लड़की बबली सी राधा सलूजा

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Radha Saluja 2

मायापुरी अंक 4,1974

राधा ने जब दो राहा’ फिल्म में तहलका मचाया था तब भी वह दो राहें पर खड़ी थी और आज भी वह दो राहें पर खड़ी अनजान क्षितिज की और निर्मिनेष दृष्टि से टकटकी लगाए देख रही है।

मैंने राधा को बहुत पास से देखा है एक बार मेरठ के नोचन्दी मेले में जबकि एक संस्था ‘मुक्ताकाश संस्थान’ ने राधा को आमन्त्रित किया था। यह तब कि बात है जब उसकी ‘दो राहा’ फिल्म प्रदर्शित हुई थी और वह रेपसीन वाली राधा के नाम से मशहूर थी। दिल्ली से मेरठ के सफर में मैं राधा के साथ था कितनी उन्मुक्त और सहजता के साथ वह अपने विचारों की स्वतन्त्रता से अभिव्यक्ति कर रही थी। कार जब जमना नदी के नावों के पुल के पास पहुंची तो राधा ने मचलते हुए कहा, ‘सुनिए जरा गाड़ी रुकवाएं, गन्ने का रस पियेंगे’ कार रोक दी गई और राधा ने रस पिया। आसपास जाने वाले लोगों की भीड़ लगने लगी थी मगर राधा सभी से बेपरवाह थी।

‘देखिए ना, अब मैं आजादी से कही बाहर निकल भी नही सकती कितनी परेशानी है राधा ने ठंडी सांस लेते हुए कहा। जब हम लोग मोदीनगर पहुंचे तो राधा बोली, ‘कमाल है जनाब आप भी, बड़े कंजूस है। हमें प्यास लगी है और आपको अपनी पड़ी है। चलिए संतरे खिलवाईए’ मैंने एक दर्जन संतरे खरीद लिए। अब राधा थी कि संतरे छील-छील कर खाती जाती थी और उन्हें खट्टा भी बताती जाती थी। खैर हम मेरठ पहुंचे तो जिस होटल में हमें ठहराया गया उसके सामने लोगों का जमघट लग गया। जिसे देखों वही ऊपर चढ़ा जाता था। यहां तक कि पुलिस के कर्मचारी भी जो वहां भीड़ को कन्ट्रोल करने के लिए तैनात थे राधा की एक झलक पाने के लिए आतुर थे और राधा थी कि बस हंसे ही जा रही थी पागलों की तरह।

रात को नौचन्दी मेले में राधा को देखने के लिए दर्शकों की भीड़ बेतहाशा बढ़ती जा रही थी। राधा ने एक नही, दो नही, पूरे तीन गाने गाकर दर्शको। को आश्चर्यचकित कर दिया क्योंकि राधा की आवाज में जादू था। वह इतना अच्छा और तन्मयता के साथ गा रही थी कि सुनने वाले राधा के ‘दो राहा’ वाले रूप को भूलकर उसके गायिका स्वरूप में खो गए थे। सम्भवत पहली बार राधा ने स्टेज पर गाया था।
जब रात को करीब बारह बजें होटल पहुंचे तो राधा हठ करने लगी कि मैं नौचन्दी मेंले में घूमूंगी झूले में झूलूंगी मगर क्या उसकी इस बात को इतनी सहजता से स्वीकार किया जा सकता था। राधा को मैंने समझाया, तुम्हारा होटल से बाहर निकलना भी खतरनाक है और तुम मेले में घूमने का हठ कर रही हो, ‘कही से मुझें बुरका लादो, उसे ओढ़ कर चली चलूंगी कोई भी नही पहचानेगा। राधा ने कहा। मैं उसके इस साहस को देखकर विस्मित था कि अजीब लड़की है ये राधा भी जो अपनी तरफ से इतनी बेपरवाह है, बड़ी मुश्किल से उस समझाया तब कही जाकर वह मानी।

राधा अपने सोने के कमरे में चली गई अभी कुछ ही समय बीता होगा कि किसी ने हमारा दरवाजा खटखटाया। मैंने उठ कर दरवाजा खोला तो देखा कि दो आदमी बाहर खड़ें है। दोनों मुझे घकियाते हुए अन्दर घुस आए और आकर पंलग पर बैठ गए। उन्होंने रिवाल्वरें निकाल कर मेज पर रख दी और बोलें, हमें राधा से मिलना है।

