्करण शीघ्र ही तैयार करने जा रहे है।

हिन्दी में निर्मित ‘ब्रांड टाइप’ फिल्मों की असफलता का रहस्य भी अंग्रेजी फिल्मों की असफल नकल करना ही है। नकल करते वक्त सदैव इस बात का ख्याल रखा जाना चाहिए कि दर्शक को यह सोचने-समझने का अवसर न मिले कि जिस घटना पर आधारित फिल्म को वह देख रहा है। उक्त कभी घटित नही होती। होती भी है तो इस तरीके से नही। इयान फिलिंग, मेट हेल्स आदि के रोमांचक, जासूसी व सनसनी खेज उपन्यासों पर आधारित कथाओं पर बनी ‘ओल्ड फिंगर’ डा. नो, थाउंडर बाल, यू ओनली लिन ट्वाइस, फ्राम रशिया विद लव, दि साइलैंसर्स, दैट मैन इन इस्ताम्बुल, 117 मिशन ब्लैडी मैरी, कसौनी रायले, डा.पेनिक इन बैकांक, दि अन्डरसन टेप, आदि तमाम विदेशी फिल्मों की सफलता का रहस्य यही था कि उन फिल्मों की चुस्त पटकथा व तेज-तर्रार निर्देशन की वजह से पात्रों के एक्शन व घटना क्रम इस तेजी के साथ से आगे बढ़ता था कि दर्शक को यह सोचने का अवसर ही नही मिलता था कि बिल्ली की दूम में चूहा कब और कैसे घंटी बांध गया। हालांकि विदेशी लोग भी जानते है कि ऐसी बोड टाइप मार-धाड़ व घटनायें आम जीवन में घटित नही होती। लेकिन फिल्म का थिलिंग व तेज गति उन्हें सिनेमा भवन से भागने का मौका ही नही देती। परंतु। हिन्दी फिल्म-निर्देशक व पटकथाकार में ऐसी रचानत्मक प्रतिभा को दर्शाने की क्षमता ही नही है। कोई भी हिंदी की बोड मूवी उठा लीजिये। पंद्रह-सोलह रोलों में से दस रीलें तो अपनी हीरोइन को पटाने व फंसाने में खा जाता है। रही-सही पांच-छ: रीलों में एक-आध मिशन पूरा करने में और बाकी फिल्म के कार्टून की भेंट चढ़ जाती है।

हिन्दी की रहस्यात्मक फिल्मों की सफलता भी एक रहस्य है। रहस्य यह है कि निर्मातागण इतनी रहस्यात्मक व चतुराई भरे तरीके से फिल्में बनाते है कि फिल्म में दर्शक की उत्सुकता आखिर तक बनी रहे और किसी को यह कहने का अवसर न मिले कि ‘बीस साल बाद’ ‘गुमनाम’ व ‘कोहरा’ क्रमश दि टेन लिटिल नाईजर्स व टेबेक्का की नकल है। वास्तव में कोई नही कह सकता कि उक्त फिल्में नक्ल मात्र है। इसका कारण था निर्देशक-पटकथा कार की अपनी मौलिकता, विचार शक्ति व ग्रहण-शीलता अत: उन फिल्मकारों पर विदेशी फिल्मों से प्रेरणा की तस्करी का आरोप लगाया जा सकता है. जैसे इस मैदान में भी अधिकतर निर्माता धूल फांकते नजर आते है। जैसे बी. आर चोपड़ा जिनका 36 घंटे में ‘डिस्पैरेट हावर्स’ की चोरी रंगे हाथ पकड़ी गई। लेकिन ‘इन्विसीबल सिक्स को सबके सामने चुराने के बावजूद भी ‘खोटे सिक्के’ बाजार में खुले आम चले, बल्कि भागे वजह थी दर्शक की उत्सुकता को अन्त तक बरकरार रखना।

हिन्दी फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कुछ गिने-चुने निर्माता ही ऐसे है जिन्होंने बॉक्स ऑफिस खिड़की से धन बटोरने को कभी प्राथमिकता नही दी सदा लीक से हटकर चले।

