“हमारी फिल्म ‘शीर कोरमा’ की ताकत के चलते न जाने कितनी ज़िन्दगी बदल रही हैं” -फराज अंसारी

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डिस्लेक्सिया पर आधारित फिल्म ‘‘तारे जमीं पर’’में अमोल गुप्ते संग एसोसिएट निर्देशक के रूप में करियर शुरू करने के बाद फिल्मकार फराज अंसारी ने ‘स्टेनली का डिब्बा’ भी की। फिर स्वतंत्र रूप से काम करते हुए भारत की एलजीबीटीक्यू प्रेम कहानी पर मूक फिल्म ‘‘सिसक’’ बनायी। फिर कई दूसरे काम किए और अब वह समाज की समलैंगिकता,स्त्री विरोधी और प्रतिगामी प्रकृति को उजागर करने के मकसद से फिल्म ‘‘षीर कोरमा’’ लेखन,निर्माण व निर्देशन किया हैं। फिल्म की कहानी एक मुस्लिम परिवार से आने वाली ‘गे’ महिला के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक-दूसरे से प्यार करते है।षबाना आजमी,दिव्या दत्ता और स्वरा भास्कर के अभिनय से सजी फिल्म ‘‘षीर कोरमा’’ ने पूरे विश्व के अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में न सिर्फ हंगामा बरपा रखा है,बल्कि दस से अधिक पुरस्कार भी हासिल कर लिए हैं।

प्रस्तुत है फराज अंसारी से हुई एक्सक्लूसिव बातचीत के अंतः

अपनी पृष्ठभूमि और अब तक की यात्रा पर रोशनी डालें?

-पहली बात यह कि मैं गैर फिल्मी परिवार से हॅूं। मगर फिल्म बनाने का षौक तो मुझे चार साल की उम्र में ही लग गया था। बचपन में कहानी बताने का शौक रहा है। हम ऐसे परिवार से आते है,जहां होली,दिवाली, क्रिसमस, ईद, लोड़ी,पारसी न्यूईअर सहित सभी फेस्टिवल मनाते हैं.मेरे घर में हर धर्म के लोग हैं। एक बार दिवाली के मौके पर कनाडा से मेरी आंटी आयी हुई थी। मैने टॉयज /खिलौनों के साथ एक स्किट की थी, जिसे देखकर मेरी आंटी बहुत खुश हो गयी। .मेरी आंटी ने मेरी मां से कहा कि ,‘अच्छा, फराज को बड़ा होकर फिल्ममेकर बनना है। तो उसी दिन से मेरे दिमाग में यह बात आ गयी थी कि मुझे बड़ा होकर फिल्में बनानी हैं। लोगों की कहानियां बतानी हैं। पर भारत में सिनेमा की षिक्षा की आधुनिक सुविधा थी नही। इसलिए स्कूल की पढ़ाई पूरी होते ही मैं अमरीका चला गया। मैने फिल्म लेखन, फिल्म निर्देशन और मनोविज्ञान की शिक्षा हासिल की। थिएटर की ट्रेनिंग ली। फिर वापस मुंबई आया। मगर फिल्मां से जुड़ने में काफी वक्त लग गया। मुझे सबसे पहले आमीर खान, टिस्का चोपड़ा और दर्षिल सफारी के अभिनय वाली फिल्म ‘‘ तारे जमीन से ’’ से जुड़ने का अवसर मिला। इस फिल्म में मैने निर्देषक अमोल गुप्ते के साथ बतौर एसोसिएट निर्देषक काम किया। फिर अमोल गुप्ते के साथ फिल्म ‘‘ स्टेनली का डिब्बा’’ की। फिर मैंने धर्मा प्रोडक्शन के साथ काम किया।

