फिल्म द लास्ट राइट्स औरतों के हक के साथ कई मुद्दो पर बात करती है- आस्था वर्मा

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AasthaVerma

भारतीय पुरूष या महिला विष्व के किसी कोने में भी रहते हुए अपने कर्म को अंजाम दे रहा हो, मगर वह हमेशा खुद को अपनी जड़ों यानी कि मातृभूमि भारत से जोड़कर ही ख़ुशी महसूस करता है। इन दिनों कुछ लोग मिथ्या भाषण कर रहे हैं कि भारत की युवा पीढ़ी दूसरे देशों में जाकर काम करते हुए पूर्णरूपेण वहां की ही होकर रह जा रही है, जबकि यह सच नहीं है।

शान्तिस्वरुप त्रिपाठी

पिछले कुछ वर्षों से अमरीका में रह रही है, मगर उनका दिल आज भी भारत के लिए धड़कता है

AASHTHA VERMA

इसका सबसे बड़ा प्रमाण है युवा फिल्मकार आस्था वर्मा। मूलतः हरियाणा के करनाल यानी कि भारत निवासी आस्था वर्मा दुबई में काफी समय बिताने के बाद पिछले कुछ वर्षों से अमरीका के लास एजेंल्स में रह रही है, मगर उनका दिल आज भी भारत के लिए धड़कता है।

इसी के चलते उन्होने भारतीय औरतों  के हक की बात करने वाली लघु फिल्म ‘द लास्ट राइट्स’ का निर्माण, लेखन व निर्देषन किया है। उन्होंने इस फिल्म को भारतीय कलाकारों के संग वाराणसी के घाट पर फिल्माया है। उनकी यह फिल्म पूरे विश्व में शोहरत बटोर रही है।

