‘‘हमारी फिल्म ‘अली: द ब्लाइंड बाॅक्सर’ लोगों को सोचने पर मजबूर करेगी’’

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बिजाॅय बनर्जी और कौशिक मंडल ने बताया कि ‘‘हमारी फिल्म ‘अली: द ब्लाइंड बाॅक्सर’ लोगों को सोचने पर मजबूर करेगी’’
शांतिस्वरूप त्रिपाठी

महाराष्ट्र में बीड़ के एक गाॅंव में रहने वाले शब्बीर षेख ने फिल्म ‘अलीः द ब्लाइंड बाॅक्सर’ में अभिनय कर एक नए इतिहास को रचा है. षब्बीर शेख ने जन्म के कुछ समय बाद ही अपनी दोनों आँखें खो दी थी. पर हिम्मत नहीं हारी थी. वह पुणे के एक अंधविद्यालय मेें शिक्षा ग्रहण कर रहे थे, लगभग पंद्रह वर्ष की उम्र में जब वह दसवीं कक्षा के छात्र थे, तब फिल्म निर्माता व निर्देशक द्वय बिजाॅय बनर्जी और कौशिक मंडल इस अंध विद्यालय में एक नई सोच के साथ पहुंचे. बिजाॅय बनर्जी की इस नई सोच ने शब्बीर शेख को भी आकर्षित किया. उसके बाद शब्बीर शेख ने दृष्टिहीन होते हुए भी बाक्सिंग सीखी.फिल्म ‘अलीःद ब्लाइंड बाक्सर’ में अभिनय किया और अब दृष्टिहीन होते हुए भी शब्बीर शेख की तमन्ना मशहूर बाक्सर/मुक्काबाज बनने की है. शब्बीर शेख  फिल्म ‘अलीःद ब्लाइंड बाक्सर’ के हीरो भी हैं. वैसे इन दिनों शब्बीर शेख पुणे के ‘‘माॅर्डन काॅलेज ऑफ आर्ट्स, साइंस एंड काॅमर्स’ में 12वीं के छात्र हैं।

इस फिल्म के संदर्भ में फिल्म ‘अली: द ब्लाइंड बाक्सर’ के निर्देशकों से ‘मायापुरी’ के लिए हुई बातचीत इस प्रकार रही….
  एक घंटे की फिल्म ‘अलीःद ब्लाइंड बाॅक्सर’ के संबंध में बिजाॅय बनर्जी बताते हैं-‘‘हमने अपने मित्र व सह निर्देशक कौशिक मंडल के साथ मिलकर 2015 में बांगला भाषा में ‘उपहार’ नामक लघु फिल्म बनायी थी, जिसे काफी सराहा गया. इसनेे हमें कुछ नया करने के लिए प्रेरित किया. हमने नए विषय के बारे में सोचना शुरू किया. इसी बीच हमें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि नेत्रहीन/अंधे इंसान को समाज में ‘बेचारा’ की दृष्टि से देखा जाता है. तथा ‘मुक्केबाजी’ एक ऐसा खेल है, जिस पर देख सकने वालों का विशेषाधिकार माना जाता है. इस खेल में एक अंधे व्यक्ति के लिए कोई जगह नहीं है, यहां तक कि पैरा-ओलंपिक में भी नहीं है. पैरा ओलंपिक में व्हील चेयर पर बैठकर इंसान मुक्केबाजी के खेल का हिस्सा बन सकता है, लेकिन दृष्टिहीन इंसानों को मुक्केबाजी से दूर रखा जाता है. इसी ने हमें सोचने पर मजबूर किया. बाॅक्सिंग फेडरेशन का नियम है कि दृष्टिहीन इंसान बाॅक्सिंग का हिस्सा नहीं बन सकते और इस नियम को बदला नहीं जा सकता. पैरा ओलंपिक में जूड़ो, कराटे जैसे शरीर को छूने वाले खेल दृष्टिहीनों के लिए हैं, मगर बाॅक्सिंग नहीं है. मेरी रूचि बाक्सिंग में काफी रही है. क्योंकि बाॅॅक्सिंग सिर्फ एक खेल नहीं हैं, यह तो बॉक्सिंग रिंग में तीन मिनट तक ‘मोमेंट आफ सरवाइवल’ यानी कि खुद को जीवंत रखने का पल है. इसलिए हमने इस पर काफी षोध करके फिल्म बनाने का निर्णय लिया.करीबन चार वर्ष की मेहनत के बाद अब हमारी इस फिल्म को अच्छे परिणाम मिल रहे हैं।’’
