मेरे मामूली मुकुट में एक बहुत ही अनमोल रत्न… डाॅ बी. आर. चोपड़ा

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डाॅ बी. आर. चोपड़ा

-अली पीटर जॉन

मुझे यह विश्वास करना बहुत मुश्किल है कि मेरे जीवन में कुछ महान लोग कैसे आए और इसे कई तरह से समृद्ध बनाया, जो वास्तव में दुनिया के कुछ सबसे अमीर लोगो की तुलना में मेरे लिए अधिक हैं।

जैसे, क्या किसी के पास महान डॉ. बलदेव राज (बी.आर.) चोपड़ा जैसा कोई दोस्त हो सकते है, जो भारत में और यहां तक कि कही भी सबसे बडे फिल्म निर्माता में से एक हैं जिनकी हर जगह बात की जाती हैं?

मैं ‘स्क्रीन’ में शामिल हुआ था और कुछ महत्वपूर्ण और कुछ अमहत्वपूर्ण लेख लिखने शुरू किये थे। मेरे एडिटर ने मुझे डॉ.चोपड़ा से मिलने के लिए कहा था और मैं सचमुच एक ऐसे शख्स से मिलने से घबरा रहा था, जिसके बारे में मैंने केवल सुना ही था, क्योंकि एक फिल्मकार के रूप में उनकी शानदार प्रतिष्ठा के कारण से उन्हें जानता था। मुझे उनसे आनंद भवन में उनके ऑफिस में मिलना था और सबसे पहले जो डॉ. चोपड़ा ने कहा था, “मैंने भी एक फिल्म पत्रकार के रूप में अपना जीवन शुरू किया था। मैं स्क्रीन में लिखे आपके कुछ लेख पढ़ रहा हूं और मुझे कहना होगा कि आप बहुत अच्छा लिखते हैं।” यह एक तारीफ थी जो मुझे पहली बार मिली थी और वह भी डॉ. चोपड़ा जैसे शख्स से। जिसने मुझे बढ़ावा दिया था और मुझ जैसे एक न्यूकमर में एक विश्वास जगाया था।

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उस पहली मुलाकात से उस आदमी के साथ मेरी सैकड़ों अन्य मुलाकाते हुईं, जिन्होंने फिल्म उद्योग को बहुत प्रतिष्ठा दी थी, खासकर उस समय जब फिल्म इंडस्ट्री और इससे जुड़ी हर चीज को देखने का काम किया जाता था। इन मुलाकातों के दौरान डॉ.चोपड़ा से मैंने भारतीय सिनेमा के बारे में सबक सिखा और डॉ.चोपड़ा के अनुसार एक अच्छा इंसान बनने का पाठ भी समझा जो जीवन के किसी भी क्षेत्र में मेरे लिए कुछ भी महान होने से ज्यादा महत्वपूर्ण था।

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एक समय ऐसा आया जब हमारी मुलाकाते साप्ताहिक रूप से बढ़ गई थी और हमने उनके ऑफिस में लंच सेशन भी लिए थे, जहाँ फिल्मों, राजनीति और अन्य दिलचस्प विषयों के बारे में कुछ व्यस्त चर्चाओं के साथ दोपहर के भोजन का आनंद लिया जाता था और डॉ.चोपड़ा ने हमेशा दोपहर के लंच के दौरान अपने साथ राइटरस की अपनी टीम को साथ रखा और नियमित रूप से डॉ राही मासूम रजा, सतीश भटनागर, डॉ.अचला नागर, और राम गोविंद थे और उनके साथ उनका एकमात्र बेटा, निर्देशक रवि चोपड़ा भी अपनी पत्नी रेनू के साथ होते थे। जो दोपहर के भोजन की व्यवस्था और उसकी देखभाल करती थी और चर्चाओं में भी भाग लेती थी और जो डॉ.चोपड़ा की पसंदीदा भी थी जिन्होंने उन्होंने ‘बेटी’ कहा था।

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डॉ. चोपड़ा मेरे लिए हमेशा अधिक दयालु रहते थे और यहां तक कि अपनी पत्नी प्रकाश से भी मेरे लिए एक विशेष व्यंजन बनाने के लिए कहते थे। उन्होंने एक बार मुझे अपनी तीन साल की बेटी स्वाति को उनके ऑफिस में लाने के लिए कहा और जब हम उनके ऑफिस पहुँचे, तो वह उसके लिए एक बहुत ही महंगी ड्रेस लेकर आए थे और साइज के बारे में इतना सटीक थे कि स्वाति को उस ड्रेस को फिट करने की जरुरत ही नहीं पड़ी और स्वाति ने कई सालों तक उस ड्रेस को पहना।

उन्होंने मुझे यह बताने के लिए एक पॉइंट बनाया कि मैं उन नई फिल्मों के बारे में पहले से जानता हूं, जिन्हें वह बनाने की योजना बना रहे थे और मुझे यह कहने का सौभाग्य मिला कि मैं पहला था जो महाभारत बनाने की उनकी महत्वाकांक्षा के बारे में जानता था। वह सीरियल जो अब एक इतिहास बन गया है। मुझे डॉ. चोपड़ा को सुनने का भी सौभाग्य मिला, जो मुझे एक फिल्म की कहानी बता रहे थे, जिसे वह अपने दोस्त दिलीप कुमार के साथ बनाना चाहते थे। वह कहानी अंततः अमिताभ बच्चन के साथ बनी थी और रवि चोपड़ा द्वारा निर्देशित की गई थी जब डॉ.चोपड़ा ने पहली बार अल्जाइमर का शिकार होने के संकेत दिखाए थे। फिल्म का नाम था ‘बागबान’।

