रेखा – हमसफर

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MAHESH ABEYEWARDENE

जिंदगी की कसौटियों की हर ‘रेखा’ को पार किया रेखा ने

मैं बहुत खुशकिस्मत हूं कि मुझे कई बड़ी हस्तियों के जीवन के उतार-चढ़ाव और सफलता को बहुत ही करीब से देखने का मौका मिला। खासकर सिनेमा जगत की कई ऐसी हस्तियां हैं जिन्होंने चालीस साल पहले संघर्ष शुरू किया था और आज सफलता का रस चख पा रही हैं। यही नहीं उनके जीवन के तमाम उतार-चढ़ाव और संघर्ष की दास्तां को मैंने करीब से जाना है। ये लोग मुंबई में एक आम इंसान की तरह आए थे, लेकिन साल बीतते गए और इनकी एक अलग ही पहचान भी बनती गई। तमाम अपमान, अटूट संघर्ष और बेइंतहा दर्द के बाद बावजूद इन लोगों ने हार नहीं मानी और जिंदगी की जंग जीत गए। जी हां दर्द और जिंदगी की कसौटियों ने इनके आगे घुटने टेक दिए और जीत ने इनके कदम चूमे। मैं उनकी कहानियों पर एक पूरी किताब लिख सकता हूं। लेकिन फिलहाल मैं बस एक हस्ती के बारे में बात करना चाहता हूं, जो हर तारीफ की हकदार हैं, एक औरत जो संघर्ष की मिसाल है, जिसने जीवन के हर मोड़ पर मजबूती से खुद को संभाले रखा, वो औरत एक अभिनेत्री से आज राज्यसभा की सदस्य बनीं। जी हां हम बात कर रहे हैं रेखा की।

मुझे याद है जब वे साउथ की फिल्मों में रंग बिखेरने के बाद पहली बार बंबई आईं थीं। उनकी पहचान तमिल अभिनेत्री जेमनी गणेशन की बेटी के नाम से थी। जेमनी गणेशन द अडोनिस यानी भगवान का प्यार और पुष्पावली के नाम से चर्चित थीं। रेखा ने अपने करियर की शुरुआत में बहुत मुश्किलें झेली हैं। रेखा का असली नाम भानुरेखा है। रेखा ने तब जन्म लिया जब उनके माता-पिता का रिश्ता एक कठिनाईयों के दौर से गुजर रहा था।

रेखा के परिवार में काफी आर्थिक संकट था, जिसकी वजह से उन्हें 13 साल की उम्र में हिंदी फिल्मों में अपना करियार बनाने की जरूरत पड़ी। मुझे याद है रेखा के पास शुरुआती दौर में कोई घर नहीं था, वे और उनके परिवार को जुहू के अजंता होटल में रहना पड़ा। रेखा ने अपनी पहली फिल्म अंजाना सफर साइन की। शत्रुजीत पाल की इस फिल्म के हीरो विश्वजीत थे। फिल्म के एक सीन में रेखा को विश्वजीत को किस करना था, लेकिन चाहकर भी वे इस सीन के लिए मना नहीं कर पाईं। उन्हें मजबूरी में ये सीन करना पड़ा। बाद में इस सीन की खूब चर्चा हुई। तमाम मैगजीन के कवर पेज पर इस दृश्य को कवर पेज बनाया गया। सेंसर बोर्ड ने भी इस सीन पर आपत्ति जताई लेकिन बाद में इसे हरी झंडी दे दई गई। रेखा की दूसरी फिल्म दो शिकारी भी सुपर फ्लॉप रही।

लेकिन रेखा ने हार नहीं मानी, वे लगातार फिल्मों में हाथ आजमाती रहीं। एक दिन उन्हें सफलता मिली जब उनकी फिल्म सावन भादो रिलीज हुई और सफल भी हुई। फिल्म ने अच्छा प्रदर्शन किया। इसके बाद उन्होंने कई फिल्म साइन की। उन्हें अपने सावंलेपन और खराब ड्रेसिंग के लिए बहुत कुछ सुनना पड़ता था। उन्हें तंज कसे जाते थे लेकिन वे उन्हें नजरअंदाज करती थीं।