‘इस समय आप जानते है रात के दो बज रहे है और यह समय कोई मिलने का नही होता। राधाजी इस समय सो रही है। आप कल तशरीफ लाये। मैने सहमते हुए कहा। मगर वे दोनों थे कि मरने-मारने पर उतारू हो गए। बड़ी मुश्किल से उन्हें समझा बुझाकर होटल के दरवाजे से बाहर किया गया। पूरी रात इस घटना का आतंक मन पर छाया रहा। सुबह जब राधा को रात वाली घटना के बारे में बताया गया तो वह इठलाती हुई बोली, ‘अरे घबरा गए, मेरे पास भिजवा दिया होता मवालियों को। मैं तो पिस्तौलों से खेलने की आदी हूं मेरे पिताजी मिलट्री में है। मेजर जो है. मेरे लिए तो पिस्तौल-बन्दूक सब खिलौने है। राधा के चेहरे से ऐसा जाहिर हो रहा था जैसे उस पर कुछ असर ही नही हुआ हो। वह लगातार खिलखिला कर हंसती जा रही थी।

में बसा हुआ अत्यन्त रमणीक स्थल पर है। बंगले के आस-पास इतनी नीरवता है कि वहां पर आने वाले किसी भी व्यक्ति का मन कविता करने पिछले दिनों अपने बम्बई प्रवास के दौरान मेरी भेंट राधा से हुई। रक्षा बन्धन का दिन था। सुबह से कोई न कोई राधा के पास राखी बंधवाने आ रहा था। जब राधा ने मुझे देखा तो बोली, ‘एक अकेले आप ही ऐसे हैं जो इंटरव्यू लेने आए है। इतना कहते ही उसी सहजता के साथ वह खिलखिला कर हंस पड़ी राधा से बातचीत के दौरान अनेकों नई बातों का पता चला। उसने बताया कि वह एक तमिल फिल्म में भी काम कर रही है और बड़े अच्छे ढंग से तमिल बोल लेती है। राधा ने बड़े फर्राटे से अपनी तमिल फिल्म के सवांद कर सुनाए। राधा के पास इस समय भी एक दर्जन फिल्में है जिनमें वह काम कर रही है। इन सभी फिल्मों में उसने अपने पुराने इमेज को तोड़ने की भरपूर चेष्टा की है। वह । राधा ने कहा कि, दिलीप साहब बड़े ही साफ दिल के और मूडी व्यक्ति है। वे नए कलाकारों को प्रोत्साहित करते हैं और हर एक को यह सलाह देते है कि कम से कम फिल्मों में काम करो और काम अच्छा हो।

राधा ने दिलीप साहब के अतिरिक्त सुनीलदत्त के बारे में भी अपने विचार प्रकट किए कि वे अपने काम में दिलचस्पी लेते है और कितनी मेहनत से अपनेपात्र को पर्दे पर साकार करते है। आजकल की पत्रकारिता, विशेष रूप से फिल्म पत्रकारिता के सम्बन्ध में भी राधा ने अपने विचार बताए। राधा ने कहा कि, ‘आजकल फिल्म पत्रिकाएं कलाकरों के रोमांस और झूठी बेपर की बातें छापने में अधिक दिलचस्पी लेती है। मेरा ही उदाहरण ले लो कि मैं इन्टरव्यू कुछ और देती हूं तथा छपता कुछ और ही है। मेंरे बारे में कभी कोई लिख देता है कि मैं निर्माताओं से कार के पैट्रोल के पैसे वसूल करती हूं तो कभी मेरी शादी की चर्चाएं छपना प्रारम्भ हो जाती है। न जाने लोगों को क्या आन्द आता है ऐसी बातों में कई बार तो दिल इतना खट्ठा हो जाता है कि पत्रिकाएं घर पर आती है तो मैं उन्हें पढ़ती तक नही हूं। कुछ लोग ऐसे भी है जो मुझे ब्लैक मेल करते है। ’आप ऐसे कुछ लोगों का नाम बताए? मैनें राधा से पूछा।
‘क्या फायदा है नाम बताने से। प्लीज इस प्रश्न को प्रश्न ही रहने दीजिए। हां आप कोशिश कीजिये अपनी ‘मायापुरी’ पत्रिका में कि कोई ऐसी बात न हो जिससे किसी आर्टिस्ट की भावनाओं को ठेस पहुंचे। मुझें मालूम है आप फिल्म पत्रकारिता को एक स्वच्छ दिशा देंगे अपने पाठकों के मनोरंजन का भी ध्यान रखें मगर वह मनोरंजन सस्ती किस्म का न हो। राधा ने अपनी सलाह देते हुए कहा। राधा अत्यन्त सादगी पसन्द है। वह अपने घर पर एकदम साधारण लड़क की तरह रहती है। उसे देख कर कोई भी यह नही कह सकता है कि वह हीरोईन है।

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Mayapuri