INTERVIEW!! ‘‘ओसामा बिन लादेन हमेशा विलेन के रूप में इतिहास के पन्नों में जिंदा रहेगा..’’ अभिषेक शर्मा – निर्देशक

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फिल्म ‘तेरे बिन लादेन: डेड आर अलाइव’

‘तेरे बिन लादेन’ जैसी सफल पॉलीटिकल सटायर फिल्म के लेखक व निर्देशक अब इसका सीक्वल ‘तेरे बिन लादेन: डेड आर अलाइव’ लेकर आ रहे हैं। वैसे उन्होंने ‘तेरे बिन लादेन’ के बाद अक्षय कुमार, अनुपम खेर व अनु कपूर के अभिनय से सजी फिल्म ‘शौकीन’ का भी निर्देशन किया था पर इस फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर कुछ खास सफलता नहीं मिल पायी थी लेकिन अभिषेक शर्मा को ‘तेरे बिन लादेन: डेड आर अलाइव’ से काफी उम्मीदें हैं।

पहली फिल्म ‘तेरे बिन लादेन’ का किस तरह का रिस्पाँस मिला था ?

पहली फिल्म का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन जबरदस्त था इसके साथ ही लोगों से हमें बहुत प्यार मिला। मेरे ख्याल से नब्बे प्रतिशत लोगों ने इस फिल्म को बाद में टीवी पर देखा। आज की तारीख में सड़क पर चलते इंसान को जब मैं बताता हूं कि मैंने ही ‘तेरे बिन लादेन’ बनायी थी, तो उसका मेरे प्रति व्यवहार इतना प्यारा हो जाता है कि मैं उसे शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता इसलिए इसका सीक्वल बनाना जरुरी हो गया था लेकिन हमें इसका सीक्वल बनाने का ख्याल तब आया, जब ओसामा बिन लादेन की मौत हो गयी जबकि लोग सोचते हैं कि ओसामा बिन लादेन मर गया, तो अब उसके सीक्वल की क्या जरुरत पर हमें जरुरत महसूस हुई, इसलिए हम अब ‘तेरे बिन लादेन: डेड आर अलाइव’ लेकर आ रहे हैं।

फिल्म का नाम ‘तेरे बिन लादेन- डेड आर अलाइव’ यह नाम रखने के पीछे क्या सोच रही ?

फिल्म में दो पक्षों की बात है अमेरीका की संस्था सीआईए यह साबित करने पर तुली है कि ओसामा मर गया पर उसने कोई फोटो या किसी अन्य तरह का कोई सबूत नहीं दिया। इस फिल्म में उन्हें प्रूफ जारी कर यह साबित करना है कि ओसामा मर गया। उधर पाकिस्तान या यूँ कहें कि वहां का आतंकवादी संगठन खलीली साबित करने पर तुला है कि ओसामा जिंदा है, जिससे उनकी फंडिंग जारी रहे तो हमारी फिल्म में एक को ओसामा जिंदा, तो दूसरे को मरा हुआ चाहिए और इनके बीच फंसे हुए हैं प्रद्युमन सिंह तथा मनीष पॉल।

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यानि कि आपकी फिल्म में राजनीति का भी चित्रण है ?

जी हाँ! यह पिछली बार की ही तरह इस बार भी पॉलीटिकल सटायर वाली फिल्म है पिछली बार अमेरीका में जॉर्ज बुश राष्ट्रपति थे, इस बार ओबामा राष्ट्रपति हैं। इस बार हमने पागलपन को ज्यादा बढ़ाया है, मुझे उम्मीद है कि इस बार यह फिल्म लोगों को ज्यादा पसंद आएगी।

सीक्वल फिल्म बनाना कितना आसान होता है ?

इस फिल्म के निर्माण में ज्यादा तकलीफ आयी, यह सीक्वल से ज्यादा स्पिन ऑफ है। यह आम सीक्वल फिल्म नहीं है। जहां पहली कहानी शुरू हुई थी, वहीं से इस फिल्म की कहानी शुरू नहीं हुई है। पहली फिल्म वाले किरदार भी नहीं हैं हमने इस फिल्म में उन किरदारों को लेकर नया रूप तैयार किया है। यह अपने आप में एक मौलिक सीक्वल फिल्म है इस फिल्म को बनाना तो दूर लिखना भी बहुत मुश्किल था इसे क्रिएट करना मुश्किल था इसमें हैलीकॉप्टर बनाना या अहपटाबाद का सेट वगैरह लगाना आसान नहीं था। अमेरीका ने ओसामा बिन लादेन को मारने के लिए जो हैलीकॉप्टर भेजा था, वह आम हैलीकॉप्टर नहीं था उस हैलीकॉप्टर की ज्यादा फोटो भी मौजूद नहीं हैं। उसको बनाना आसान नहीं था।

मनीष पॉल को इस फिल्म के साथ जोड़ने की क्या वजह रही?