इसके बाद मैने स्वतंत्र रूप से काम करने की ठान ली। मैने एक कहानी लिखी, जिस पर मैं फिल्म का निर्माण व निर्देशन करना चाहता था, पर मेरी उसी कहानी पर तनूजा चंद्रा ने कार्तिक आर्यन को लेकर लघु फिल्म ‘‘ सिल्वर ’’ बनायी। मेरे से ज्यादा पैसे तनूजा के पास थे, इसलिए उन्हे इसका निर्देशन करने का अवसर मिला।  उसके बाद मैने एक लघु फिल्म ‘‘ सिसक ’’ बनाई, जो कि भारत की पहली साइलेंट क्वीर/गे प्रेम कहानी है। यह भारत की पहली फिल्म बनी ,जिसे साठ अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले.इसके बाद मैने वेब सीरीज ‘‘ दूल्हा वांटेड ’’ बनायी। नेटफ्लिक्स के लिए शादियों के ऊपर डाक्यू सीरीज ‘‘ बिग डे’’ का निर्देशन किया। इसके बाद लघु फिल्म ‘‘षीर कोरमा ’’ बनायी। इस फिल्म को हमने दिल से बनाया। यह फिल्म हर अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में प्रशांसा व पुरस्कार जीत रही है। फ्रांसिस्को में जो ‘क्वेअर ऑस्कर्ड’होते हैं,वहां पर 45 वर्षों में पुरस्कार जीतने वाली पहली फिल्म बनी है। ‘‘ इंडियन फिल्म फेस्टिवल मेलबर्न ’’ में हमारी फिल्म ‘‘षीर कोरमा ’’का ऑस्ट्रेलियन प्रीमियर हुआ है।पुरस्कृत भी हुई।

अपने माता पिता के संबंध में बताएं? क्या उनका किसी तरह से कला से जुड़ाव है?

-मेरे पिता का आउटडोर बिलबोर्ड का बिजनेस है, जिसमें मेरी मम्मी मदद करती हैं। यानी कि मेरे पिता आउटडोर एडवरटाइजिंग में हैं। मेरी दादी लाहौर की सिख थीं। जबकि मेरे दादाजी टर्की से थे। दोनों ने प्रेम विवाह किया था। दोनों ने अपने अपने घर से भागकर शादी की थी, इसलिए लंबे समय तक कश्मीर में रहे, फिर दिल्ली में रहे.उसके बाद मुंबई आ गए। मेरी मां की कहानी भी काफी रोचक है। मेरी मां का आधा परिवार पंजाब से है और आधा परिवार इलाहाबाद से है। तो मैं भी मिश्रण से पैदा हुआ हॅूं। मेरी दादी सईदा लाहौर में थिएटर यानी कि अभिनय किया करती थीं। मेरा नाम मशहूर कवि अहमद फराज से आया है। दादी मुझे बचपन में गालिब, आबिदा परवीन और फरीदा खानम के नगमें सुनाया करती थीं। अहमद फराज की शायरी सुनाया करती थीं। तो बचपन से मैने कविताएं, गाने व शायरी काफी सुनी हैं। तो मुझे जाने अनजाने कला के गुण मिलते गए। तभी तो मैंने चार वर्ष की उम्र से ही लिखना शुरू कर दिया था। मेरी मम्मी ने मेरे बचपन में लिखी हुई नोटबुक्स संभालकर रखी हैं। पहले मैं हिंदी व अंग्रेजी में कविताएं लिखा करता था।

अमरीका से फिल्म मेकिंग व मनोविज्ञान की ट्ेनिंग लेकर आने के बाद फिल्म ‘‘ तारे जमीं पर ’’ से जुड़ने के बीच का संघर्ष कैसा रहा?
-मैं अमेरिका स्कॉलरशिप पर गया था, लेकिन अपनी घुटन से उबरने के लिए मैं स्कूल के बच्चों के लिए म्यूजिकल प्रोग्राम निर्देशित करता था। लॉयन किंग से लेकर एनी,एनी से लेकर ऑल वर्ल्ड,ब्यूटी एंड बिट्स सहित कई म्यूजिक थिएटर को निर्देशित व नृत्य निर्देशन किया। मैं स्टेज पर पांच सौ बच्चों को डालता था और उनके साथ निर्देशन करता था। उस वक्त मेरी उम्र महज 15 वर्ष थी। मैंने अमरीका में बच्चों के साथ काफी काम किया। अमरीका में सबसे छोटा बच्चा छह वर्ष का और सबसे बड़ा बच्चा 18 से बीस वर्ष की उम्र का होता था। अमरीका में मेरी ट्ेनिंग और बच्चों को निर्देशित करने से मुझे जो अनुभव मिला, वह आज भी मेरे बहुत काम आ रही है।

‘‘ तारे जमीं पर ’’ से किस तरह आपका जुड़ना हुआ था?

