INTERVIEW: ड्रामा-थ्रिलर-संस्पेंस की अनोखी तिकड़ी अब्बास -मुस्तान हुसैन

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लिपिका वर्मा

अब्बास -मुस्तान बर्मावाला किसी तारीफ के मोहताज नहीं है। इनके तीसरे भाई हुसैन बर्मावाला जो की बतौर एडिटर हर फिल्म पूरी करते है अपने होम प्रोडक्शन से। अब्बास-मुस्तान निर्देशक-निर्माता एक ऐसी जोड़ी है भाईयों की, जिससे कभी अलग नहीं किया जा सकता है। यह दोनों भाईयों की फिल्मों में-ड्रामा, थ्रिल एवमं एक्शन न हो ऐसा बिल्कुल भी मुमकिन नहीं है। फिल्म ‘खिलाड़ी’ में अक्षय कुमार को कास्ट कर इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर जैसे धमाल ही मचा दिया था। यही नहीं अब्बास-मुस्तान की सूझ बूझ ही थी जिसकी वजह से शाहरुख खान को फिल्म ‘बाजीगर में ’अवॉर्ड मिल गया। शाहरुख केवल चॉकलेटी बॉय के रोमांटिक किरदारों में ही नजर आया करते थे। उनकी बॉक्स ऑफिस पर लगातार धमाल मचाने वाली अनेक फिल्में जैसे-सोल्जर, ऐतराज, प्लेयर्स, रेस-2, बादशाह, हमराज फिल्में रही। इन सारी फिल्मों ने इनके अच्छे खासे फैंस भी बना दिए। यह दोनों ऐसे निर्देशक है जिनकी फिल्मों का ऑडियंस को बेताबी से इंतजार रहता है। उनकी पिछली फिल्म में कपिल शर्मा एक नहीं चार-चार महिलाओं से इश्क लड़ाते हुए दिखाई दिये। कमाल तो यह था हर बार दर्शक इस फिल्म में यही सोचता कि अब कपिल इश्क लड़ाते हुए पकड़े जायेंगे? लेकिन एक ही मोहल्ले में उसकी सारी बीवियों को रख कर-अब्बास मुस्तान ने जो थ्रिल उत्पन्न किया वह काबिले तारीफ है। फिल्म छोटे बजट की थी और बड़े पर्दे पर न केवल अपना जलवा दिखा गयी अपितु इन्हें ढेर सारा पैसा भी दिला गयी। 17 मार्च को रिलीज होने वाली फिल्म ‘मशीन’ अब्बास मुस्तान की बेहतरीन पेशकश है जिस में अब्बास के सुपत्र मुस्तफा बतौर हीरो डेब्यू कर रहे है। उनका साथ निभा रही है कियारा। इस मौके पर हमने अब्बास -मुस्तान से ढेर सारी बातचीत की –
पेश है अब्बास-मुस्तान के साथ लिपिका वर्मा की बातचीत के कुछ अंश

आप दोनों अब्बास मुस्तान हमेशा एक साथ दिखाई देते है क्या बचपन में भी यह जोड़ी साथ साथ रही है ?

बिल्कुल, बर्मा से माइग्रेट हो कर मुम्बई आये थे, हमारे पिताजी का व्यवसाय कोलाबा में था और हम लोग मोहमद अली रोड़ पर स्थित एक बड़े कमरे की चॉल में रहा करते थे। हमारी ज्वाइंट फैमिली हुआ करती थी। और आज भी हमारी ज्वाइंट फॅमिली ही है। हमारे मामा जो एडिटर थे हम अक्सर उनके स्टूडियो छुट्टियों में जाया करते। तब शायद हम दस वर्ष के लगभग होंगे। हम दोनों अक्सर स्कूल की पिकनिक बंक करके फिल्में देखा करते। अपने बस की टिकेट के पैसे बचा कर हम एक नहीं ढेर सारी फिल्में एक ही दिन में देख लिया करते। और तब से लेकर आज तक हमारी जोड़ी बरकरार है। हुसैन बर्मावाला को एडिट का शौक रहा और आज वह हमारी सब फिल्में एडिट करते हैं। हम अपने मामा एस डी कुरा जो हिंदी फिल्मों के एडिटर हुआ करते उनसे रोज इसी आशा में मिलने जाया करते की हमे भी फिल्म करने का मौका मिल जाये।

Hussain A. Burmawala, Mustan Burmawalla, Abbas Burmawalla
Hussain A. Burmawala, Mustan Burmawalla, Abbas Burmawalla

आप के पिताजी का फर्नीचर का व्यापार था किन्तु आप लोग फिल्मों में कैसे पधार गए?

