भारत की शान ‘शत्रुघ्न सिन्हा’ ने सबको किया ‘खामोश’

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इनकी जीभ को किसी पवित्र शक्ति या फिर किसी शक्तिशाली महान आत्मा ने छुआ हुआ है। इनकी जुबान इनके लिए हथियार है जिसे यह लड़ाई के समय या फिर शांति के समय इस्तेमाल करते है। इनकी जुबान में वह जादू है जिससे वह लोगों को जैसा चाहे, वैसे घुमा सकते है। उनका ब्रांड नाम ‘खामोश’ है लेकिन शायद ही उन्हें कभी खामोश देखा गया हो। उनके शब्द लोगों को आसमान को छूने के जैसे तारीफ करते है। उनके शब्दों में इतनी ताकत होती है कि वह गलत बात और चीज़ को टुकड़ों में काट सकें और उनको उस जगह भेज सके जहां से वह कभी वापिस न आ सके।

जब वह स्कूल में पढ़ते थे, तब उनके पास एक खास टैलेंट था। वह बिहार में युवाओं के लीडर थे। उनके इसी टैलेंट की वजह से एफटीआईआई में उनके साथ काम करने वाले लोग उन्हें बहुत होशियार छात्र मानते थे क्योंकि उनके डायलॉग बोलने का अंदाज़ बहुत शानदार था और इसी वजह से उन्हें हमेशा तारीफ मिलती थी और लोग उनके प्रशंसक बन जाते थे। वह कागज़ या किताब को सिर्फ एक बार पढ़ते थे और मुश्किल से मुश्किल लाइनों को आसानी से याद कर लेते थे और उस स्पीड में वह लाइनें पढ़ते थे, जिसे सुनकर हर कोई हैरान रह जाता था। वह अपने टैलेंट को लेकर आगे बढ़े और जब वह इंडस्ट्री में शामिल हुए तो वह सबसे पहले विलेन बन गए। जिस अंदाज़ और जादू से उन्होंने डायलॉग को दमदार तरीके से बोले, उससे वह घर में पहचाने जाने लगे। जब कभी हिंदी फिल्मों की बाते की जाती थी तो शत्रुघ्न सिन्हा की जुबान के बारे में सबसे ज़्यादा चर्चा की जाती थी। जब वह रोमांटिक हीरो बने, तब भी उनकी जुबान ने पहले की तरह जादू बिखेरा। लेकिन उनके लिए लिखे गए रोल उतने दमदार नहीं थे जितने इस हीरो को मिलने चाहिए थे।

फिर उनको सही जगह मिली जहां पर वह अपनी जुबान की शक्ति को पूरी अच्छी तरह से सबके सामने पेश कर सकते थे। वह राजनीति से जुड़े और भारतीय जनता पार्टी के सबसे चहेते नेता बन गए। वह अपने बात करने के अंदाज़ के कारण दर्शकों के बीच ज़्यादा लोकप्रिय हुए। उनके शब्द उनके दिल से निकलते थे और वह अपनी जुबान का इस्तेमाल बेहद मुश्किल आइडियों को आम लोगों के बीच बताने के लिए करते थे। उनमें अपनी पार्टी के लिए इलेक्शन कैंपेन के दौरान भीड़ को अपनी ओर आकर्षित करने की शक्ति थी। सिर्फ उन्हीं के पास एक स्पेशल हेलीकॉप्टर हुआ करता था जो उन्हें देश के ऐसे राज्यों में ले जाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था, जहां शायद ही कोई पहुंचता हो। वह उन राज्यों में लोगों के दिलों में अपनी छाप छोड़कर ही वापिस आते थे। जब उनकी पार्टी पावर में थी, तो वह सबसे उम्दा थे। उस समय उन्हें यूनियन नेता भी बनाया गया था। जब उनकी पार्टी को ज़बरदस्ती ओपोजिट पार्टी के सामने बैठने के लिए कहा गया तो वह अपनी पार्टी के बेस्ट रक्षक बने। जब शब्दों को उच्च तरीके से इस्तेमाल करने की ज़रूरत पड़ती तो शत्रुघ्न सिन्हा अपना सबसे उम्दा प्रदर्शन दिखाते। जहां उन्हें लगता था कि कुछ गलत है, तो वह अपने शब्दों से उस बात को गलत कहने की भी हिम्मत रखते थे। वह कुछ गिने चुने लोगों से उस आसानी से बात करते थे, जैसे वह अपने खुद के लोगों से बात करते थे।