-अमरीका से प्रषिक्षण लेकर वापस आने के बाद मेरे सामने बॉलीवुड से जुड़ने की कोई राह नही थी। क्योंकि मेरे मम्मी या डैडी बॉलीवुड में किसी को भी नहीं जानते थे। मेरे सामने समस्या थी कि किस तरह बॉलीवुड से जुड़ा जाए। मुंबई में एक इंस्टीट्यूट है-एमईटी। मैंने अखबार में पढ़ा कि इनका 18 माह का कोई कोर्स चल रहा है। मैने सोचा कि इस कोर्स  को ज्वॉइन कर लेता हॅूं, षायद वहां पर किसी फिल्म निर्देषक से परिचय हो जाए। वहां पर अनुराग कष्यप व अमोल गुप्ते सहित कई निर्देषक आने वाले थे। पहले ही दिन अमोल गुप्ते से मुलाकात हुई। मैने उनको अमेरिका में बच्चों के साथ ‘डिस्लेक्सिया ’ पर बनाई हुई अपनी फिल्म ‘‘ फिश टैंक ’’ दिखायी। क्यांकि मैं खुद हॅूं। अमोल गुप्ते ने फिल्म देखी और बताया कि वह भी ‘‘ डिस्लेक्सिया ’ पर फिल्म बनाने जा रहे हैं। पहले ही दिन अमोल गुप्ते ने मुझसे कहा कि,‘ तुम पढ़ाई मत करो, तुम मेरे साथ काम करो। इस तरह मैं फिल्म ‘ तारे जमीं पर ’ में एसोसिएट निर्देषक बन गया था। इसके बाद मैने अमोल गुप्ते के साथ फिल्म ‘‘ स्टेनली का डिब्बा ’’ में काम किया। इस फिल्म का मैं सह लेखक, एसोसिएट निर्देशक और कॉस्टिंग डायरेक्टर तथा कार्यकारी निर्माता भी था। पर मैने फिल्म ‘ स्टेनली का डिब्बा ’ से बहुत कुछ सीखा। इस फिल्म में डेढ़ सौ बच्चे थे,जिन्हे मैं संभलता था,उनसे अभिनय करवाता था।

आप अपनी अमरीकन फिल्म के बारे में कुछ जानकारी देंगें?

-मैं नब्बे में स्कूल गया था। 2003 में मेरी स्कूली षिक्षा खत्म हुई थी। तब तक भारत में इस बात की समझ विकसित नही हुई थी कि ‘डिस्लेक्सिया ’ नामक कोई चीज होती है। लर्निंग डिसेबिलिटी किसी की समझ में नहीं आती थी। मेरी शिक्षक मेरी मां से कहती थीं कि तुम्हारे बच्चे में समस्या है। तुम्हारा बच्चा पागल है। मैं जब अमेरिका गया,तो वहां डाक्टर से मिला। मेरे अल्फाबेट हमेशा उपर नीचे हो जाते हैं। मुझे ऐसा लगता था जैसे कि सारे अक्षर मेरे सामने नाच रहे हैं। .तो उन्होंने कहा कि, ‘ अरे तुम्हे तो डिस्लेक्सिया  है।’ क्योकि उन्हे पता था। उन्होने मेरा इलाज किया। और तब मेरी समझ में आया कि अगर मै डिस्लेक्सिया हूं, तो देश व विश्व में कई सारे बच्चे डिस्लेक्सिया होंगे। तब मैने सोचा कि मुझे इस पर कुछ लिखना चाहिए और फिल्म बनानी चाहिए। तो अमरीका में मेरी  डिप्लोमा फिल्म ‘‘ फिषटैंक ’’ थी, जो कि एक ऐसे बच्चे की कहानी है, जो अपने घर के फिषटैंक में मौजूद मछली को देखकर समझता है कि वह ख्ुद भी मछली है। जो इस बड़ी दुनिया के टैंक में है। मछली को ‘ फिश टैंक ’ से बाहर निकलना है और इस बालक को भी उससे बाहर निकलना है जिसे दुनिया ने एक टैंक बनाकर उसके अंदर उसे घुसाकर रखा है। यही मेरी फिल्म थी, जिसे अमोल गुप्ते ने देखा था।

सिनेमा की शुरुआत मूक फिल्मों से हुआ था। पर बाद में बंद हो गयी। 1987 में मूक फिल्म ‘ पुष्पक ’ बनी.पर आपने मूक फिल्म ‘ सिसक ’ बनाने की कैसे सोची थी ?