सबसे पहले ‘‘मायापुरी’’ के पाठको को अपने बारे में बताएं?
मेरा जन्म 2 सितंबर 1996 को भारत में ही यानी कि करनाल, हरियाणा में हुआ था। मेरी माता इंदू और  पिता अनिल आज भी करनाल में ही रहते हैं। जन्म के कुछ साल बाद मैं दुबई शिफ्ट हो गईं थी, जहां मैंने हाईस्कूल की पढ़ाई पूरी की। फिर हेरिएट वाट यूके, स्कॉटलैंड यूनिवर्सिटी से एमबीए करके अमरीका के लॉस एंजिल्स का रुख किया।
सच कहॅूं तो मैंने इंटरनेशनल बिजनेस मैनेजमेंट में अपनी स्नातक की डिग्री प्राप्त की। फिर न्यूयार्क फिल्म इंस्टीट्यूट से मैंने फिल्म विधा की पढ़ाई की। जिससे मेरी समझ में आया कि एक परिप्रेक्ष्य था,जो कि गायब था। जिन विषयों पर मुझे जुनून था, वैसी फिल्में मैंने थिएटर में नहीं देखी। इसके अलावा मुझे फोटोग्राफी का भी शौक रहा है।
इसलिए एक समय मेरे मन में सवाल उठने लगा कि मैं एक से अधिक फ्रेम के साथ किस तरह  कहानियाँ कह पाऊंगी? इन दोनों कारकों के संयोजन ने मुझे लॉस एंजिल्स पहुंचाया। जहां न्यूयॉर्क फिल्म अकादमी से फिल्म मेकिंग में मास्टर डिग्री हासिल की।
फोटोग्राफी से फिल्म निर्देशन यह सब कैसे संभव हुआ?
यह सब एक मोटोरोला सेलफोन के साथ शुरू हुआ। मैंने दुबई में फोटोग्राफी का कोर्स किया था। उस वक्त मेरा मकसद अपने शौक के कौशल को बढ़ाना मात्र था। यह सब करते हुए मैंने इंटरनेशनल बिजनेस मैनेजमेंट में बैचलर्स और मास्टर्स की पढ़ाई पूरी की।
गर्मी की छुट्टियों में मैंने एक माह के लिए इंटर्नशिप ली। एक सप्ताह के लिए उस डेस्क पर सुबह नौ से शाम पांच बजे तक बैठने के बाद मुझे एहसास हुआ कि यह वह नहीं है, जो मैं करना चाहती हूं। फिर यह इंटर्नशिप जल्द ही मेरे शोध समय में बदल गया, फोटोग्राफी में मेरे मास्टर्स को आगे बढ़ाने के लिए विकल्पों की तलाश में।
मैं जो करना चाहती थी, उसे करने के लिए मेरे माता-पिता ने हमेशा मेरे सपनों का समर्थन किया। लॉस एंजिल्स में सिनेमा मेरे जीवन का हिस्सा बन गया। लेकिन अब मैं उन कहानियों को एक दृश्य आवाज देने के साथ खुद को चुनौती देती हूं,जिन पर मैं काम करती हूं।
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अब तक का संघर्ष?
मैं इसे संघर्ष की संज्ञा नही दॅूंगी। यह तो मेरे लिए एक चुनौती थी। फिल्म मेकिंग में मास्टर्स की डिग्री हासिल करने का मतलब था कि मुझे फिल्में बनाने का कुछ अनुभव होना चाहिए, जो कि मेरे पास बिल्कुल कोई नहीं था।
उस वक्त तक मैंने सिर्फ चित्रों की भाषा बोली थी। तो मैंने खरोंच से शुरूआत की. मेरे आस-पास के सभी लोगों में फिल्मों के प्रति गहरा जुनून था,जबकि वह हॉलीवुड निर्देशकों के सबसे बड़े नाम भी नहीं जानते थे।
मैंने स्वयं एक बिंदु पर फिल्म निर्देशन को लेकर खुद अपनी क्षमता पर सवाल उठाया था? लेकिन मैं जल्द ही इससे उबर गयी। मैंने दिमागी स्तर पर ख़ुद को हर चुनौती का सामना करने के लिए तैयार किया।
और अब मैं एक ऐसी कहानी बताने के लिए तैयार थी, जिसके बारे में मैं भावुक थी। मेरे अंतर्मन ने मुझसे कहा कि इस कहानी को कहने की जरूरत है। और फिर मैं निर्माण के अलावा लेखन व निर्देशन में कूद पड़ी।
पहले मैं अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर फिल्म निर्माण से जुड़ी। और मैने छोटी बड़ी चालीस लघु फिल्में बनायी होंगी,मगर हकीकत में मैने अब तक सिर्फ दो लघु फिल्मों  ‘‘द अनसंग फीदर’’ और ‘‘द लास्ट राइट्स’ का लेखन, निर्देशन और निर्माण किया है।
