मूवी रिव्यू: बत्तीस साल पहले घटी खौफनाक घटना का एहसास ’31 अक्टूबर’

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रेटिंग**

करीब बत्तीस साल पहले पूरे देश में सिखों के साथ खेला गया मौत का तांडव आज भी रोंगटे खडे कर देता है। 31 अक्टूबर को देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को उन्हीं के सिख सुरक्षा गाडो ने गोलियों से भून दिया था। उसके अगले दिन से बदले की भावना को लेकर तकरीबन पूरे देश में सिख समुदाय को उन्मादी दानवों ने मौत के निशाने पर रखते हुये हजारों सिखों को मौत के घाट उतार दिया था। लेखक निर्देशक शिवाजी लोटन पाटिल ने इस मंजर को एक सिख परिवार के तहत अपनी फिल्म ’31 अक्टूबर’  में दिखाने की कोशिश की है।

कहानी

दिल्ली में देवेन्दर सिंह उर्फ वीरदास अपनी पत्नि तजेन्दर कौर उर्फ सोहा अली खान तथा अपने तीन बच्चों के साथ हंसी खुशी दिन बिता रहा है। एक दिन उसे पता लता है कि इंदिरा गांधी के सिख सुरक्षा गाडो ने उनके घर पर उन्हें गोलियों से भून दिया। इस हत्या कांड के अगले दिन अन्य सिख परिवारों के साथ साथ उसके परिवार पर भी जैसे आफत आ गई। देवेन्दर को आश्चर्य हो रहा था कि मौत देने वाले उस काफिले में उसके संगी साथी तथा पड़ोसी भी शामिल थे। बाद में उन मौत के हरकारों से दोनो पति पत्नि अपने और अपने बच्चों को किस तरह बचाते हैं। संतोष की बात ये रही कि उन दरिन्दों के अलावा कुछ ऐसे चेहरे भी सामने आये जो फरिश्तों की तरह सामने आये जो मानवता के हरकारे थे और जिन्होंने इन्सानियत का सुबूत देते हुये हजारों सिखो के जानमाल की रक्षा की। उस खौफनाक खूनी रात को पूरे बत्तीस साल होने को आये लेकिन देवेन्दर और तजेन्दर को आज भी न्याय मिलने का इंतजार है।31st-october

निर्देशक

शिवाजी लोटन पाटिल मराठी फिल्म के लिये नैशनल अवार्ड प्राप्त निर्देशक हैं। लेकिन इस फिल्म के सीमित बजट की वजह से वे उस मंजर को सही ढंग से नहीं दिखा पाते। क्योंकि छोटे बजट की वजह से उन्होंने इस घटना को महज एक गली तक ही सीमित रखा जो उस घटना को प्रभावशाली नहीं बना पाता। इसी वजह से पूरी फिल्म नाटकीय बनकर रह गई। बताया जाता है कि उस हत्याकांड ने सरकारी आंकड़ों के अनुसार दो से ढाई हजार सिखों की बली ली थी जबकि ये गिनती कई हजार तक बताई जाती है। इस कांड में राजनैतिक तथा पुलिस महकमे तक शामिल थे। ये सब फिल्म में नहीं दिखाया गया इसके अलावा और भी ढेर सारी कमियों के कारण फिल्म सपाट होकर रह जाती है। फिल्म की तरह उसका संगीत भी साधारण रहा।vir-das_

अभिनय

फिल्म में सोहा अली तथा वीरदास दोनों ने ही अपनी भूमिकाओं के तहत काफी मेहनत की है लेकिन चाहकर भी वे इस सीमित साधनों वाली फिल्म में अपना प्रभाव नहीं छोड़ पाते। यही हाल फिल्म के सहयोगी कलाकारों का रहा।

क्यों देखें

जो दर्शक उस वक्त पैदा नहीं हुये थे फिल्म देखकर उन्हें उस खौफनाक घटना का एहसास जरूर हो सकता है।


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Mayapuri

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