-हमारी फिल्म ‘ सिसक ’ दो पुरुषों की प्रेम कहानी थी। यह दोनो मुंबई में लोकल ट्रेन में मिलते हैं और इनके बीच मोहब्बत हो जाती है। इस फिल्म में दो पुरुषों की मोहब्बत को दर्शाया है, यह एलजीबीटी की फिल्म थी, मगर इसमें संवाद नहीं थे। यह 2016 में बनी थी। उस वक्त होमोसेक्सुअलिटी को लेकर सेक्शन 377 अपराध था। वैसे कुछ समय के लिए रद्द हुआ था, पर फिर यह अस्तित्व में आ गया था। अब तो खैर यह अपराध नही रहा। पर उस वक्त गे समुदाय को जो अहसास हुए थे, उसी अहसास को दिखाने के लिए बिना संवाद की यह फिल्म बनायी थी। मैं दिखाना चाहता था कि दो लोगों के बीच बिना कुछ कहे, बिना एक दूसरे को छुए भी मोहब्बत हो सकती है।

वेब सीरीज ‘‘ दूल्हा वांटेड ’’ क्या थी?

-मैने बाहर एपिसोड की यह वेब सीरीज ‘ टाइम्स इंटरनेट ’ के लिए बनायी थी.‘ सिसक ’ के बाद लोग कहने लगे थे कि फराज अब सिर्फ होमोसेक्सुअलिटी पर ही फिल्म या लघु फिल्म बनाएगा। मैने अपनी इस ईमेज को तोड़ने के लिए बॉलीवुड की मेनस्ट्ीम मसालेदार वेब सीरीज ‘‘ दूल्हा वांटेड ’’ बनायी। इसकी कहानी काफी रोचक है। इसमें जिस लड़की की षादी होने वाली है, उसका मंगेतर /प्रेमी उसे मंगनी वाले दिन अन्य लड़की के लिए धोखा दे देता है। फिर यह लड़की कहती है कि मैं तेरे से बदला लॅूंगी, और तेरी षादी से पहले मैं षादी करके दिखाउंगी। वह फिर एक ऐसी ट्पि पर जाती है कि तीन माह तक वह यात्रा करती है। कई लड़कों से मिलती है, पर उसे मोहब्बत नहीं मिलती। तब एक दिन उस लड़की की दादी ( सुरेखा सीकरी  ) उससे कहती हैं कि ‘‘ तुम जब तक खुद से मोहब्बत नहीं करोगी, तुम्हे किसी अन्य से मोहब्बत नहीं मिलेगी, और तुम किसी अन्य से मोहब्बत कर नहीं पाओगी।’’ नई पीढ़ी को इस सीख की जरुरत है। नई पीढ़ी हर चीज के पीछे भागती रहती है, पर वह यह नहीं समझ पाती कि मोहब्बत तो हमारे अंदर ही है.यह समझदारी बहुत जरुरी है। इसमें नाच गाना व ड्रामा था।

फिल्म ‘‘ शीर कोरमा ’’ बनाने की वजह?

-फिल्म ‘ शीर कोरमा ’ बनाने की वजह यह रही कि सिनेमा में मेरे जैसे लोगों का सही प्रतिनिधित्व नहीं था। विचार इन पात्रों को बनाने में सक्षम होने का है। इन कथाओं को आगे लाने में सक्षम होने के लिए जो हमेशा मुख्यधारा के सिनेमा से गायब रहते हैं। अगर कोई मेरी कहानी नहीं बता रहा है, तो इसे सबसे प्रामाणिक और सबसे ईमानदार तरीके से बताने का दायित्व मुझ पर है। मैने ‘ शीर कोरमा ’ बनाकर लोगों को दिखाया कि एलजीबीटी समुदाय पर एक गंभीर फिल्म बन सकती है। इसमें कैरीकेचर,मजाक या कॉमेडी का होना जरुरी नही है। किसी को नीचा दिखाना जरुरी नही है। तो मैने 45 मिनट की फिल्म बनायी ,जिसमें तीनां औरतें हैं। .