उनके बोलने के टैलेंट को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देखा गया है। साल 2010 में उन्हें यूएन की जनरल असेंबली में बोलने के लिए चुना गया और वह वहां से विजेता बनकर वापिस आए। पिछले साल उन्हें दोबारा चुना गया। जो लोग शत्रुघ्न सिन्हा के करीब है, उनको पता है कि उन्हें इसलिए चुना गया था क्योंकि उनमें अंतर्राष्ट्रीय समारोह में अपनी बात का लोगों पर गहरा प्रभाव डालने का हुनर है। उन्हें विश्व में को-ओपरेटिव मूवमेंट के बारे में बोलने था। जो लोग पुराने शत्रु को जानते थे, वह सभी यह सोचकर हैरान थे कि कैसे जनता का यह आदमी इतने मुश्किल विषय पर बोल पाएगा। लेकिन शत्रु ने जो यूएन जनरल असेंबली में किया, वह किसी चमत्कार से कम नहीं था। वह ‘शत्रु भैया’ नहीं थे, और ना ही कोई राजनेता थे, जो अपनी जनता का दिल जीतने गए थे। वह थे माननीय शत्रुघ्न सिन्हा, जो भारत के एक बहुत लोकप्रिय राजनेता है जिनकी लोगों की नब्ज़ों पर और उनकी जि़ंदगी की ज़रूरतों पर पकड़ है। वह बोले और समारोह में मौजूद हर दिग्गज मेहमान ने उनकी बातों को बड़ी ध्यान से सुना। शत्रुघ्न सिन्हा को पता था कि वह किन लोगों से बात कर रहे है? उन्हें पता था कि वह कोई गलती नहीं कर सकते और अंत में उन्हें जिस तरह का परिणाम मिला, वह उन्हें बहुत कम बार मिला होगा। माननीय शत्रुघ्न सिन्हा ने भारत के लिए बोले गए अपने अंदाज़ से और सही शब्द को सही जगह पर सही ढंग से बोलकर हर भारतीय को गर्वित किया। मैं आपको उनके द्वारा बोला गया भाषण देता हूँ। फिर आप खुद फैसला कीजिए कि शत्रुघ्न सिन्हा को बोलने के लिए कोई ट्रेनिंग नहीं दी गई, बल्कि उन्होंने जन्म ही बोलने के लिए लिया है। तो पढि़ए कि सिन्हा साहब ने असेंबली में क्या कहा-

माननीय राष्ट्रपति जी

मैं आपका शुक्रगुजार हूँ कि आपने मुझे जनरल असेंबली में बोलने का मौका दिया। मेरे लिए यह सौभाग्य की बात है। हम सब यहां 2012 को अंतर्राष्ट्रीय सहकारी समितियों के वर्ष को मनाने के लिए इक्ट्ठा हुए है। यह बहुत उपयुक्त है कि युनाइटेड नेशन सामाजिक-आर्थिक उन्नति की एक प्रगतिशील मॉडल के रूप में जागरुकता फैला रहा है। अगर विश्व में सामाजिक बदलाव लाने, ग्राम विकास और आर्थिक उत्पादकता बढ़ाने के लिए सहकारी समितियों द्वारा निभाए गए किरदारों को देखा जाए, तो इस वैश्विक मान्यता को लंबे समय से अपेक्षित किया गया है। विकसित और विकासशील देशों में कई सामाजिक-आर्थिक संदर्भ के विकास में सहकारी समितियों को उल्लेखनीय सफलता मिली है। लेकिन अभी तक सामाजिक-आर्थिक संगठन को एक साधन के रूप में अपनी असली क्षमता को पूरी तरह से इस्तेमाल करना बाकी है, और वैश्विक विकास समुदाय द्वारा मॉडल को बेहतर समझा जाना बाकी है। अब तक वैश्विक विकास प्रवचन में इसकी जगह को सीमित किया गया है। वास्तव में, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विकास लक्ष्यों पर एमडीजी (मिलेनियम विकास लक्ष्य) सहित सहमत हुए लक्ष्यों का भी लोगों के केंद्रित विकास विकल्प की ओर ध्यान केंद्रित नहीं है।

माननीय राष्ट्रपति जी

कहते है कि हर संकट में अवसर होता है। आर्थिक झटकों के खिलाफ वित्तीय समावेशन के लिए, सामाजिक सुरक्षा के लिए बढ़ावा, छोटे और मध्यम उद्यमों और सीमांत किसानों को सशक्त बनाने के लिए मजबूत धक्के की आवश्यकता है। यह सामाजिक और आर्थिक कार्यवाही के लिए सहकारी समितियों के आगे एक व्यवहार्य विकल्प के रूप में खड़ा है। हमें पूरी तरह से स्थिति को भुनाने की ज़रूरत है। भारत हमेशा सहकारी समितियों के आंदोलन के लिए राज्य के अधिकारियों, युनाइटेड नेशन के सिस्टम, नागरिक समाज और प्राइवेट सेक्टर के समर्थक के लिए बुलाता है। यह समय पर होगा, क्योंकि वैश्विक समुदाय सतत विकास के लिए अगले साल होने वाले 10 से 20 सम्मेलन में अपनी प्रतिबद्धता को नवीनीकृत करने के लिए तैयारी में है। लोकप्रिय भागीदारी और नीचे की दृष्टिकोण पर आधारित सहकारी संरचना का विकेन्द्रीकृत प्रकृति स्थानीय कार्रवाई के लिए एक आदर्श मंच है। सहकारी समितियों ने हमेशा आर्थिक उत्पादकता, ग्रामीण विकास, सामाजिक सशक्तिकरण और सामंजस्य को बढ़ावा देने, गांवों के लिए विपणन चैनल खोलने और किसानों, उपभोक्ताओं और श्रमिकों को क्रेडिट और इनपुट सुनिश्चित करने में योगदान दिया है। विकसित और विकासशील देशों में राष्ट्रीय उन्नति में उनके उत्प्रेरक की भूमिका को अच्छी तरह से मान्यता मिली है।