इन दोनों फिल्मों का निर्माण हमारी प्रोडक्शन कंपनी ‘साधविश फिल्म्स’ के बैनर तले हुआ है, जिसके निर्देशक मेरे पिता अनिल व माता इंदू जी हैं। मेरा मकसद अपनी फिल्मों के माध्यम से उन कहानियों को उजागर करना है, जो बताई जानी चाहिए, लेकिन दरवाजों और अनापेक्षित भावनाओं के पीछे छिपी हुई हैं।
 फिल्म ‘द लास्ट राइट्स’ क्या है?
हमारी फिल्म ‘द लास्ट राइट्स’ बेटियों के हक की बात करती है। दादी के देहांत के बाद बनारस के मणिकर्णिका घाट में उनकी पोती उनका संस्कार करना चाहती है, वहां उसे संस्कार तो दूर, श्मशान घाट में भी प्रवेश नहीं करने दिया जाता।
यह फिल्म बेटियों को भी अंतिम संस्कार का अधिकार सौंपने की वकालत करती है। हमारी फिल्म बेटियों के शोषण के खिलाफ आवाज उठाने का संदेश देती है, जिसे हमने बनारस में ही फिल्मायी है। वक्त आ गया है, जब बेटियों को भी वह तमाम अधिकार मिलें, जिनके बारे में उनका सोचना तक गुनाह माना जाता है।
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 फिल्म ‘द लास्ट राइट्स’ की कहानी क्या है?
यह कहानी विदेश में रहकर पढ़ाई कर रही काशी (कनुप्रिया शर्मा) की है। उसके पिता का देहांत काफी समय पहले हो चुका है। जब उसकी दादी का देहांत होता है, तो वह बनारस आती है। काशी अपनी दादी का सामान देखती है, तो उसमें एक पत्र मिलता है, जो काशी के नाम ही होता है। दादी की अंतिम इच्छा थी कि उसकी पोती काशी ही उसका अंतिम संस्कार करे।
अपनी दादी के अंतिम संस्कार के लिए उनके पार्थिव शरीर के साथ मणिकर्णिका घाट पर काशी पहुंच जाती है, मगर उसके अपने चाचा विष्णु (वेद थापर ) उसे रोकते हैं। तब वह अपनी दादी की उस चिट्ठी को पढ़कर सभी को सुनाती है।सभी भावुक हो जाते हैं। आंसुओं के साथ चाचा विष्णु अस्थि कलश को काशी के हवाले करते हैं।
फिल्म के लिए कलाकारों का चयन किस हिसाब से?
बहुत तकलीफ हुई, जबकि हम तीन कास्टिंग डायरक्टरों की मदद से अपनी इस फिल्म के लिए कलाकारों की तलाश कर रहे थे। हमारे पास एक सीमित बजट था। ऐसे में हमें ऐसे कलाकारों की तलाश थी, जो कि धन कमाने के लिए नहीं, बल्कि कला के लिए काम करना चाहें। और इस विषय को लेकर जिनके अंदर पैषन हो।
काफी तलाश करने यानी कि ऑडिशन आदि लेने के बाद हमने फिल्म की मुख्य प्रोटोगाॅनिस्ट काशी के किरदार के लिए ‘पिकू’ फेम कनुप्रिया शर्मा, विष्णु के किरदार के लिए ‘गली ब्वाॅय व ‘राजा और रंछो’ फेम वेद थापर, ज्योति के किरदार के लिए ‘लाखों में एक’ फेम अजिता कुलकर्णी, शांति के किरदार में ‘रामायण’ व ‘कपूर एंड संस’ फेम सुलक्षणा खत्री को चुना।
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फिल्म निर्माण के दौरान किस तरह की चुनौतियां सामने आयीं?
इस फिल्म को वाराणसी के घाट पर फिल्माना कम चुनौतीपूर्ण नहीं रहा। सबसे पहले जब हम प्री-प्रोडक्शन के दौरान अपनी टीम के साथ श्मशान घाट,जहां अंतिम संस्कार किया जाता है, यह वह स्थान है, जहां फिल्म का अंतिम दृश्य फिल्माया गया है। जब हम यहां पहुॅचे, तो हमारा कैमरा जब्त किया जा चुका था और हमें अपने साथ स्थानीय पुजारी के भाई को रखना पड़ा।
हमने उसकी चापलूसी करते हुए चारों तरफ का गहन निरीक्षण किया। हमने इस बारे में ध्यान दिया कि यह स्थान कैसा दिखता है। उस दिन हम मूल रूप से स्थान को फिल्माने के लिए कैमरे लेकर गए थे, जिसके बाद हम अपने कमरे में बैठकर उसका अध्ययन कर सकें, लेकिन हमारे कैमरे जब्त किए जा चुके थे। इसकी मूल वजह यह थी कि महिलाओं को श्मशान घाट में रहने की अनुमति नहीं है।