यह कहानी है शर्मा की, जिसके लिए हमें जिस तरह की एनर्जी और कॉमिक टाइमिंग चाहिए थी, उसके लिए हमें मनीष पॉल ही सटीक लगे। मनीष पॉल को मैंने ‘झलक दिखला जा’ में देखा था। उसकी कॉमिक टाइमिंग तो कमाल की है, साथ ही उनका ह्यूमर भी कमाल का है। उनकी सबसे बड़ी खूबी है कि सामने वाले को अपमानित किए बगैर ही वह उसका मजाक उड़ा लेते हैं। वह बड़े से बड़े लोगों का इस तरह से मजाक उड़ाते हैं, कि लोगों को बुरा नहीं लगता। उनकी इसी खूबी ने मुझे उन्हें इस फिल्म के साथ जोड़ने के लिए प्रेरित किया।

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बीच में आपने ‘शौकीन’ जैसी फिल्म डायरेक्ट की थी, जिसे बॉक्स ऑफिस पर सफलता नहीं मिल पायी थी ?

इस फिल्म का मैं लेखक नहीं था, सिर्फ निर्देशक था, इसे तिग्मांशु धुलिया ने लिखा था। हमने तो फिल्म अच्छी बनायी थी पर हो सकता है कि दर्शक को उनकी अपेक्षा के अनुरूप ह्यूमर न मिला हो या उसकी मार्केटिंग में गलती हो गयी हो लेकिन मैं फिल्म का पोस्ट मार्टम करने में यकीन नहीं करता। मेरा यकीन यह है कि हम मेहनत व ईमानदारी के साथ अपने काम को अंजाम दें। हम अच्छा काम करने की कोशिश करते हैं। इसकी मौलिक फिल्म, जिसे बासुदा ने निर्देशित किया था, वह कमाल की थी और अपने समय से काफी आगे की फिल्म थी। मैं तो हर फिल्म दर्शकों के साथ ही देखता हूं। मैंने ‘शौकीन’ भी दर्शकों के साथ ही बैठकर देखी थी। मैंने तो दर्शक को इंज्वॉय करते हुए पाया था पर हमने जितने दर्शक सोचे थे, उतने दर्शक थिएटर के अंदर आए नहीं। फिल्म की असफलता के लिए हम किसी को दोष नहीं देते। इस फिल्म में अक्षय कुमार, अनुपम खेर व अनु कपूर सहित कई बड़े कलाकारों के साथ हमने काम करते हुए बहुत कुछ सीखा था और इंज्वॉय भी किया था। इन कलाकारों ने तो हमें काफी सपोर्ट भी किया था।

आप लेखन और निर्देशन में से कहाँ ज्यादा इंज्वॉय करते हैं ?

दोनों का अपना मजा है लेखन का मजा यह है कि हम कुछ नया क्रिएट करते हैं शूटिंग का अनुभव सबसे ज्यादा मजेदार होता है तो लेखन व निर्देशन दोनों के अलग अलग नशे हैं।

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अपनी लिखी पटकथा पर फिल्म निर्देशित करना तथा दूसरे की लिखी पटकथा पर फिल्म निर्देशित करने में से कहाँ आप खुद को ज्यादा सहज पाते हैं ?

जब हम खुद की लिखी हुई पटकथा पर फिल्म निर्देशित करते हैं, तो उस वक्त फिल्म और फिल्म का हर पात्र हमारे अंदर घुसा होता है। जब हम दूसरे की लिखी पटकथा पर फिल्म निर्देशित करते हैं, तो उसमें मजा यह आता है कि जब हम उसमें अपना तड़का लगाते हैं दोनों की अपनी अपनी समस्या और अपने अपने मजे हैं।

कॉरपोरेट कंपनियों की वजह से सिनेमा की क्रिएटिविटी को नुकसान हो रहा है या फायदा ?

मेरी नजर में कॉरपोरेट के आने से सिनेमा के बिजनेस को फायदा ही हो रहा है पर क्रिएटिविटी जहां की तहां ही है। जिसके पैसे लगते हैं, वह थोड़ा बहुत उंगली जरुर करता है, फिर चाहे वह सिंगल निर्माता हो या कॉरपोरेट कंपनी हो। अब सारा काम योजनाबद्ध तरीके से होने लगा है।

 


Mayapuri