फिल्म ‘ शीर कोरमा ’ की कहानी क्या है?

-यह कहानी मां और उसके बच्चे की है। कितनी शिद्दत और मेहनत लगती है अपने बच्चे को स्वीकार करने में। वहीं एक बच्चे को कितनी मेहनत और कितनी मोहब्बत लगती है अपनी मां को स्वीकार करने में। यह कहानी हम सभी की हैं। इसमे इंसान का धर्म या इंसान का लिंग कुछ भी हो सकता है। क्योंकि सभी की मां व सभी के बच्चे हैं। फिल्म के तीन मुख्य किरदारों में शबाना आजमी,स्वरा भास्कर व दिव्या दत्ता हैं। सायरा ( दिव्या दत्ता ) की मॉं के किरदार में शबाना आजमी हैं। स्वरा भास्कर ने सायरा ( दिव्या दत्ता ) की पत्नी का किरदार निभाया है।

आपने शबाना आजमी, दिव्या दत्ता और स्वरा भास्कर को ही फिल्म में क्यों चुना ?

-मैं दिव्या दत्ता के साथ फिल्म ‘‘ स्टेनली का डिब्बा ’’ में काम कर चुका था, इसलिए उनसे परिचय था। मैने इस सेट पर दिव्या दत्ता से कहा था कि मैं उन्हे एक दिन निर्देषित करुंगा। जब ‘ षीर कोरमा ’ की पटकथा तैयार हो गयी, तो मैने दिव्या जी को पढ़ने को भेजा। पटकथा उनके दिल को छू गयी। उन्होने मुझे फोन लगाया और वह फोन पर रो रही थीं। उन्होने कहा कि वह इसमें अभिनय करने के लिए तैयार हैं। दिव्या दत्ता जितनी संजीदा व प्रतिभाशाली कलाकार द्वारा निभाए जा रहे सायरा के किरदार की पत्नी का किरदार निभाने के लिए मैंने स्वरा भास्कर से बात की, तो वह भी तैयार हो गयीं। सायरा की मां के किरदार के लिए शबाना आजमी जी से संपर्क किया। उन्होने भी कहानी सुनकर काम करने के लिए हामी भर दी। मैने सीखा कि जब आप कोई काम दिल से करते हैं, तो कुदरत यानी कि कायनात वह चीज देती है।

फिल्म की शूटिंग कहां की,शबाना आजमी, दिव्या दत्ता और स्वरा भास्कर को निर्देशित करने का अनुभव क्या रहा ?

-हमने इस फिल्म को कम बजट में मुंबई में ही फिल्माया है। इस फिल्म को फिल्माते समय मैने जो सीखा तो उसे ‘अन सीखा’/ ‘अनलर्न’ किया। करियर में इतने कम समय में मुझे शबाना आजमी जी को निर्देशित करने का वक्त मिला। मैं भाग्यशाली हॅूं कि मुझे शबाना आजमी जी को निर्देशित करने का अवसर मिला। लोगों को पता नहीं होगा कि शबाना जी का सेंस आफ ह्यूमर बहुत कमाल का है। वह सेट पर काफी हंसाती थी, पर जब वह कैमरे के सामने अभिनय करती थीं, तो हम सभी इमोशनल होकर रोने लगते थे।

फिल्म काफी पहले बनी थी?

-नहीं..हमने ‘शीर कोरमा’की शूटिंग 2019 में की थी। 2020 में लंदन में हमारी फिल्म का विश्व प्रीमियर होने वाला था। मैं 26 मार्च 2020 को हवाई जहाज से लंदन जाने वाला था और एक दिन पहले 25 मार्च को भारत में लॉकडाउन लग गया। फिर महामारी  की वजह से हमने इसका प्रदर्शन रोकने का फैसला किया। अब जबकि कुछ हालात सुधरे है, तो हमने अपनी फिल्म को इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में भेजना शुरू किया। सबसे पहले जून 2021 में सैनफ्रांसिस्को में हमारी फिल्म ‘ शीर कोरमा ’ का प्रीमियर हुआ।

आपकी फिल्म को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में काफी पसंद किया जा रहा है। पर क्या इसे भारत में उतना ही पसंद किया जाएगा?