उस जगह महिलाओं के नाम पर मैं व हमारी प्रोडक्शन डिजाइनर थी,बाकी सभी पुरुष (जो क्रू का हिस्सा नहीं थे) थे। वह पुरूष विधर्मी के रूप में हमारी उपस्थिति मान रहे थे। ऐसे हालात में मेरे सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि हम अपनी फिल्म का फिल्मांकन महज यह देखने के लिए गए थे कि वास्तव में अंतिम संस्कार कैसे किए जाते हैं।
इससे परे कि किताबों में क्या लिखा गया है? सबसे बड़ी विडंबना यह थी कि मैं पुरूष व नारी असमानता के मुद्दे पर फिल्म बना रही थी, फिर भी मुझे शारीरिक रूप से घाट पर बिना एक चापलूस के रहने की अनुमति नहीं थी।
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आप इस फिल्म के माध्यम से क्या कहना चाहती हैं?
अंतिम संस्कार करने वाली युवती/लड़की  की कथा बयां कर मैं उन महिलाओं को आवाज देने का प्रयास किया है, जिन्हें उनके लिंग के चलते इस अधिकार से वंचित कर दिया गया अथवा उन्हें ऐसा करने पर जान से मारने की धमकी दी गई।
‘द लास्ट राइट्स’ कई ‘इंटरनेषनल फिल्म फेस्टिवल’ में जा चुकी है. किस तरह का रिस्पांस मिला?
यह फिल्म ‘टोपाज इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’में 8 सितंबर को वर्चुअल रिलीज हुई.टोपाज इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का हिस्सा बनने पर खुशी मिली। इसे वार्नर ब्रॉस स्टूडियो में प्राइवेट स्क्रीनिंग में अपार सराहना मिली 8 दिसंबर 2020 को फिल्म ‘द लास्ट राइट्स’ का यूरोपियन प्रीमियर फिल्म फेस्टिवल रीवर टू रीवर फ्लोरेंस इंडियन फिल्म फेस्टिवल’ में संपन्न हुआ।
फिल्म ‘द लास्ट राइट्स’ की स्क्रीनिंग अमेरिका, ब्रिटेन, आयरलैंड, कनाडा, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, नीदरलैंड, जर्मनी, फ्रांस व स्पेन में भी हुई।
हमें मिली जानकारी के अनुसार स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद से ही आप संगीत वीडियो के निर्माण में भी व्यस्त हैं?
संगीत वीडियो के निर्माण में हमें ‘एनवाय एफ ए’ के पूर्व छात्रों और अन्य पेशेवरों से बने दल के साथ काम करने का एक अद्भुत अनुभव मिला। हमने भारत के लोकप्रिय गायक दिलजीत दोसांझ आने वाले दूसरे गायकों के संगीत एलबम पर काम किया। यह हमारे लिए अद्भुत अनुभव रहा। हमने कोरोना महामारी में भी कुछ संगीत वीडियो बनाए। हम घर पर खाली बैठकर अपने सिर की पिटायी /धुनाई नहीं की।
The last RIght
अब तक के करियर मे आपने क्या सीखा?
मुझे सांस्कृतिक मूल्यों और मानवीय रिश्तों की कहानियों से भरी फिल्मों के साथ ही दूरदर्शी व पुरस्कार विजेता निर्देशक और लेखकों के साथ काम करने का सबसे बड़ा अवसर मिला। मुझे शुभम संजय शेवडे की फिल्म और जीत देसाई की फिल्म ‘वर्क फ्रॉम होम प्राइवेट लिमिटेड’ बनाने का अवसर मिला।
कोरोना काल के अनुभव?
कोराना काल में हमने सबसे बड़ा सबक करुणा और धैर्य के बारे में सीखा। कोविड 19 के चलते घर पर रहना लगभग एक प्रकार का शोधकार्य रहा। मसलन-आपके माता-पिता आपको एक कोने में रखते हैं। ऐसे में आप खुद तलाष कर सकते है कि आप कौन हैं, आपकी कला क्या है?
यह करुणा को भी सक्षम बनाता है, आपको उन लोगों की सराहना करने की अनुमति देता है जो आपके लिए हैं, और दूसरों के लिए हो सकते हैं। कोरोना महामारी के बुरे वक्त में हमें मानवीय जीवन का महत्व समझ में आया। यह सभी ऐसे सबक हैं, जो फिल्मों व इतिहास ने हमें सिखाए हैं।

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