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एक वक्त आया जब उनका कई हीरों के साथ नाम जोड़ा गया। कभी किरण कुमार (किन किन) तो कभी विनोद मेहरा (विन विन) के साथ इनके इश्क के चर्चे जोरों पर रहे। आए दिन कई मैगजीन में इनके किस्से छपने लगे। उनकी फिल्मों से ज्यादा वे अपने अफेर्यस के लिए चर्चा में रहने लगीं। लेकिन रेखा ने अपने में इतने बदलाव लाए और साबित कर दिया कि वे किसी भी हालात में हार नहीं सकती हैं। उन्होंने अपने चेहरे, बॉडी, फिगर, आत्मविश्वास सब पर बहुत मेहनत की और खुद को परफेक्ट बनाने की होड़ में लग गईं।

सूत्रों की मानें तो जो लोग उनके काफी करीब थे वे बताते हैं कि, उन्हें बदलने में बस एक ही इंसान का हाथ था और वो थे अमिताभ बच्चन। जिन्होंने रेखा का हर मोड़ पर साथ दिया और उनके साथ कई फिल्में भी की। दोनों के जुड़ाव के बारे में क्या कहना। हर कोई इस रिश्ते की खामोश दास्तां जानते हैं। दोनों का रिश्ता बॉलीवुड में सबसे चर्चित रहा। दोनों के प्यार भी बॉलीवुड में मिसाल के तौर पर बना रहा। रेखा ने कभी बिग बी का नाम नहीं लिया और उन्हें हमेशा तुम कहकर पुकारा। दोनों ने कभी अपने रिश्ते की खामोश दास्तां बयां नहीं की। लोगों ने और फिल्म इंडस्ट्री ने दोनों के रिश्ते पर खूब चर्चा की लेकिन बिग बी और रेखा ने किसी को सफाई देने की जरूरत नहीं समझी। दोनों हमेशा खामोश रहे। दोनों ने साथ में यश चोपड़ा की आखिरी फिल्म सिलसिला की। इस फिल्म में बिग बी जया बच्चन के पति बनें और रेखा के साथ भी एक रिश्ता निभाया। ये फिल्म भी प्यार की दास्तां पर आधारित थी। फिल्म ने सफलता की ऊंचाईयों को छुआ। इस फिल्म के बाद यश जी को खूब सफलता मिली।

रेखा आज एक ऐसी औरत हैं जिन्होंने साबित कर दिया कि एक अकेली औरत हर कठिनाईयों से अकेले ही लड़ सकती है। उसे किसी सहारे की जरूरत नहीं है। रेखा आज अपने व्यक्तित्व के चलते सिर्फ देश भर में ही नहीं बल्कि दुनिया भर में चर्चित हैं। रेखा की खूबसूरती की आज भी मिसाल दी जाती है। उन्हें दीवा बुलाया जाता है। रेखा फिल्मों के साथ-साथ सामाजिक मुद्दों पर काम करती हैं। रेखा ने एक अभिनेत्री के साथ-साथ एक विलेन, एक मां और फिर दादी का किरदार भी निभाया है। उन्होंने साबित कर दिया कि जीवन में कुछ भी हो सकता है। कुछ भी मुमकिन है।

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मुझे भी उनसे मिलने का मौका मिला। उनके जन्मदिन के अवसर पर मुझे हमारी मुलाकात की सारी बातें याद आ रही हैं। मैं एक बार गुरु दत्त के मैनेजर विश्वनाथ के साथ मुंबई के सेठ स्टूडियो गया था। रेखा वहां किसी फिल्म की शूटिंग कर रही थीं। मुझे बोलने में शर्म नहीं है कि मैंने पी रखी थी और मैं उनसे बात करने की हालत में नहीं था। मुझे नहीं पता उस वक्त उन्होंने मेरे बारे में क्या सोचा लेकिन बाद में जब मैं अपने एडिटर के केबिन में पहुंचा तो मुझे पता चला कि रेखा जी ने मेरे नाम से शिकायत की है। मैं बिल्कुल डर गया था, पता नहीं मुझे क्या सजा दी जाएगी। मैंने बहुत बड़ा गुनाह किया था। इसलिए उसके बाद से जहां रेखा जी होती थीं मैं कभी वहां नहीं जाता था।

