मूवी रिव्यू: ‘‘मनोज वाजपेयी की उम्दा अदाकारी’’ – ‘अलीगढ़’

1 min


रेटिंग***

हर आदमी के कुछ मौलिक अधिकार होते हैं जिन्हें कोई नहीं छीन सकता। निर्देशक हंसल मेहता की फिल्म ‘अलीगढ़’ इन्हीं सवालों को उठाती है। कहानी एक ऐसे प्रोफेसर की है जिसकी जाति जिन्दगी में कुछ लोगों के दख्ल के कारण उसकी जिन्दगी तबाह हो जाती है।

कहानी

प्रोफेसर श्रीनिवास रामचन्द्र सीरस (मनोज बाजपेयी) अलीगढ़ युनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं जो वहां मराठी पढ़ाते हैं। वे बैचलर हैं लेकिन शादीशुदा लोगों के बीच में रहते हैं। बेसिकली वे गे हैं। दरअसल सीरस यूनिवर्सिटी के एक ऊंचे पद पर हैं एक गैर हिन्दी भाषी के इस पद पर होने की वजह से उनके कुलीग उनसे जलते हैं और एक दिन एक रिक्शा वाले के साथ सेक्सुअल पॉजीशन में सीरस का स्टिंग ऑपरेशन करवा देते हैं। अगले दिन उनकी चर्चा हर न्यूज पेपर में होती है उन्हें उनके पद से सस्पेंड कर दिया जाता है। तीस साल से उस यूनिवर्सिटी में रह रहे सीरस को उनका क्वाटर खाली करने का निर्देश दे दिया जाता है, यहां तक पहले ही उनकी लाईट तक काट दी जाती है। इस कांड की भनक दिल्ली के एक अंग्रेजी दैनिक के जर्नलिस्ट दीपू सबस्टीयन (राजकुमार राव) को लगती है इसके बाद वो सीरस के अधिकारों की बात उठाता है कि कोई शख्स अपने बैडरूम में क्या कर रहा है किसके साथ सो रहा है, ये उसका व्यक्तिगत मामला है कोई भी उसकी ये आजादी नहीं छीन सकता। दीपू के जरिये एक दिन उनके समर्थन में एक पूरा समुदाय खड़ा हो जाता है। अंत में कोर्ट में उन्हें जीत हासिल होती है।

8b1e6cb3-ed4b-42a2-855d-c07bebb06ae8

निर्देशन

हंसल मेहता इससे पहले ‘शहीद’ और ‘सिटीलाइट’ जैसी ऑथेंटिक फिल्म बना चुके हैं। इस बार उन्होंने एक रीयल स्टोरी पर बहुत उम्दा फिल्म बनाई है। फिल्म कथा, पटकथा, संवाद और लोकेशंस सभी प्रभावित करने वाले हैं। हंसल ने एक ऐसे विषय को इस फिल्म के जरिये छूआ है जो हमेशा चर्चा का विषय रहा है,  इसलिये फिल्म की यूएसपी है फिल्म की कास्टिंग और विषय।

अभिनय

एक चौंसठ साल के गे प्रोफेसर श्रीनिवास रामचन्द्र सीरस की भूमिका को मनोज वाजपेयी ने इस शाईस्तगी से निभाया है, लगता है कि इस भूमिका को शायद वे ही कर सकते थे। उन्होंने किरदार का अकेलापन, लता मंगेशकर के गीतों के प्रति दीवानगी तथा उसकी विवशता को इतने सशक्त तरीके से दर्शाया, जिसे मनोज जैसा अभिनेता ही निभा सकता था। इसके बाद राजकुमार राव की भी तारीफ करनी पड़ेगी जिसने एक ऐसी भूमिका निभाई है जिसमें उन्हें कुछ करना नहीं बल्कि देखना था उनकी भूमिका एक विटनेस की थी लेकिन उन्होंने उस भूमिका को बड़ी सहजता से निभाया। इनके अलावा आशीष विद्यार्थी तथा कुछ थियेटर के आर्टिस्टों ने भी अपनी अपनी भूमिकाओं के साथ पूरा न्याय किया है।

15-Aligarh

संगीत

फिल्म में लता मंगेशकर के गीतों का चुनाव अच्छा है बाकी बैकग्राउंड म्यूजिक फिल्म को और रीयल बनाता है।

क्यों देखें

सच्ची कहानियों पर बनी फिल्मों तथा मनोज वाजपेयी और राजकुमार राव की अदाकारी के शौंकीन दर्शकों के लिये अलीगढ़ एक तोहफा है।

 


Like it? Share with your friends!

Mayapuri

अपने दोस्तों के साथ शेयर कीजिये