जैसा की हमने बताया मामा के एडिट रूम जाया करते और हम नासिक से जब मुम्बई आये तो हमे कुछ अलग करने का मन था। हमें शुरू से यही चाहत थी कि हम फिल्में निर्देशित करें। उन दिनों गोविन्द भाई पटेल बहुत जाने माने निर्देशक निर्माता हुआ करते थे जिनको हम दोनों भाईयों ने काम करने हेतु ज्वाईन कर लिया। उनके साथ कुछ करने के बाद जब उन्होंने हमें ‘साजन तारा सम्भारन’ करने का मौका दिया तो हम ने उस फिल्म को बनाने में अपना दिल और जान लगा दी। इस गुजराती फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर अपने झंडे गाढे़ बस फिर क्या था यहाँ से हमारा फिल्मी सफर शुरू हो गया।

पर आपकी बायोग्राफी में यह भी लिखा हुआ है कि आप दोनों ने दिवंगत निर्देशक- निर्माता सुलतान अहमद को असिस्ट भी किया था फिल्म ‘गंगा की सौगंध’ इत्यादि में?

देखिये ,सुल्तान अहमद साहब एक बहुत ही बेहतरीन निर्देशक-निर्माता रहे हैं अपने समय के। पर जाने अनजाने गूगल पर ऐसा लिख दिया गया है कि हमने उनको असिस्ट किया है। यह हमारे लिया हालांकि सौभाग्य की बात है कि हमारा नाम उनके साथ जुड़ा हुआ है। और हमारे लिए गर्व की बात भी है। किन्तु सच तो यह है कि – हमने उनके साथ कोई फिल्म नहीं की है। लेकिन ऐसा लिख दिया गया है गूगल पर – तो हम इससे सम्मानित ही हुए है और ऐसा चलते जाये गूगल पर, हमें इसे लेकर कोई भी एतराज नहीं है।

Mustan Burmawalla, Abbas Burmawalla
Mustan Burmawalla, Abbas Burmawalla

जैसे कि प्रचलित है आप दोनों ने, बतौर ‘घोस्ट’ निर्देशक भी कई फिल्में बनायीं है क्या कहना है इस बारे में?

जी हाँ, हम दोनों बहुत परफेक्शन से और मन लगा कर अपना काम किया करते है इसी वजह से कई फिल्में हमें बतौर, ‘घोस्ट’ निर्देशक भी मिली। और बहुत सारी घोस्ट निर्देशित फिल्में सिल्वर जुबली मना गई अतः हमारी डिमांड मार्किट में कुछ ज्यादा हो गयी। बस यूँ हमारी अब्बास-मुस्तान की जोड़ी फेमस हो गयी।

इतने बड़े परिवार के साथ एक चॉल में कैसे गुजर बसर कर पाते थे आप लोग ?

ज्वाइंट फेमिली होने की वजह से हमने पहले से यह सोच लिया था यदि कभी कोई नाराजगी होगी आपस में तो उसे सुलझा कर हम सब आगे बढ़ेगे। बिजनेस में कुछ ऊपर नीचे होने की वजह से हमें चॉल में रहना पड़ा। अब्बास भाई को नौंवी कक्षा में पढ़ाई छोड़नी पड़ी और मुझे मुस्तान, को भी कॉलेज की पढ़ाई के साथ-साथ परिवार के लिए काम करना पड़ा। किन्तु हम सब एक साथ रहे इसी लिए हम आज भी मिल जुल कर अपना परिवार आगे बढ़ा रहे हैं। एकता में बहुत ताकत होती है। हमारे माता-पिता ने हमसे यही कहा काम मन लगा कर करना चाहिए कभी किसी को धोखा न दे और जिस किसी से भी काम करवाओ उनका खमियाजा जरूर पूर्ण करना। कभी किसी का पैसा मत रखना। उसकी मेहनत का पैसा उसे जरूर देना। बस उनकी परवरिश इतनी अच्छी थी कि हम उस पर अमल करके आज इस मुकाम पर हैं।

आप लोग कब उस चॉल से निकले और लोखंडवाला में रहने गए। ..बाजीगर फिल्म के बाद??

