फ्लॉप फिल्मों का ढेर

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Dilip Kumar

 

मायापुरी अंक 9.1974

‘लीडर’ अपने समय की एक चिरप्रतीक्षित फिल्म थी और इस में दिलीप व वैजंयती माला के साथ अनेक मशहूर कलाकारों ने काम किया था। फिल्म का डायरेक्शन अच्छा था और सैट्स महंगे थे। संगीत भी जानदार था और कई गीत प्रसिद्ध हुए थे। इस सब के बावजूद फिल्म टिकट की खिड़की पर बुरी तरह से असफल रही थी।

‘मेरा नाम जोकर’ राजकपूर की सबसे मंहगी फिल्म थी। इसे तीन भागों में बनाया गया था। प्रसिद्ध शो मैन ने अपनी सारी स्टंट बाजियां इस पर लगा दी थी। इसी फिल्म में, सिम्मी और पद्ममिनी के ऐसे नग्न रूप केदार शर्मा की चित्रलेखा में मेहताब पर फिल्माए गए नग्न स्नान दृश्य के बाद, पहली बार स्क्रीन पर दिखाए गए थे कि वातनुकूलित सिनेमा हाल में बैठे दर्शक को भी एक बार पसीना आ गया था। दो इंटरवलों वाली इस फिल्म की टिकट पहले दिन हर जगह जबरदस्त ब्लैक में बिकी थी. पर हुआ क्या ? प्रथम प्रदर्शन के तीसरे दिन ही इस फिल्म की टिकटे आधे दामों पर बिकी। यह फिल्म वर्ष बड़ी फ्लॉप रही।

‘प्रेम पुजारी’ निर्माता-नायक देव आनन्द की प्रथम निर्देशित फिल्म थी। इस में देव ने बहुत उमंगों के साथ, दिल खोल कर पैसा लगाया था। अपने समय की हिट हीरोइन वहीदा को साथ ले काफी काफी शूटिंग विदेशों में की थी। पर हुआ क्या ? वही ढाक के तीन पात। फिल्म ऐसी पिटी कि देव साहब भी एक बार पिटे मोहरों की लाइन में, राजेन्द्र कुमार के साथ आ खड़े हुए। (यह एक दूसरी बात है कि उन्हें इसके बाद ‘जानी मेरी नाम’ जैसी सुपर हिट पिक्चर मिल गई जिस के बूते पर वे आज भी टिके है.)

‘लीडर में दिलीप शुरू से आखिर तक छाया रहा। उसने अपने सामने किसी को भी अभिनय का मौका नही दिया। फिल्म देख कर ऐसा लगता था मानो फिल्म का नाम ‘लीडर’ न हो कर दिलीप हो। इस फिल्म में दिलीप ने कॉमेडी का काम कुछ इस तरह सम्भाला कि फिर वह खुद को सम्भालने लायक न रहा। दर्शकों को फिल्म में दिलीप के अभिनय के साथ हास्य तो मिला, परंतु वे अन्य तत्व न मिले जो फिल्म को हिट बनाते। दिलीप के हास्य ने फिल्म का संतुलन बिगाड़ दिया और दिलीप के इसी गलत कदम ने फिल्म को पिटा दिया।

‘मेरा नाम जोकर’ का पहला हिस्सा भी राजकपूर ने तीन टुकड़ो में बनाया। इस फिल्म में राज कपूर जीवन के विभिन्न सत्य दर्शाना चाहता था। यह एक बहुत ही अच्छा ख्याल था। परंतु उस से गलती यह हो गई कि उस ने तमाम सत्य अपने ही माध्यम से दर्शाने की चेष्टा की। वह फिल्म के दूसरे टुकड़े में ऐसे घुसा कि अंत तक नही निकला। सारी कहानी को अपने चारों और समेट लिया और यही से शुरू हो गए वे कारण जो फिल्म को फ्लॉप करते है।

‘प्रेम पुजारी’ के निर्माण में देव साहब ने बहुत मेहनत की थी। वैसे कई लोगों ने इस फिल्म के कई दृश्यों का मिलान विदेशी फिल्मों के दृश्यों से किया है। परंतु इस से फिल्म निर्माण में हुई मेहनत की महत्ता कम नही होती। पर एक कहावत है कि नई-नई मुसलमानी अल्लाह-अल्लाह कुछ ज्यादा ही कहती है, शायद कुछ ऐसा ही हाल देव साहब का भी इस फिल्म में हुआ। निर्माता-नायक के साथ निर्देशक का भार भी इन्होनें कुछ ऐसे सम्भाला कि सारी फिल्म लड़खड़ा गई। देव साहब ने अपनी प्रसिद्ध मुस्कुराहट को फिल्म के हर फ्रेम में दिखाने की कोशिश की, इस ने फिल्म की ‘जश्ने पिटाई में सोने पर सुहागे का काम किया।

कहने का मतलब यह नही कि नायक प्रधान फिल्में सदा ही पिटती है। किशोर कुमार की ‘भाई-भाई’ और ‘बापरे बाप’ अपने समय की हिट फिल्में थी। दिलीप की ‘राम और श्याम सुपर हिट रही। इसी फिल्म का स्त्रीकरण कर बनी फिल्म सीता और गीता’ खूब चली। इन सब फिल्मों में नायक (सीता और गीता में नायिका) प्रधान रहे। परन्तु इन की प्रधानता ने फिल्म का संतुलन नही बिगडने दिया। जिन फिल्मों की चर्चा हम ने पहले की थी। उन के हीरो भाइयों ने अपनी प्रधानता बनाए रखने के चक्कर में फिल्म का संतुलन बिगाड़ दिया और फिल्में पिट गई।


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Mayapuri

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