अली सरदार जाफरी

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एक और अज़ीमो शान शायर 

अली सरदार जाफरी को सिर्फ एक शायर कहना नाइन्साफ़ी होगी क्योकि वो सिर्फ एक शायर नहीं थे बल्कि सरदार जाफ़री एक आलोचक भी थे, अच्छे फ़िल्मसाज़ भी थे, प्रभावशाली वक़्ता भी थे और उनके साथ 99 शायरी के संकलनों के शायर भी थे जिन्होंने कई विधाओं और स्टाइल में लिखा व इस प्रतिभा की खान अली सरदार जाफरी का जन्म 1 नवम्बर, 1913 को बलरामपुर में हुआ था। वह एक प्रगतिशील लेखक आंदोलन के संस्थापकों में से एक थे। उन्होंने दिल्ली के अंग्लो-अरेबिक कॉलेज से ग्रेजुएशन की थी ।

वैसे तो जाफरी जी के जीवन की बहुत सी बातें मसहूर हैं लेकिन उनकी एक चीज सबसे ज़्यादा यादगार रही और हमेशा उनके साथ रही उन्होंने कभी शायरी नहीं छोड़ी तब भी नहीं जब इनका झुकाव वामपंथी राजनीति की ओर हुआ और वे कम्युनिस्ट पार्टी के सक्रिय सदस्य बन गए। राजनैतिक उठा-पटक का नतीजा यह हुआ कि उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा और उन्होंने कई रचनाएँ जेल की सीखचों के भीतर रह कर ही लिखीं।

 सरदार जाफ़री ने नए शब्दों और विचारों के साथ कई रचनाएँ कीं।  जाफ़री की शायरी की भाषा का बड़ा हिस्सा ईरान के उस असर से आज़ाद है, जिससे उर्दू शायरी का बड़ा हिस्सा बोझिल है, उनके यहाँ ऐसी पंक्तियाँ जैसे, ‘गाय के थन से निकलती है चमकती चाँदी’, ‘धुएँ से काले तवे भी चिंगारियों के होठो से हँस रहे हैं’ या ‘इमलियों के पत्तों पर धूप पर सुखाती है’ आदि शायरी में नए लहजे की पहचान कराते हैं।

उनका भारतीय सिनेमा मए काफी योगदान रहा जहाँ उन्होंने अपनी कई शायरियां निम्नलिखित फिल्मो के लिए भी दी ‘परवाज़’ (1944), ‘जम्हूर’ (1946), ‘नई दुनिया को सलाम’ (1947), ‘ख़ूब की लकीर’ (1949), ‘अम्मन का सितारा’ (1950), ‘एशिया जाग उठा’ (1950), ‘पत्थर की दीवार’ (1953), ‘एक ख़्वाब और (1965) पैराहने शरर (1966), ‘लहु पुकारता है’ (1978) आदि ।

जिसके लिए उन्हें कई पुरस्कार और उपाधियाँ भी दी गई जैसे पुरस्कार के रूप में उन्हें  पद्मश्री, ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया तो राष्ट्रीय उपाधियों के रूप में उन्हें -इक़बाल सम्मान, उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी पुरस्कार, रूसी सोवियत लैण्ड नेहरू पुरस्कार आदि दिए गए ।

इस अज़ीम शायर ने अपने पूरे जीवन में मज़लूम और मेहनतकश ग़रीबों की समस्याओं को उजागर करने के लिए अपनी क़लम चलाई जिसके लिए उन्हें निजी यातनाएँ भी झेलनी पडी़। 86 वर्ष की आयु तक पहुँचते-पहुँचते अपने जीवन के अंतिम दिनों में ब्रेन-ट्यूमर से ग्रस्त होकर कई माह तक मुम्बई अस्पताल में मौत से जूझते रहे और अंततः पहली अगस्त सन २००० में मुंबई में उनका स्वर्गवास हो गया।


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Mayapuri

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