सरकार ने उन्हें पुरस्कृत करके प्रोत्साहित किया। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि इन्हें भी नकल की तस्करी से बरी नही किया जा सकता। राज कपूर जैसे फिल्मकार ने मेरा नाम जोकर के प्रथम भाग को समर आफ फाटी टू से प्रेरित माना जा सकता है बॉबी के युगल प्रेमियों के प्यार दुलार के अंदाज ‘लव स्टोरी’ के थे। ‘आनन्द’ ‘परिचय’ ‘कोशिश’ व ‘नमक’ हराम’ पर आरोप है कि ये फिल्में क्रमश: ‘आइकुरू’ ‘साउन्ड आफ म्यूजिक’ हैप्पीनस ऑफ अस अलोन’ व दि बेकेट’ से काफी हद तक प्रभावित थी। ‘इम्तिहान’ को भी टू सर विद लव से प्ररित बताया गया है। उक्त फिल्मों के निर्माताओं में से कुछ ने इन आरोपों का खण्डन करते हुए कहा है कि उनकी फिल्मों की कथा का मूल भारत भूमि व उसकी संस्कृति के बीच में बसे लोगों के बीच में है। ‘परिचय’ की कथा आर. के. मित्रा की बंगला कथा उतरैन पर आधारित थी। लेकिन ये फिल्मकार इस बात से इंकार नही करते कि उक्त फिल्मों को देखने के पश्चात ही उनके दिमाग में ऐसी ही फिल्म बनाने के विचार ने जन्म लिया। इसी तरह का एक आरोप कुमार शाहानी पर भी है कि उनकी राष्ट्रपति पुरस्कार विजित फिल्म ‘मायादर्पण’ फ्रांसीसी फिल्म ‘उसे फेमी डूस से प्रभावित है। जबकि निर्माता के अनुसार उक्त फिल्म निर्मल वर्मा की कहानी से प्रेरित है। कुछ भी हो, जब चोरी का उद्देश्य निजी स्वार्थों की पूर्ति न हो, तो वह चोरी नही कहलाती। ठीक यही बात इन फिल्मों पर लागू होती है। क्योंकि आज के इस मारधाड़ व बलात्कार से भरी फिल्मों के युग में उक्त फिल्मों से ताजगी दी व राहत की सांस लेने का वातावरण तैयार करने का प्रयत्न तो किया।

कभी-कभी ऐसा भी होता है कि एक ही विदेशी फिल्म की नकल कई निर्माता एक साथ आरम्भ कर देते है। जैसे, ’जोशीला’ व एक नारी दो रूप’ की कथा में कुछ पात्रों को उलट दिया गया था। ‘जंजीर व ‘यादों की बारात’ शीन भी एक ही थी और मजे की बात यह कि उक्त दोनों फिल्मों को सलीम जावेद ने लिखा। इन सन्दर्भ में सलीम जावेद लिखित हाथ की सफाई’ व ‘यादों की बारात’ की शॉट भी एक कही जा सकती है, हालांकि हाथ क सफाई राजकपूर, शेख मुख्तायर अभिनीत ‘दो उस्ताद’ की नकल है। बताया जाता हैं कि रामदयाल की असफल फिल्म ‘दो नम्बर के अमीर’ भी एक विदेशी फिल्म से उड़ायी गयी है। इसके पहले यश चोपड़ा भी उन्हें ‘जमीर’ के नाम से हिन्दी एडीशन तैयार करवा रहे थे। लेकिन जब उन्हें पता चला कि ‘दो नम्बर के अमीर’ प्रर्शन के लिये तैयार है तो उन्होनें ‘जमीर’ की शूटिंग रोक दी। अंग्रेजी ‘गॉडफदर हिन्दी संस्करण फीरोज खान के निर्माण-निर्देशन में शीघ्र ही ‘धर्मात्मा’ के रूप में आ रहा है इसी तरह फिल्म इन्डस्ट्री में अंग्रेजी (फिल्मों की सत्य प्रतिलिपियां तेजी से तैयार हो रही हैं और अगर अब भी दर्शक जाग्रत न हुआ तो ये कथाओं की तस्कारी भी देश संस्कृति के लिये खतरा बन सकता हैं।

 


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Mayapuri

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