  कौशिक मंडल ने बताते हैं- ‘‘शोध करने के बाद हमने ऐसे बालक के बारे में कहानी सोची जो कि जन्म से अंधा है और बाॅक्सर बनता है.एक बाक्सर की जरुरत के अनुसार उसके पंच में दम है, उसके अंदर जुनून है, मगर आंख में रोषनी नहीं है. तो क्या वह बाॅक्सर के रूप में अपनी यात्रा को आगे बढ़ा सकता है? इस तरह की कहानी के माध्यम से हम स्वयं यह जानना व परखना चाहते थे कि एक दृष्टिहीन इंसान का बाॅक्सर बनना मुमकीन है या नहीं है. फिल्म बनाते हुए हमारी समझ में आया कि एक नेत्रहीन बालक भी बाॅक्सर बन सकता है. क्योंकि नेत्रहीन बालक के पास देखने की अद्भुत व अलग तरह की ताकत होती है।’’
  फिल्म ‘‘अली द ब्लाइंड बाक्सर’’ की कहानी एक सोलह सत्रह वर्ष के जन्म से ही दृष्टिहीन बालक अली की है. उसके माता पिता मध्यम वर्गीय है.उसकी एक बहन है. वह स्कूल जाता है.एक सामान्य जिंदगी जी रहा है. उसके मम्मी पापा मानते हैं कि उनका बेटा दुनिया में किसी से कम नहीं है. एक दिन एक बाॅक्सिंग कोच की नजर अली पर पड़ती है और वह उसे बाक्सर बनाने का निर्णय लेता है. जिसके लिए अली व उसके माता पिता भी तैयार हो जाते हैं. प्रशिक्षण हासिल करने के बाद अली बाॅक्सिंग रिंग में उतर कर आँखों से देख सकने वाले बाॅक्सिंग चैंम्पियन से प्रतियोगिता करता है और विजयी होता है. अंततः अली पूरे समाज के सामने दिखाता है कि वह बाॅक्सिंग कर सकता है. वह एक बेहतरीन बाॅक्सर है।
  बिजाॅय बनर्जी आगे कहते हैं-‘‘हमने इस फिल्म में दिव्यांग बच्चों का अपने माता पिता के साथ किस तरह का इक्वेशन होता है, इसे भी चित्रित किया है. हम मानते हैं कि बॉक्सिंग ताकत और चपलता का खतरनाक खेल है. गलत जगह मुक्का पड़ने पर जबड़े के टूटने या गलत जगह मुक्का मारा जाए, तो एक पल की देरी से जान का खतरा होता है. मगर हमें यह याद रखना चाहिए कि नेत्रहीन/अंधा इंसान अपने तरीके से देख सकता है।’’
बिजाॅय बनर्जी और कौशिक मंडल के लिए इस फिल्म में अली के चरित्र सहित दूसरे चरित्रों को निभाने के लिए कलाकारों का चयन काफी कठिन रहा.बिजाॅय बनर्जी बताते हैं-‘‘ हमने अली के किरदार को निभाने के लिए सोलह सत्रह वर्ष के दृष्टिहीन बालक की तलाश शुरू की.क्योंकि हम बहुत स्पष्ट थे कि हमारा मुख्य लीड एक नेत्रहीन बालक ही होगा. इस फिल्म में हम सामान्य जीवन को बिना आंखों की रोशनी के दिखा रहे हैं और हमें उस चित्रण में पूर्ण प्रामाणिकता की जरूरत थी. दूसरी बात यह हमारी खुद की यह प्रयोगात्मक यात्रा इस बात को समझने के लिए थी कि आँखों की रोशनी न होने पर भी इंसान बाॅक्सर बन सकता है या नहीं? ऐसे में अली के किरदार के लिए किसी अंधे युवक को चुनना हमारे लिए काफी कठिन रहा. हमें अली के किरदार के लिए शब्बीर शेख नामक बालक ‘पुणे अंध विद्यालय’ में मिला, जो कि दसवीं कक्षा का छात्र था.