दिलीप कुमार एक लीजेण्ड हीरो

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dilip

 

मायापुरी अंक 9.1974

बान्द्रा क्रासिंग पर रैड लाइट होने की वजह से मैंने गाड़ी रोक दी। मेरे बराबर ही एक गाड़ी आकर रूकी इससे पहले कि मैं अच्छी तरह देख सकूं कौन बैठा है, ग्रीन सिग्नल हो गया और वह गाड़ी और वह गाड़ी तेजी से निकल गई। लेकिन उस आदमी को पहचानना कोई मुश्किल काम न था। उसकी बिखरी हुई जुल्फें और बैठने के अन्दाज से ही मैं पहचान गया कि कौन था-वह था दिलीप कुमार।

मैं सोचने लगा आज इन्डस्ट्री में कौन ऐसा हीरो है जो इस आदमी की जगह नही लेना चाहता। यहां तक कितनों ने इस आदमी की नकल करके नाम कमाया है। मुझे आज भी अच्छी तरह याद है फिल्मालय स्टडियो में राजेश खन्ना, अन्जू महेन्द्र के गले में बाहें डाले, देब्बू मुखर्जी वगैरह के साथ दिलीप कुमार की पिक्चरें देखा करता था।

कुछ समय पहले की बात है। श्री साउन्ड स्टूडियो में एक शूटिंग चल रही थी नवीन निश्चल, इसमत चुगताई (लेखिका गर्म हवा) और मैं मेकअप रूम में बैठे गप-शप कर रहे थे इतने में दरवाजा खटखटाने के बाद दिलीप कुमार अन्दर आयें। पता चला कि कुछ चन्दा इकट्ठा करने के सिलसिले में आये है।

इसमें चुगताई ने छेड़ते हुए कहा, “भई यूसूफ मैनें सुना था तुम लीजेण्ड बन गये हो लेकिन तुम तो दो हाथ-पाव वाले आदमी हो दिखाई दे रहे हो !

दिलीप कुमार खिसयानी हंसी हंसे और बोले, “आपा ! आप भी खूब बनाती है, भला मैं क्या चीज हू.”

नवीन से पांच सौ रुपये लेकर चलने लगे तो मैं और नवीन उन्हें बाहर गाड़ी तक छोड़नें आये। बाहर कुछ स्टूडियो के मजदूर काम कर रहे थे। वह सब दिलीप कुमार के सम्मान में उठ खड़े हुए और नमस्ते करने लगे। सबको नमस्ते का जवाब देते हुए दिलीप कुमार अपनी गाड़ी में बैठ गये।

वापसी पर नवीन से न रहा गया “यह हुई न बात ! यार मजा तो तब है कि आदमी इस पॉजीशन पर पहुंच जायें। हम साले रोज स्टूडियो आते है मगर कभी स्टूडियो को कोई वर्कर खड़ा होकर सलाम नही मारता और वह अपने ख्यालों में खो गया।

सपना अच्छा है……!


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Mayapuri

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