समाज को आईना दिखाती हैं बॉलीवुड की ये 5 फिल्में

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फिल्में कहीं न कहीं समाज का आईना होती है ये दर्शकों का मनोंरजन तो करती ही हैं साथ ही संदेश भी देती हैं।  हर साल बॉलीवुड में न जाने कितनी फिल्में बनती है लेकिन उनमें से कुछ ही फिल्में ऐसी होती हैं जो दर्शकों के दिलों में अपनी एक अलग ही जगह बना पाती है। ये फिल्में भले ही बॉक्स आफिस पर उतना क्लेकशन न कर पाती हो लेकिन दर्शक ऐसी फिल्मों को बार बार देखना पसंद करते हैं। ऐसे ही कुछ फिल्मों का जिक्र हम करने जा रहे है जिन्होंने दर्शकों के दिलों में न केवल अपनी एक अलग जगह बनाई बल्कि उनको सोचने पर मज़बूर कर दिया।

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पीपली लाइव

फिल्म पीपली लाइव की कहानी हमारे सिस्टम और मीडिया पर तीखा व्यंग्य करती है जो एक दम सटीक है। ऐसा कहा जाता है कि हमारा देश एक कृषि प्रधान देश हैं, लेकिन उसी देश के किसानों के हालात बद्दतर है, उसी के पास खाने को दाना नहीं है जो दाना उगाता है और हालात ऐसे पैदा हो गए हैं कि वो मौत को गले लगाने की सोचता है। क्या नेता और क्या पत्रकार सभी उसकी मौत का तमाशा बना देते हैं लेकिन किसी के पास उसकी समस्या का हल नहीं होता। उसकी मौत पर को अपनी कामयाबी का जरिया बनाने की सोच रखते हैं। जो कि एक कड़वा सच है। निर्देशक अनुषा रिज्वी ने इस फिल्म में शानदार काम किया है। राजनेताओं पर तो तंज कसती है ये फिल्म साथ ही आज कल चैनल वाले भी अपने टीआरपी के चक्कर में बातों को तोड़-मरोड़ कर बातों को पेश करते हैं ये भी बखूबी दर्शाया गया है पीपली लाइव में।

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उड़ान

निर्देशक विक्रमादित्य मोटेवाने की फिल्म उड़ान, कहानी है एक ऐसे युवक की जिसमें वो अपने तानाशाह और निर्दयी पिता से जूझता है, एक अंजान सौतेले भाई से रिश्ता बनाता है और कैसे वो अपने पिता की मर्ज़ी के खिलाफ अपने ख्वाबों को पूरा करता है|ये  फिल्म की कहानी दर्शकों को सोचने पर और अपने अंदर झाँकने पर मजबूर कर देती है| इस फिल्म की कहानी को बेहद ही खूबसूरती से पिरोया गया है। देखा जाए तो उड़ान हर किसी की निजी जिंदगी से संबंधित है और हर पिता और बेटे के लिए अनिवार्य फिल्म है| फिल्म की कहानी एक नया नज़रिया पेश करती है जिससे हर व्यक्ति अपने आप को जोड़ सकता है|

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डोर

यह फिल्म दो भिन्न तबके की दो महिलाओं पर आधारित है जो एक दूसरे से अंजान होते हुए भी एक डोर में बंधी है। एक की वीरान जिंदगी दूसरे को उजड़ने से बचा सकती है पर बीच में बहुत से फ़ासले हैं। इनमें पहली महिला ज़ीनत  का पति आमिर नौकरी के लिए सउदी अरब जाता है जहां उसे हत्या के फाँसी की सज़ा दी जाती है। सउदी अरब के क़ानून के अनुसार यदि मृतक की पत्नी हत्यारे के माफीनामे पर हस्ताक्षर कर दे तो उसकी सज़ा माफ़ हो सकती है।माफीनामा लेकर ज़ीनत अपने पति को बचाने का लिए शंकर की पत्नी मीरा से मिलने राजस्थान निकल पड़ती है। प्रेम, निराशा, दोस्ती और आशा की सीधी सादी कहानी है डोर। इस फिल्म को देखते समय ऐसा लगता है मानो हर दृश्य अपनी कहानी खुद बयाँ करते हों|

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तारे जमीं पर

इस तरह की फिल्में भारतीय सिनेमा में बहुत कम बनती है। ये खूबसूरत फिल्म एक ऐसे बच्चे ईशान से संबंधित है जो dyslexia की समस्या से जूझ रहा होता है लेकिन अपने आसपास के तानों के चलते ये ही दिखाने की कोशिश करता है कि उसे वो सब आता है जिसकी उम्मीद उसके घरवाले कर रहे होते। इस कशमकश में उसका व्यवहार उग्र होता जाता है जिसके चलते उसे बोर्डिंग स्कूल में भेज दिया जाता है। वहाँ भी उसकी समस्या से सभी अनजान रहकर उसके साथ व्यवहार करते हैं लेकिन फिर स्कूल में आगमन होता है एक नये टीचर राम शंकर निकुम्भ का जो चूंकि स्पेशियल बच्चों के स्कूल में पढ़ाने का अभ्यस्त होने की वजह से तुरंत ये जान जाता है। तारे जमीन पर वाकई में बहुत ही दमदार फिल्म है जो संदेश देती है कि हर बच्चा अपने आप में अलग है और इनकी आपस मे तुलना तो नही की जानी चाहिए ।

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रंग दे बसंती

रंग दे बसंती ये एक ऐसी फिल्म है जिसको किसी परिचय की जरूरत नहीं है और ये अपने आप में ही बहुत कुछ कह जाती है। भ्रष्टाचार और नौकरशाही जैसे मुद्दों से निपटती ये फिल्म आज के युवाओँ के लिए बहुत बड़ी प्रेरणा स्रोत है। ये एक बार फिर से स्वतंत्रता के उन दौर को याद दिलाती है जब भगत सिंह और सुखदेव जैसे देश भक्तों ने देश के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी थी उसी तरह आज का युथ भी देश के लिए जरूर कुछ न कुछ जरूर कर सकता है।

 

 

 

 


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Pankaj Namdev

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