अब तो वह बारहवीं कक्षा में पहुॅच गया है. उसकी आंखों की रोशनी एक संक्रमण के चलते एक वर्ष की उम्र में ही चली गयी थी. उसके पापा बीड़ के एक गांव में किसान हैं. उसका भाई तौसिफ भी अंधा है. यदि हमें शब्बीर शेख या उसके जैसा कोई लड़का नहीं मिलता, तो हम यह फिल्म नहीं बनाते. शब्बीर की याददाश्त तेज है. हमने उसके लिए फिल्म की पटकथा को ब्रेल भाषा में नहीं बनाया. हमने संवाद कहे और उसे याद हो गए. सच कहूँ तो हमने स्वयं उससे कुछ न कुछ सीखा।’’
  वह आगे कहते हैं-‘‘ शब्बीर शेख के असंयमित उत्साह ने हमें अपनी अपरंपरागत कास्टिंग रणनीति के साथ जारी रखने के लिए प्रेरित किया, जिससे जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से कलाकारों का एक दिलचस्प पहनावा बन गया. इस फिल्म में कोई भी कलाकार पेशेवर कलाकार नहीं हैं.वास्तव में, हमारी इस फिल्म में अधिकांश कलाकारों ने पहली बार कैमरे का सामना किया. नियमित कार्यशालाओं और पूर्वाभ्यास के माध्यम से उन्हें तैयार किया गया और उनकी भूमिकाओं के लिए तैयार किया गया. जी हाॅ!हमारी फिल्म की कहानी हमारे समाज के आम इंसान की कहानी है. इसमें जो बाक्सर हैं, जिसके साथ अली को रिंग के अंदर बाक्सिंग करनी है, वह आठवें लेबल का बाॅक्सिंग चैंम्पियन साहिर वाघमारे है. कोच के किरदार में बाक्सिंग व फिटनेस ट्रेनर और इंटरनेषनल स्तर पर पुरस्कृत बौडीबिल्डर आकाश आहुते है. उसने भारत का प्रतिनिधित्व किया है. अली की बहन के किरदार में राष्ट्रीय स्तर की बाॅक्सिंग चैंपियन है. मैच के रेफरी के किरदार में वास्तविक बाॅक्सिंग मैच रेफरी राकेष भानु हैं. अली के पापा के किरदार में अनुज सेंगर व मां के किरदार में अर्चना पाटिल है. निजी जीवन में इनके बच्चे भी किसी अन्य रूप से विकलांग है, तो यह विकलांग बच्चों की मानसिकता वगैरह को समझते हैं. इसलिए इन सभी ने हमारी कहानी के अपने किरदारों को पहले से जिया हुआ था. नकुल तलवरकर हमारे साउंड रिकाॅर्डिस्ट हैं. विनय देशपांडे एडीटर और संगीतकार भी हैं।’’
अली के किरदार के लिए शब्बीर शेख का चयन करने के बाद अहम सवाल था कि क्या वह बाॅक्सिंग सीखना चाहेगा और सीख सकेगा? इसकी चर्चा करते हुए कौशिक मंडल ने कहा-‘‘जब हम षब्बीर से मिले और शब्बीर ने कहा कि वह बाक्सिंग सीखना चाहता है. तब हमने उसके विद्यालय और उसके माता पिता से इस बात के लिए इजाजत लेकर उसे पूरे चार माह तक ट्रेनिंग दिलायी. इसके लिए हमने कुछ प्रयोग करते हुए खुद ही बाॅक्सिंग मैन्युअल बनाया कि किस तरह एक अंधे बालक को बाॅक्सिंग सिखायी जा सकती है. उसी आधार पर ट्रेनर ने शब्बीर शेख को बाॅक्सिंग की ट्रेनिंग दी. एक नेत्रहीन को बाॅक्ंिसग टाइमिंग और स्पेस को समझाने के लिए ट्रेनिंग देते समय कोच के दाहिने पैर को शब्बीर के बाएं पैर के साथ बांध दिया. इससे हुआ यह कि कोच जैसे जैसे अपना पैर आगे बढ़ा रहा था, वैसे वैसे शब्बीर शेख भी कर रहा था. पंच वह आवाज के हिसाब से करता था. इसमें सामने वाले की साॅंस, चले आदि की आवाज को आधार बनाया.कई तरह की तकनीक अपनाकर उसे बाॅक्सर बनाया।’’