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हम अपना पहला पुरस्कार ले रहे थे और मैं दिलीप कुमार को जूरी का अध्यक्ष बनने के लिए सहमत करने में कामयाब

रहा था और मुझे वाइस चेयरमैन बनने के लिए किसी की जरूरत थी। मुझे केवल डॉ.चोपड़ा से इसका उल्लेख करना था और वह बिना शर्त सहमत हुए और दिलीप कुमार की तरह, और वह एक भी स्क्रीनिंग मिस करने से कभी नहीं चूके और सभी चर्चाओं में सक्रिय भाग लिया।

मेरे पास बी.के.करंजिया नामक एक संपादक थे जो डॉ. चोपड़ा के प्रिय मित्र थे। हम अपने भ्रष्ट तरीकों के कारण अपने बीच बहुत गंभीर समस्याएं लेकर आए थे। करंजिया ने मुझे स्क्रीन से बाहर निकलवाने की पूरी कोशिश की। और मेरे खिलाफ उनकी इस गंदी हरकत में, उन्होंने डॉ. चोपड़ा को एक पत्र लिखकर उनसे इंडियन एक्सप्रेस को लिखने और श्री रामनाथ गोयनका से मेरी शिकायत करने के लिए कहा, कि मैंने अपने लिखे हर शब्द के लिए पैसे की मांग की।

डॉ.चोपड़ा ने मुझे अपने ऑफिस में बुलाया। और गर्म चाय का एक कप पीने के बाद, डॉ.चोपड़ा ने करंजिया द्वारा लिखा पत्र मुझे दिया और मुझे बताया, “करंजिया मेरे दोस्त हैं, लेकिन मैंने वह करने से इंकार कर दिया, जो उन्होंने मुझसे करने के लिए कहा, हालांकि उन्होंने मेरी फिल्मों के लिए प्रचार करने का मुझसे वादा भी किया है। मुझे पता है कि अली आप क्या हो और मैं सिर्फ अपने फायदे के लिए आपको धोखा नहीं दे सकता।” करंजिया ने महेंद्र कपूर को एक ऐसा ही पत्र लिखा था, जिस गायक को अपने बेटे रुहान के लिए प्रचार की जरूरत थी जिसने अभिनेता के रूप में अपनी शुरुआत की थी, लेकिन गायक ने मुझे ‘पेडर रोड’ पर अपने घर बुलाया और मुझे पत्र दिखाया कि करंजिया ने उन्हें यह लिखा था और कहा, “मुझे करंजिया साहब की जरूरत है, लेकिन अली को नुक्सान करने से नहीं, मैंने अगर ऐसा किया तो मुझे भी और रूहान को भी बद्दुआ लगेगी, मैं क्या ऐसे कर सकता हूँ क्या, अली साहब?” करंजिया ने फिर कभी भी मेरे साथ इस तरह के गंदे खेल खेलने की कोशिश नहीं की।

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मैं अपनी आत्मकथा रिलीज कर रहा था और मुझे पता है कि डॉ.चोपड़ा बहुत बीमार थे और समारोह में शामिल नहीं हो पाएंगे। लेकिन उन्हें इसके बारे में पता चला और समारोह की शाम को, मैं उन्हें व्हीलचेयर पर बैठे सभागार में आते देख हेरान रह गया था और जिस तरह से उन्होंने मेरा हाथ पकड़ कर मेरी आँखों में देखा, मुझे ऐसा लगा जैसे उन्होंने मेरे बारे में कोई किताब लिखी हो।

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मैं उनसे तब भी मिलता रहा जब मैं जानता था कि उन्हें यह भी पता नहीं था कि उनके आसपास क्या हो रहा है, लेकिन सिर्फ उनके साथ होना प्रेरणा का स्रोत था। डॉ.चोपड़ा हर सुबह ऑफिस जाते थे और लंच तक ऑफिस में ही रहते थे और अपने सभी लेखकों और उनकी बहू रेनू उनका बहुत ध्यान रखती थी और फिर बेचैन महसूस किया और फिर एक नवीनतम ब्रांडेड मर्सिडीज कार में बैठ कर घर चले गए थे।

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और डॉ.चोपड़ा के बारे में अभी भी एक अद्भुत रहस्य है कि कैसे जब वे गंभीर रूप से बीमार थे, तब भी उन्हें याद था? कि उनके ऑफिस में हर महीने की 7 तारीख को सैलरी डे होता था। उन्होंने 170 सैलरी चेक पर साइन किए थे। उन्होंने हमेशा अपने कर्मचारियों की देखभाल की और हमेशा समय पर उनकी सैलरी और बोनस का भुगतान किया, कभी-कभी तब भी जब बी.आर.फिल्म्स ‘फाइनेंसियल क्राइसिस’ का सामना कर रही थी।

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ऐसे लोग सिर्फ एक बार आते है और फिर कभी ना आते है, ना बनते है, चाहे खुदा चाहे या किस्मत


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Mayapuri

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