-मैने इससे पहले एलजीबीटीक्यू समुदाय पर एक प्रेम कहानी प्रधान मूक फिल्म ‘ सिसक ’ बनायी थी, जिसे पूरे विश्व में साठ पुरस्कार मिले थे। यह एलजीबीटीक्यू प्रेम कहानी वाली पहली भारतीय मूक फिल्म थी। लेकिन दुःख की बात यह है कि इसे भारत में एक भी पुरस्कार नहीं मिला। ‘ शीर कोरमा ’ के साथ भी यही हो रहा है। लोगों ने बिना मेरी फिल्म देखे आईएमडीबी पर इसे कम रेटिंग देना शुरू कर दिया। यहां तक कि मेरी फिल्म के ट्रेलर को भी किसी ने भी शेयर नहीं किया। यहां तक एलजीबीटीक्यू समुदाय के लोगो ने भी नहीं किया। लोग ‘ शीर कोरमा ’ के साथ नफरत कर रहे हैं, क्योंकि यह तीन औरतों की कहानी के साथ ही प्यार की बात करती है।

भारत में फिल्म ‘ शीर कोरमा ’ से लोगो की नाराजगी की वजह क्या समझ में आ रही है?

-‘ शीर कोरमा ’ से भारत में नाराजगी की कई वजहे हैं। सबसे बड़ी नाराजगी होमोफोबिया के चलते है। भारतीय होमोफोबिक बने हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने तो ‘एलजीबीटीक्यू’ समुदाय को आजादी दे दी, मगर भारतीय समाज स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। यह सिर्फ समलैंगिकता से नहीं आ रही है, बल्कि यह इस्लाम फोर्ब्स से भी आ रही है।  यह उन लोगों से आ रही है, जो मेरी फिल्म में स्वरा भास्कर या शबाना आजमी को नहीं देखना चाहते हैं। जबकि दुनिया मेरी फिल्म का जश्न मना रही है। लेकिन घर में इसका कोई स्वागत नहीं कर रहा.जबकि यह एक ऐसी मुख्यधारा की फिल्म है। जिसे आप अपने पूरे परिवार, दोस्तों, दादी, किसी के भी साथ देख सकते हैं। मैंने इस फिल्म में ‘ एलजीबीटीक्यू ’ समुदाय की दो औरतों की प्रेम कहानी को पेष किया हैं क्योकि मैं एक बड़ी बहस शुरू करना चाहता हॅूं। मैं वह नहीं करना चाहता था, जो बाकी सभी कर रहे हैं।

क्या सिनेमा की मदद से भारत जैसे देशों में एलजीबीटीक्यू को सामान्य दर्जा दिलाया जा सकता है?

-सौ प्रतिशत संभव है। मेरी राय मे सिनेमा और फिल्मसर्जक में काफी ताकत होती है। सिनेमा लोगों की सोच, प्यार करने, कपड़े पहनने से लेकर बोलने के तरीके को भी बदल सकता है। हम अवचेतन रूप से लोगों के सोचने के तरीके और लोगों के जीवन में बदलाव ला सकते हैं।
पाकिस्तान मूल की अमरीका में रह रही पहली पीढ़ी की 45 वर्षीय बायो सेक्सुअल महिला ने अमरीका के सैनफ्रांसिस्कों में मेरी फिल्म देखकर संदेश भेजा। उस महिला ने ‘ शीर कोरमा ’ देखने के बाद पाकिस्तान में रह रही अपनी मां को फोन कर अपनी सच्चाई बतायी। फिर उसने कॉन्फ्रेंस पर अपनी मां से बात करायी। तो यह है सिनेमा की ताकत। सिर्फ सिनेमा की ताकत से न जाने कितनी जिंदगियां बदल रही हैं। हमें सिनेमा को बदलाव के साधन के रूप में इस्तेमाल करना चाहिए।

एलजीबीटीक्यू पर फिल्म बनाना कितना आसान रहा?