  फिल्म ‘अली द ब्लाइंड बाॅक्सर’ 2019 में बनकर तैयार हुई. 2020 में कोरोना महामारी के बावजूद यह फिल्म कई इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में जाती रही, प्रशंसा बटोरने के साथ पुरस्कार हासिल करती रही. इस बारे में बिजाॅय बनर्जी बताते हैं-‘‘हमारी फिल्म कई फिल्म समारोहों में शोहरत बटोरने के अलावा पुरस्कृत भी हो चुकी है. भूटान के इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में विकलांगता सेक्शन की फिल्मों में सर्वश्रेष्ठ फिल्म घोषित की गई. भूटान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में इसे सर्वश्रेष्ठ मोबाइल फिल्म का भी पुरस्कार दिया गया.कोलकाता इंटरनेशनल कल्ट फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ फिल्म पुरस्कार भी मिला. शांति निकेतन के टैगोर इंटरनेशनल फिल्म महोत्सव में ‘उत्कृष्ट उपलब्धि‘ पुरस्कार मिला. इसके अलावा कुछ अन्य अंतरराष्ट्रीय अमरीका में कैलीफोर्निया अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह ‘द इंडीफेस्ट फिल्म अवार्ड्स, यूएसए’में इसे ‘डिसएबल कैटेगरी’ में ‘अवाॅर्ड ऑफ रिकोग्नाइजेशन’ से नवाजा गया. समारोहों के लिए चयन हो चुका है. अमरीका में लास ऐंजेल्स के एक फिल्म समारोह के लिए चयन हुआ है. ‘वल्र्ड फिल्म कार्नीवल सिंगापुर’ में भी फिल्म को पुरस्कृत किया गया. जबकि गोल्डेन फाॅक्स अवाॅर्ड्स’ और ‘सन ऑफ़ इस्ट अवाॅर्ड’ के लिए फिल्म नोमीनेट हो चुकी है. इस फिल्म का अफ्रीका प्रीमियर केन्या में हो चुका है. ‘केन्या इंटरनेशनल स्पोट्र्स फिल्म फेस्टिवल’ होता है, यह अफ्रीका का अपना खेलों को समर्पित फिल्म समारोह है. इस फिल्म समारोह में पूरे विश्व की फिल्में शामिल हुई थी. इतना ही नहीं ‘गोल्डेन बी इंटरनेशनल चिल्ड्रेन्स फिल्म फेस्टिवल, इंडिया’ में इसे प्रदर्षित किया गया, उसके बाद दर्शकों ने ऑनलाइन हमसे सवाल जवाब भी किए.इतना ही नहीं इस फेस्टिवल में फिल्म
‘अली: द ब्लाइंड बाक्सर’ को ‘सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म ऑन डिसबीलिटी’ कैटेगरी में पुरस्कार मिला. दो दिन पहले ही ‘इंडो फ्रेंच इंटरनेषनल फिल्म फेस्टिवल, इंडिया’ में भी फिल्म को पुरस्कृत किया गया. जबकि अब इस फिल्म को इंग्लैंड के ‘‘इक्वाॅड मथ्वालिटी एंड डायवरसिटी फिल्म फेस्टिवन’में तीन हजार फिल्मों में से सेमीफाइनलिस्ट की ग्यारह फिल्मों में चुना गया है.’’
  कौशिक बनर्जी कहते हैं-‘‘हमें उम्मीद है कि यह फिल्म,जिसमें वास्तविक सबूत हैं कि दृष्टिबाधित लोगों द्वारा मुक्केबाजी संभव है, मुक्केबाजी बिरादरी के बीच चर्चा शुरू करने में मदद करेगी. परिणामतः पैरा- ओलंपिक में खेल के रूप में दृष्टिहीन मुक्केबाजी को पहचान मिल सकती है।

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Mayapuri