कुछ समय बाद मेरे एडिटर ने मुझे बताया कि मुझे मैडम रेखा के साथ उदयपुर जाना होगा। वहां रेखा और रजनीकांत की फिल्म फूल बने अंगारे की शूटिंग चल रही है। मुझे लगा कि पता नहीं शायद ये लोग मुझे सजा देना चाहते हैं। मैंने सोचा चलो देखते हैं जो होगा देखा जाएगा। मैं उदयपुर के होटल पहुंचा। वहां एक छोटी सी पार्टी रखी गई थी। वहां सभी पत्रकार दोस्त आए हुए थे। रेखा जी सीढि़यों से नीचे आईं। मेरी तो जान ही निकली जा रही थी। जैसे ही उन्होंने पूछा कि अली आया है या नहीं, मेरी तो जान ही निकल गई। मैंने हाथ ऊपर किया और उन्होंने कहा अली तुम अगली सुबह मुझसे कमरे में सात बजे मिलने आ जाना। मैं उस रात सो नहीं पाया। मुझे बेचैनी लगी रही आखिर उन्होंने ऐसे मुझे क्यों बुलाया है। मैं उनके कमरे में पहुंचा और उन्होंने कहा कि अली तुम जब तक उदयपुर में हो रोजाना सुबह मुझसे मुलाकात करोगे। ये वही वक्त था जब वे जीवन के कठिन दौर से गुजर रही थीं। उनकी शादी दिल्ली के बिजनेसमैन मुकेश अग्रवाल से हुई थी, शादी के कुछ समय बाद ही उन्होंने आत्महत्या कर ली। हमने एक दूसरे से हर तरह की बातें करनी शुरू कर दी। रेखा जी को फिल्मों के अलावा अपने निजी जीवन की बातें करने में ज्यादा दिलचस्पी हुआ करती थी। उन्हें मेरे बारे में भी जानने की उत्सुकता होती थी। मुझे लगता है वो चार दिन एक पत्रकार के तौर पर मेरे जीवन का सबसे कीमती वक्त था। मैंने शिद्दत के साथ उनके साथ अपनी मुलाकात पर एक आर्टिकल लिखा। इसके बाद उन्होंने मुझे एक दिन बुलाया और अपने पास बैठने को कहा। वे सुनील दत्त के साथ ये आग कब बुझेगी की शूटिंग में व्यस्त थी। उन्होंने मुझसे कहा, तुम फिल्म पत्रकार क्यों बन गए। तुम्हें एक लेखक होना चाहिए था। तुम इतना अच्छा लिखते हो, तुम मेरे जैसे लोगों के बारे में लिखने की बजाय कविताएं लिखो। उन्होंने मुझे जीवन के फलसफे सिखाए। उसके बाद से हम रोजाना मिलने लगे और मिलने का सिलसिला चलता रहा। हम फिल्म और करियर के अलावा भी कई तरह की बातें करते थे। जिंदगी के पहलुओं के बारे में चर्चा करते थे। मैं काफी दिनों से नहीं मिले, वे भी काफी व्यस्त हैं और मैं भी। कुछ और कारण भी है जिसके बारे में मैं बात नहीं करना चाहता हूं। मैं उदयपुर के वो चार दिन कभी नहीं भूल सकता हूं और मुझे लगता है वे भी कभी नहीं भूलेंगी। वो मुलाकातें और वो सुबह अपने आप में यादगार है।

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कल्पना करना मुश्किल है एक बदसूरत सी लड़की जिसने अपनी मेहनत और लगन से अपना मुकाम हासिल किया। क्या एक औरत तमाम कठिनाईयों के बावजूद लड़ सकती है, एक औरत जिसका लोगों को लगा था कि कोई भविष्य नहीं है उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जिन्हें राज्यसभा के लिए नामांकित किया गया। जब वे प्रवेश करती हैं तो तमाम लोगों का सिर गर्व से ऊंचा हो जाता है।
रेखा आज हजारों महिलाओं की प्रेरणा बन गईं हैं। आज जब हम नारी सशक्तिकरण की बात करते हैं, रेखा इसकी सबसे बड़ी मिसाल है। उन्होंने जीवन के संघर्षों को बहुत करीब से देखा है और जिंदगी की हर जंग जीती है। अकेले अपने दम पर उन्होंने जीवन की हर कसौटी को पार किया है। एक रेखा जो हर कोई पार नहीं कर सकता, एक रेखा जो ये भी सिखाती है कि औरत किसी की पैर की जूती नहीं है और ना ही बननी चाहिए क्योंकि जो शक्ति एक औरत में होती है वो मर्दों में नहीं होती है, लेकिन एक औरत रेखा जैसी औरत मर्दों से बहुत ज्यादा शक्तिमान है और आगे भी होगी।


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Mayapuri

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