-बहुत कठिन है। पहली समस्या यह है कि इस तरह के विषय पर फिल्म बनाने के लिए निर्माता नहीं मिलता। किरदार के अनुरूप सही कलाकार का मिलना भी कठिन होता है। ‘ शीर कोरमा ’ की पटकथा लेकर मैं काफी भटका, पर कोई भी निर्माता इस पर फिल्म बनाने के लिए तैयार नही हुआ। सभी की राय थी कि एक महिला के चरित्र को एक पुरुष में बदल दिया जाए। वह गे फिल्म में महिलाओं की बजाय सिर्फ पुरुषों को देखना चाहते हैं। आखिर हम इतने मिथ्यावादी क्यों हैं?

क्या हम यह उम्मीद कर सकते है कि ‘‘ शीर कोरमा ’’ के बाद महिला कामुकता पर अब फिल्में बनेंगी?

-मैं तो आशावादी हॅूं। कम से कम मैं इस विषय पर और फिल्में बनाऊंगा। .मगर दूसरे लोग जिन्हें स्त्री विरोधी और समलैंगिकता से डरता है, वह कभी नही बनाएंगे।

इसके अलावा क्या कर रहे हैं?

-फिलहाल दो फिल्में बना रहा हॅूं। एक चिल्ड्ेन फिल्म है, जिसमें नौ वर्ष के बच्चे और उसके पिता व दादी की कहानी है। यानी कि पूरी एक पीढ़ी की कहानी है। दूसरी फिल्म रोड ट्पि रोमांस पर है। यह कहानी मुंबई से जयपुर होते हुए दिल्ली जाएगी। इसमें दो लड़कों की प्रेम कहानी है। पहली बार एलजीबीटी समुदाय की रोड ट्पि रोमांस पर यह फिल्म बनेगी। यह मेन स्ट्रीम/मुख्यधारा वाली फिल्म है। पिछले पांच वर्ष में प्यार की परिभाषा ही बदल गयी है। अब लोग किसी एक इंसान के साथ बंधकर नहीं कई लोगों के साथ प्यार में रहना चाहते हैं।

फिल्म शीर कोरमा की अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में शिरकत और पुरस्कारः

1-द पाम स्प्रिंग्स एलजीबीटीक्यू फिल्म फेस्टिवल, में आधिकारिक चयन
2-‘लॉन्ग बीच क्यूफिल्म फेस्टिवल’में आधिकारिक चयन
3-‘शिकागो दक्षिण एशियाई फिल्म समारोह’में आधिकारिक चयन
4-‘तस्वीर दक्षिण एशियाई फिल्म महोत्सव’में आधिकारिक चयन
5-बाफ्टा क्वालीफाइंग में ‘सर्वश्रेष्ठ लघु फिल्म, फ्रेम लाइन पुरस्कार
6-‘‘ गैस्पारिला इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’’में ग्रैंड जूरी अवार्ड
7-‘आउट फिल्म सी टी ’ में सर्वश्रेष्ठ लघु फिल्म पुरस्कार
8-‘आउटसाउथ क्वीर फिल्म फेस्टिवल’’में ग्रैंड जूरी अवार्ड
9-‘ओवर-द-राइन अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह ’’में ग्रैंड जूरी अवार्ड
10-‘वेस्ट साउंड फिल्म फेस्टिवल’में सर्वश्रेष्ठ नैरेटिव लघु फिल्म पुरस्कार
11-‘‘एस एफ क्वीर फिल्म समारोह’में  ग्रैंड जूरी पुरस्कार
12-इंडियन फिल्म फेस्टिवल मेलबर्न ’में इक्वालिटी इन सिनेमा पुरस्कार
13-‘इंडियान फिल्म फेस्टिवल आफ सिनसिनाटी’में सर्वश्रेष्ठ लघु फिल्म का पुरस्कार
14-‘एक्लॉड ग्लोबल फिल्म कंपटीशन में उत्कृष्टता का पुरस्कार

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Mayapuri