फिल्मी दुनिया अजीब मायाजाल

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मायापुरी अंक 9.1974

हमारी फिल्मी दुनिया भी एक अजीब मायाजाल है। यहां कुछ तो बरसों से आगे आने की कोशिश में पीछे ही रह गए है, क्योंकि उन्हें किसी ने सहारा नही दिया, किसी ने उनके भीतर छुपी प्रतिभा को पहचानने की कोशिश नही की। उनके दौर में पुराने अभिनेता-अभिनत्रियों का इतना प्रभाव था, कि नए आने वालों में प्रतिभा होने के बावजूद कोई भी फिल्मकार उन्हें अवसर प्रदान कर रिस्क लेने के पक्ष में कतई नही था। वे पुराने के ही साथ डूबने व तैरने में विश्वास करते थे। लेकिन आज स्थितियां बदल गई है, सभी कुछ विस्तृत होता जा रहा है। पहले कुछ गिने चुने लोग ही फिल्मोद्योग में अधिपत्य जमाए हुए थे। पर आज इसके विपरीत फिल्मद्योग के हर क्षेत्र में नए लोगों को फलते-फलते देखा जा सकता है। अब ऐसा बहुत कम हो रहा है, कि प्रतिभा होने के बावजूद किसी का सितारा गर्दिश में रह जाए, बल्कि इस दौर में तो कुछ प्रतिभा शून्य माटी के माधो स्टार बने बैठे है।

एक समाचार है, ब्लेज फिल्म एंटरप्राइजेज की फिल्म ‘अंकुर’ को बर्लिन फिल्म महोत्सव के लिये चुन लिया गया है। निर्माता है मोहन जे। बिजलानी व फैनी वारिया-लेखक व निर्देशक है श्याम बेंगल मुख्य भूमिका फिल्म एण्ड टेलिविजन इंस्टीट्यूट की गोल्ड मैडलिस्ट स्नातिका शबाना आजमी ने अभिनीत की है।

इंस्टीट्यूट से आते ही वह निर्देशक कांतिलाल राठौड़ की फिल्म ‘परिणय’ की शूटिंग में व्यस्त हो गई। फिर उसे लेखक निर्देशक श्याम बैंगल ने अपनी फिल्म ‘अंकुर के लिए अनुबंधित कर लिया और फिर ख्वाजा अहमद अब्बास ने फासला’ के लिये फंसा लिया !

शबाना का जन्म बड़ी विकट परिस्थितियों में हैदराबाद मैं हुआ। गीतकरा कैफी आजमी को आर्थिक स्थिति उन दिनों दयनीय थी। वे और उनकी पत्नी शौकत दोनों ही आनेवाले बच्चे की परवरिश को लेकर चिंतित थे, पर आनेवाले को कौन रोक पाया है शबाना को आना था। वह आ गई।

उसकी किसी फिल्म का अभी शोर नही मचा था, कि उसने अपने इंस्टीट्यूट के साथी बेंजामिन से मंगनी कर ली। अभी थोड़ा ही अर्सा गुजरा था, कि न मालूम क्यों शबाना ने अपनी ही पसंद को ठुकरा दिया और खायतन फिल्मी धंधे की काशी बम्बई में शबाना को लेकर अफवाहों का बाजार गर्म हो गया हर पत्रिका अपने सीने में शबाना का स्कैडंल दबाए सिसक रही थी।

अंकुर की कहानी एक मजदूर महिला की अपनी कहानी है और इस कहानी ने भी शबाना की ही तरह हैदराबाद में जन्म लिया फिर शबाना ने उस महिला की कहानी को दोबारा से हैदराबाद में जीया। ‘अंकुर’ को लेखक निर्देशक श्याम बेंगल ने वास्तविकता के ज्यादा करीब रखने की खातिर हैदराबाद में ही फिल्माया और इस प्रकार हैदराबाद की उस महिला की कहानी शबाना को आत्मा में प्रवेश कर गई।


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Mayapuri

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