1962: द वॉर इन द हिल्स एक ऐसी वेब सीरीज है जिसे हर हाल में देखा जाना चाहिए

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कोई नहीं चाहता कि जंग हो, लड़कर भला कौन सी मुसीबत हल हो सकी है। इतिहास भी यही सिखाता है और आदर्श भी यही कहते हैं। पर कोई हमारे घर में घुसके हमें धमकाने लगे तो जंग ही प्रथम और अंतिम रास्ता बाकी रह जाता है।

1962: द वॉर इन द हिल्स गुरुवार रात को OTT प्लेटफॉर्म डिज़्नी प्लस हॉटस्टार पर रिलीज़ हो चुकी है। 10 एपिसोड की ये सीरीज 1962 में भारत – चीन जंग पर बेस्ड है। इसमें खास गलवान घाटी की जंग हाइलाइट की गई है जहां 125 भारतीय जवानों के सामने 3000 चीनी सैनिक थे मगर इन जवानों ने अपनी पोस्ट नहीं छोड़ी थी। आइए जानते हैं कि इस वेब सीरीज में क्या दिखाया है।

कहानी बड़ी इन्टरिस्टिंग है

पहले एपिसोड की शुरुआत ही चीनी बॉर्डर पर जंग की तैयारियों और उनके प्रेसीडेंट के भारत दौरे से होती है। भारतीय सेना के लेफ्ट. जेनेरल तत्कालीन प्रधानमन्त्री  नेहरू जी (आरिफ़ ज़करिया) से कहते भी हैं कि चीन जंग की तैयारी कर रहा है पर वो बात को सीरीअस नहीं लेते।

दूसरी ओर, मेजर खट्टर (अनूप सोनी) और मेजर सूरज सिंह (अभय देओल) की कम्पनीज़ के बीच स्पोर्ट्स टूर्नामेंट हो रहा है। इनकी कंपनी के जवानों की अपनी कहानियाँ भी चल रही हैं जहां किशन (आकाश ठोसर) और करन (रोहन गंडोत्रा) रेवाड़ी में रहते हैं और एक ही लड़की राधा (हेमल इंगले)  से प्यार कर बैठे हैं।

तीसरी कहानी राम कुमार (सुमित व्यास) की चल रही है। उनकी बीवी नहीं है पर एक बेटा राजू (प्रेम धर्माधिकारी) है जो अपनी माँ के बारे में ढेर सवाल पूछता है।

वेब सीरीज की ये अच्छी बात है कि आप एक मेजर कहानी के साथ-साथ कई सबलाइंस पर तकरीबन हर कैरेक्टर की कहानी दिखाकर कैरेक्टर डिवेलप कर सकते हो। इसमें भी वॉर फ्रन्ट से ज़्यादा पर्सनल स्टोरीज़ पर फोकस है। लव ट्राइऐंगल पहले एपिसोड से ही शुरु हो चुका है। सारी कहानी फ्लैशबैक में मेजर सूरज सिंह की पत्नी शगुन (माही गिल, गौरी वर्मा 80 साल की शगुन के रूप में) द्वारा अपने नाती-नातिन को सुनाई जा रही है।

वेब सीरीज का स्क्रीनप्ले चारूदत्त आचार्य ने लिखा है और डायरेक्शन महेश मांजरेकर ने किया है। स्क्रीनप्ले जितना मनोरजंक और ट्विस्ट भरा लगता है उतना डायरेक्शन उतना ग्रिपिंग नहीं लगा। एडिटिंग भी बहुत हल्के तरीके से की गई लगती पर वॉर सीन्स अच्छे बने हैं।

म्यूजिक काम्पज़िशन हितेश मोदक ने किया है जो बेअसर है। सबसे बड़ी समस्या साउन्ड की है, वॉयस-ओवर और डबिंग की है। सीरीज के 90% डाइलॉग बाद में डब किए हैं जिसकी वजह से कई जगह लिपसिंक नहीं हुए हैं। कुछ जगह ऐसा लगता है मानों किसी और भाषा की फिल्म हिन्दी डबिंग में देख रहे हैं। लद्दाखी, चीनी, हरयानवी, सब एक ही भाषा, एक ही लहजे में बात कर रहे हैं जो बिल्कुल नहीं जम रहा। हालांकि सीरीज की शुरुआत में ही ये डिसक्लेमर मिलता है कि चीनी लोगों को हिन्दी बोलते इसलिए दिखाया गया है ताकि समझने में दिक्कत न हो। जो अपनी जगह ठीक भी है।

एक्टिंग सबने अच्छी की है। अभय देओल हालांकि फुल एनरजेटिक नहीं नज़र आ रहे, वहीं अनूप सोनी और सुमित व्यास अपना बेस्ट देते दिख रहे हैं। आकाश ठोसर और रोहन गंडोत्रा, दोनों ने कमाल कर दिया है। बहुत अच्छे लग रहे हैं, बहुत अच्छी एक्टिंग करते नज़र आ रहे हैं। माही गिल भी अच्छी लगी हैं। मियांग चेंग भी अपने रोल को जस्टफाई करते नज़र आते हैं। कुछ सीन्स में उन्होंने जान डाल दी है, पर उनका पार्ट बहुत कम है।

कुलमिलाकर एक्टिंग सबकी अच्छी है। रोचेले राव, जिन्हें अबतक कपिल शर्मा में नर्स बने देखा था, यहाँ दूधवाली बनी हैं जो बहुत बहादुर हैं, इक्स्प्रेशन इनके भी अच्छे हैं बस डाइलॉग डेलीवेरी में दिक्कत हुई है।

विएफएक्स भी ठीक हैं।

कुछ एक संवाद बहुत अच्छे हैं।  जैसे – “जब तक आप अपने लिए सीरीअस नहीं होते, कोई आपको सीरीअस नहीं लेता”

कुलमिलाकर सीरीज लिखी अच्छी है, जंग में लड़ते जवानों के घरवालों पर क्या बीतती है, उनका जीवन कैसे बदल जाता है इसपर फोकस रखना अच्छा लगता है, सबकी एक्टिंग भी इंप्रेस करती है लेकिन वॉर वाला पार्ट ज़रा हल्का पड़ता है। हालांकि 9वां एपिसोड, The last Stand बहुत बढ़िया बना है। रात में वॉर के सीन दिन के मुकाबले अधिक रियल लगे हैं। एक लाइन में लिखूँ तो अगर आप बीती किसी फिल्म, खासकर जेपी दत्ता की बॉर्डर से तुलना नहीं करते हैं – जो की अपने आप में इकलौती फिल्म थी, वैसी फिल्म खुद जेपी दत्ता भी दोबारा नहीं बना सके – तो ये एक मस्ट वाच है।

रेटिंग – 8.5/10*

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Mayapuri

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