मूवी रिव्यू: मुस्लिम समाज में आधुनिक शिक्षा की पैरवी करती फिल्म ‘अलिफ’

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रेटिंग***

मुस्लिम समाज का आज भी एक बड़ा तबका अंग्रेजी या दूसरी एजुकेशन को गुनाह की तरह मानता है। निर्देशक जैगम इमाम ने इस मुद्दे को फिल्म ‘अलिफ’ में अच्छी तरह से उठाया है। इसके अलावा धर्म के प्रति कट्टरपंती तथा जाति विशेष के प्रति द्ववेष को भी फिल्म में दिखाकर बताने की कोशिश की हैं कि हम कई बार जान बूझकर किसी व्यक्ति विशेष के प्रति ज्यादती कर जाते हैं।

बनारस में मुस्लिमों के इलाके दोशी पुरा के मुस्लिम यही समझते हैं कि वे हिन्दूओं से दूर एक सेफ इलाके में हैं। इसी इलाके में हकीम दनिश हुसैन अपने बेटे अली यानि मोहम्मद साउद, अपनी भतीजी भावना पाणी तथा अपनी बीवी और बीमार बाप के साथ रहते हैं। उनकी बड़ी बहन नीलिमा अजीम की शादी दंगों के बाद उसे महफूज रखने के लिये पाकिस्तान में कर दी थी लेकिन एक ऐसे शख्स के साथ जिसकी तीन बीवीयां पहले से मौजूद थी लिहजा उसे पाकिस्तान मे भी नरक ही हासिल हुआ। नीलिमा का सपना एक बार इंडिया आकर अपने बाप भाई और उसके परिवार से मिलने का रहा और आखिर एक दिन उसे इंडिया आने का वीजा मिल ही गया। वो तीन महीने के लिये इंडिया आ गई। अपनी बहन के इंडिया आने के बाद उसे सदा के लिये यही रखने के लिये हकीम पुलिस से इस शर्त के साथ सांठ गांठ कर लेते हैं कि कोई उसकी शिकायत नहीं करेगा। यहां आकर नीलिमा को पता चलता है कि उसका बारह साल का भतीजा इसलिये मदरसे की शिक्षा ले रहा हैं क्योंकि उसे हाफिज बना देना ही उसकी मुक्कमल पढ़ाई होगी, दूसरे अंग्रेजी स्कूल थोड़ी दूरी पर हिन्दूओं के इलाके में है इसलिये वहां किसी मुस्लिम का पढ़ना खतरे से खाली नहीं। यहां नीलिमा अपने भाई को समझाती है कि इल्म जानना सबसे बड़ा धर्म है लिहाजा वो अपने भतीजे अली को उसकी तरह हकीम नहीं बल्कि डॉक्टर बने देखना चाहती है। बहन के मशवरे के बाद हकीम अपने बेटे को मदरसे से निकाल, अंग्रेजी स्कूल में दाखिल करवा देते हैं, लेकिन वहां एक टीचर अली से कुछ ज्यादा ही खुंदक खाने लगता है लिहाजा वो उसे बात बात पर प्रताड़ित करता है। उधर दिल्ली से हाफिज बन शायर तबीयत का शकील यानि आदित्य औम बनारस अपने घर आता है। यहां उसका प्यार हकीम की भतीजी से हो जाता हैं दरअसल वो भी शायरी में खासी दिलचस्पी रखती है। लेकिन जब शकील को मदरसे का हाफिज बना मौलवी द्धारा ताकीद की जाती है कि अली के अब्बा का उसे मदरसे से निकाल अंग्रेजी स्कूल में डालना अल्ला की राह में गुनाह है तो धर्म के प्रति कट्टर शकील पहले तो हकीम भतीजी से संबन्ध तौड़ लेता है उसके बाद वो हकीम को धमकी देता है कि या तो वो अपने बेटे को वापस मदरसे में भेज दे या फिर अपनी बहन को वापस पाकिस्तान भेजने के लिये तैयार रहे। हकीम उसकी बात को मान भी जाता हैं लेकिन नीलिमा पहले तो स्कूल में अली से नफरत करने वाले टीचर की खबर लेती हैं फिर वो अली को मदरसे से निकाल वापस स्कूल लेकर जाती है क्योंकि उसे वापस पाकिस्तान जाना मंजूर है लेकिन अपने भतीजे को धर्म के नाम पर अनपढ़ रखना मंजूर नहीं। बाद में डॉक्टर बन अली अपनी फुफी की कुर्बानी को सही साबित करके दिखाता है।alif

जैगम इमाम फिल्म के जरिये उन लोगों को तकीद करते हैं जो आज भी  कट्टरपंती के तहत आधुनिक शिक्षा को धर्म के नाम पर गुनाह करार देते हैं, साथ ही उन चंद अध्यापकों को भी जो अंग्रेजी के अहम में दूसरी जाति के बच्चों को हिकारत भरी नजरों से देखते हैं। फिल्म के जरिये जैगम सरलता पूर्वक इन दोनों बातों की कुछ अंजान चेहरों को किरदार बनाकर असरदार ढंग से खिलाफत करते नजर आते हैं। बनारस के अंदरूनी हिस्सा को बढ़िया ढंग से कैमरे में कैद किया गया है। इसके अलावा बैकग्राउंड म्यूजिक फिल्म को और असरदार बनाता है।

नई कास्टिंग का ये फायदा हुआ कि एक्टर किरदार ही लगते हैं। छोटे बच्चे अली के तौर पर मौहम्मद साउद ने बहुत मासूम अभिनय किया है और उसके दोस्त के तौर इशान कोरव ने उसका अच्छा साथ दिया। हकीम के किरदार में दानिश हुसैन ने अपनी बड़ी बहन के प्यार और कट्टरता के बीच झूलते मजबूर शख्स को सहजता से निभाया है। धर्म के प्रति कट्टर हाफिज की भूमिका में शकील की भूमिका को आदित्य ओम ने अभिनय और अपने लुक से वास्तविकता प्रदान की है। एक अरसे बाद नीलिमा अजीम को देखकर अच्छा लगता है उन्होंने इल्म के लिये आधुनिकता की पैरवी करती महिला का किरदार बहुत ही बढ़िया तरीके से निभाकर दिखाया है।


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Mayapuri

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