सैक्स के नाम पर खाने वाले यह निर्माता

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मायापुरी अंक 3,1974

फिल्म चाहे सामाजिक हो या राजनैतिक, धार्मिक हो या जासूसी, अर्थात् कोई भी विषय-वस्तु क्यों न हो, नग्नता (न्यूडिटी) के तत्व किसी न किसी रूप में अवश्य विद्यमान रहते है। हर फिल्म निर्माता इसे फैशन के तौर पर अपनाने को आतुर है क्योंकि इससे उसके कई उद्देश्यों की पूर्ति होती है. जैसे जितनी अधिक नग्नता का समावेश वह (निर्माता) अपनी फिल्म में करेगा, ‘इन्टलेक्चूअल’ द्धारा ही ‘बोल्ड’ तथा ‘माडर्न’ की उपाधि से विभूषित होगा।

प्रश्न यह है कि नग्नता को किस गुप्त रास्ते से फिल्मी कहानी में लाया जाये कि किसी को कानों-कान खबर न हो कि उक्त नग्न दृश्य का कहानी से दूर-दूर तक सम्बन्ध नही है ?

एक बार निर्माता, निर्देशक व लेखक ने मिल कर साहस किया और समाज के सफेद पोशों की असलियत को नंगा करके ‘चेतना’ फूंकी ! फिर उन्होंने अपना ही अनुसरण करके सैक्स के प्यासों की ‘जरूरत’ पूरी की. अन्य निर्माताओँ ने निष्कर्ष यह निकाला कि जनता सैक्स की भूखी है, उसे सैक्स दो. दर्शक का उद्धार तो होगा ही अपना (निर्मातागण का) भी होगा. निर्माताओं की मनोवृति का नमूना जल्द ही ‘दो- राहा’ के रूप में सामने आया। कही दर्शक की उत्तेजना ठंडी न पड़ जाये इसीलिये राधा सलूजा को कई बार कपड़े उतारने पर विवश कर दिया।

‘दोराहा’ को भी जब बॉक्स ऑफिस सफलता मिल गयी तो हर निर्माता ने कुबेर का खजाना हासिल करने के लिये नैतिकता के चोले को उतार कर ताक पर रख देना जरूरी समझा। उसने आंख बचाने के लिये आंखों पर चश्मा चढ़ाया और हीरोइन को कपड़े उतारने का हुक्म दिया। हीरोइऩ ने इन्कार किया तो उसे समझाया कि अगर रेहाना सुल्तान की तरह सफलता पानी है, रीनाराय की तरह रातों-रात स्टार बनना है तो ‘बोल्ड’ बनो। हीरोइन के सामने जब कैरियर का सवाल आया तो उसन तथाकथित नाम और काम पाने के लालच में सारी लाज, शर्म व नैतिकता को सन्दूक में बन्द करने में न तो संकोच दिखाया, न असमर्थता प्रकट की और न ही कोई रखा। ‘पर्दे के पीछे’ ‘बुनियाद’ ‘हिफाजत’ ‘कीमत’ ‘रिक्शावाला’ ‘डबल-क्रास’ छुपा रूस्तम’ ‘हीरा-पन्ना’ ‘प्रान जाई पर वचन न जाई’ ‘मनोरंजन’ ‘नफरत’ और बॉबी’ आदि तमाम फिल्में इसका उदाहरण है।

रामानन्द सागर की ‘जलते बदन’ का मूल उद्देश्य मादक दृव्यों के प्रसार से उत्पन्न भंयकर परिणामों की चेतावनी देना था। विषय वस्तु की जरूरत के मुताबिक थोड़ा-बहुत सैक्स का होना तो लाजमी था। पर सागर साहब ने सैक्स की छूट का बेजा फायदा उठाने में चूक नही की। आरम्भ से अन्त तक कुमकुम ने नाम मात्र के वस्त्र पहने, पदमा खन्ना ने उत्तेजक कैवरे किया और अलका से बलात्कार करने के लोभ का भी संवरण नही किया जा सका। नतीजा यह निकला कि न तो दर्शक के पल्ले कथानक पड़ा और न ही फिल्म में स्थान-स्थान पर ठूंसी गयी नग्नता आकर्षित कर सकी।

क्या यही आवश्यक है कि जिस फिल्म में बिन्दू पदमा खन्ना, अरूणा ईरानी, जय श्री.टी. मीना टी. हेलन, अलका, फरियाल आदि हो तो उनसे सिर्फ कैवरे करवाया जाये या उनका जबरदस्ती बलात्कार किया जाये ? क्या बी. आर. इशारा की चरित्र’ व ऋषिकेश मुखर्जी की ‘सबसे बड़ा सुख’ जैसी सैक्स प्रधान विषयों पर आधारित भद्देपन व अश्नीलता से मुक्त फिल्में अन्य निर्माता नही बना सकते ? यह कई प्रश्न है जो हर जिम्मेदार नागरिक के दिमाग में कई बार उभरे इनका जवाब मांगा गया, परन्तु निर्माताओं ने चुप्पी साध ली। पर यह खामोशी भी कब तक ? आज नही तो कल दर्शक निर्माताओं के सामने लक्ष्मण रेखा खींच ही देंगे।

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Mayapuri