रिव्यु- फिल्म “रंग रसिया”

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कला का बेजोड़ नमूना

मिर्च मसाला, मंगल पांडे जैसी लीक से हटकर फिल्में बनाने वाले लेचाक निर्देशक केतन मेहता ने करीब पांच साल पहले रंजीत देसाई के उपन्यास राजा रवि वर्मा पर फिल्म बनाने का बीड़ा उठाया था। लेकिन बाद में फिल्म अपने विशय को लेकर सेंसर के पचड़े में ऐसी फंसी कि उसे निकलने में पांच साल का लंबा अरसा लग गया ।

          आज से 100 साल पहले केरल में रवि वर्मा नामक एक ऐसे पेंटर हुये जिनकी कलाकारी से खुश हो वहां के राजा ने उन्हें राजा की पदवा दे डाली लेकिन राजा के मरने के बाद उनके छोटे भाई की वजह से उन्हें राज्य छोड़ना पड़ा । बाद में रवि वर्मा दीवान- सचिन खेड़ेकर के कहने पर मुबंई आ जाते हैं । यहां वे राज – समीर धर्माधिकारी की मदद से ऐसी पेटिंग्स बनाते हैं कि प्रर्दशनी में वे विदेशी कलाकारों को भी मात देती है । दरअसल इसके लिये पहले रवि वर्मा ने पूरे देश का भ्रमण किया और हर जगह की एक कहानी उन्होंने अपने चित्रों में बयान की । इन चित्रों में उनकी प्रेरणा बनी एक वेष्या सुगंधा, जो बला की खूबसूरत थी । बाद में उन्होंने सुगंधा को लेकर ही देवी देवताओं के चित्र भी बना डाले यही नहीं उन्होंने अपनी प्रिटिंग प्रैस में अपने चित्रों का छापकर देवी देवताओं को घर घर तक पहुंचा दिया । इसके बाद कुछ धार्मिक संगठन उनके दुश्मन हो गये । क्या उन्होंने रवि वर्मा पर मुकदमा ठोक दिया । लेकिन रवि वर्मा ने वो मुकदमा खुद लड़ा और जीत हासिल की । इस बीच बदनामी होने के कारण आत्म हत्या कर ली । बाद में उन्होंने अपना धन कुछ तो कर्ज में दे दिया, बाकी बचा हुआ धन उन्होंने अपने सहायक दादा साहेब फाल्के को फिल्म बनाने को दे दिया ।

          रंग रसिया जैसी फिल्म केतन मेहता जैसे प्रबुद्ध निर्देशक ही बना सकते हैं । बेशक फिल्म में वो आत्मा नहीं है जो ऐसी फिल्मों में दिखाई देती है लेकिन केतन मेहता ने फिल्म को एक ऐसा आकार दिया है जिसमें सो साल पुराने कलाकार और उसके आसपास के वातावरण को जिंदा कर दिया । फिल्म में उस दौरान एक हद तक नये कलाकार रणदीप हुडडा और नंदना सेन ने बहुत ही शानदार अभिव्यक्ति दी है । खासकर नंदना सेन के न्यूड सीन उसकी कला के प्रति समपर्ण दर्शाते हैं । इनके अलावा विक्रम गोखले, समीर धर्माधिकार, परेश रावल तथा सचिन खेड़ेकर आदि ने भी अच्छा काम किया है । फिल्म की जान है संदेष शांडिल्या का संगीत । कहने का तात्पर्य है कि रंग रसिया एक ऐसी क्लासिकल कृति है जो दस साल बाद उतने चाव से देखी जायेगी, जितनी की आज।


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