माननीय राष्ट्रपति जी

भारत का सहकारियों के साथ अनुभव सफल रहा है। इस बात का जिक्र सेक्रेटरी जनरल ने अपनी रिपोर्ट में किया है। कहा गया है कि हमारे 70 प्रतिशत लोग खेती पर निर्भर है। हमारे सहकारी आंदोलन के लिए क्रेडिट और गैर क्रेडिट क्षेत्रों में कृषि के प्रति पूर्वाग्रह होने प्राकृतिक है। गरीबी उन्मूलन, समावेशी विकास, महिला सशक्तिकरण और आत्म निर्भरता के प्रति हमारी राष्ट्रीय प्राथमिकता भारतीय सहकारिता आंदोलन की बुनियादी बातों को बढ़ावा देती है। इस प्रक्रिया में हमने हमेशा हमारे राष्ट्रीय पिता, महात्मा गांधी से प्रेरणा ली है, जो अपने ग्राम स्वराज और ग्रामीण स्वतंत्रता के आइडिया में गांव क्षेत्र और सहकारी खेती को बीच में देखना चाहते थे।

भारत के सहकारी आंदोलन की सबसे खास विशेषता यह है कि राज्यों ने हमेशा इसके प्रति जागरुकता रखी है। हमें लगता है कि विकासशील राज्यों में इस प्रकार की जि़म्मेदारियां उसका हिस्सा है।

सहकारी भारत की सफेद क्रान्ति यानी दूध के उत्पादन की जीवन रेखा है और इसने भारत को विश्व में दूध का सबसे बड़ा उत्पादक बनाया है। दूध सहकारी भारत के सूखे राज्यों में सबसे सफल रहा। दूध सहकारी, अमूल आज भारत के हर घर में खास नाम है। इसके पदार्थ हर घर में उपलब्ध होते है। अमूल के पीछे, दूध मार्केटिंग फेडरेशन खड़ी है जिसमें 15,712 गांव है जिसमें 30 लाख दूध के उत्पादक है। रोज़ाना 12 मिलियन लीटर दूध इक्ट्ठा किया जाता है। हमारे राज्य बिहार, जो भगवान बुद्ध की धरती है, में ‘सुधा’ नाम की दूध सहकारी संस्था ने स्वस्थ और सस्ता खाना लोगों तक पहुंचाया है। हमारी सहकारी समीतियों ने बैंक, गन्ने, खेती, शहरी विकास, मछली, पोल्ट्री और गृह आधारित आर्थिक व्यवस्था में काफी अच्छे परिणाम दिखाए है। शहरी क्षेत्रों में सस्ते घर बनाकर भारत की सहकारी समीतियों ने स्लम विकास में बहुत महत्वपूर्ण काम किया है।

माननीय राष्ट्रपति जी

भारत में सहकारी समितियों द्वारा हासिल की गई सफलता के आधार पर हमने इसे हमारी सोच और उन्नति प्रक्रिया में शामिल किया है। हमने राष्ट्रीय सहकारी यूनियन ऑफ इंडिया बनाई है, जो इस आंदोलन को चलाएगी। इसकी उन्नति और ज़रूरतों को पूरा करने के लिए हमने सहकारी मैनेजमेंट संस्थाएं बनाई है। सहकारी समितियों के काम को और बेहतर बनाने के लिए हम संस्थापन, आंतरिक संसाधन जुटाने, उनके प्रशिक्षण को पूरा करने की ज़रूरत पर ध्यान दे रहे है।

माननीय राष्ट्रपति जी

हम अनिश्चित समय में जी रहे है। खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा उपयोग, शहरीकरण की तीव्र गति, प्राकृतिक संसाधनों का अधः पतन और बढ़ती ग्रामीण शहरी असमानता के नई और उभरती चुनौतियों को सामूहिक कार्रवाई की तलाश है। हम कम संसाधन में ज़्यादा करने के लिए मजबूर है। हम कैसे करेंगे? इसका उत्तर सहकारी आंदोलन में है। हम आशा करते है कि हम इसको बचाने, लागू करने और प्रमोट करने में काम करेंगे।

 

धन्यवाद।


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Mayapuri

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