जी नहीं, बाजीगर फिल्म के कुछ सालों बाद हमने लोखंडवाला में शिफ्ट किया था। और उसके पीछे भी एक कहानी है। शाहरुख खान को जब बाजीगर में अवॉर्ड मिला और हमारी फिल्म को भी ढेर सारे अवॉर्ड मिले, शाहरुख हमारी चॉल में आया और उसे ताज्जुब हुआ कि मुस्तान भाई बालकनी में सोते हैं। लोगों ने उस दिन से हमें पहचानना शुरू कर दिया और तब से वह हमें हाथ हिला कर अपने प्यार का इजहार भी करने लगे। करीब नब्बे की दशक में हम लोखंडवाला शिफ्ट हो गए।Machine-Hind

आप दोनों को कभी सफेद कपड़ो के अलावा किसी दूसरे रंग के कपड़े पहने हुए नहीं देखा गया है। क्यों?

हमारी स्कूल की शर्ट का रंग सफेद ही हुआ करता था सो हम लोग वही पहना करते थे। बाजीगर प्रीमियर के समय सूट पहनने की कोशिश भी की लेकिन कुछ अटपटा लगा हमें। फिर हमने वापस अपने सफेद अवतार अपनाया और प्रीमियर पर पहुंचे। हमें खुशी होती है कि हमेशा सफेद कपड़े पहनने की वजह से हमें रोज रोज दूसरे कपड़े ढूंढने की मशक्त नहीं करनी पड़ती है। बस सफेद कपड़े पहनते हैं और किसी भी अवसर पर कही भी चले जाते हैं। सफेद कपड़ो में बहुत सुकून एवं कम्फर्टेबल महसूस भी करते हैं हम लोग। ’’

आप दोनों देखने में सिंपल लगते हैं किन्तु इतनी मॉडर्न फिल्मे कैसे बना लेते हैं ?

हम विदेश भी घूम चुके हैं किन्तु हमने यही देखा है कि हर इंसान में ढेर सारा इमोशन्स होता है चाहे वह देसी हो या विदेशी। और स्टाइल हर किसी को पसन्द होता है। लोगों तक अपनी कहानी ले जानी है तो हम हमेशा लार्जर देन लाइफ ही सोच कर किसी कहानी को पेश करते हैं। प्यार – मोहब्बत और इमोशन्स लोगों को छू जाता है। हमेशा ही कमर्शियल फिल्म ही हम बनाते हैं और सब को अच्छी लगती भी है। अब देखिये न लोगों की जिन्दगी में बहुत सारी परेशानियां रहती हैं तो यदि हमारी फिल्में उन्हें एंटरटेन नहीं कर पाये तो क्या फायदा। इसीलिए हम अपने लोकेशन्स को जीवन्त करने के लिए वर्जिन और सुंदर लोकेशन्स से जुड़ते भी हैं। अब अपना यह इंटरव्यू ही ले लो -यदि इसे हम जुहू बीच पर जाकर करें तो माहौल कितना रंगीन हो जायेगा? प्रश्न और उतर वही रहेगें ना? बस वैसे ही सिंपल लिविंग और हाई थिंकिंग के मध्य नजर हमारी फिल्में बनती है जो लोगों को पसन्द भी आती है।Machine-

आप दोनों अपनी फिल्मों में ड्रामा थ्रिल बरकरार रखते हैं। फिल्म ‘मशीन’ में क्या अलग होगा?

देखिये, जीवन भी एक ड्रामा थ्रिल से परिपूर्ण होता है। जीवन के उतार-चढ़ाव में कभी खुशी तो कभी गम का सामना होता है। और इमोशन्स भी भरपूर होता है हर इंसान में यही सब हमें प्रभावित करता है। हम हमेशा कमर्शियल फिल्में बनाने की सोचते है। क्योंकि जीवन से ली गई चीज ही लोगों को अच्छी लगती है। हर इंसान अपने आप के इमोशन्स को जब पर्दे पर देखता है तो उससे जुड़ता है। यही कहानी हम लार्जर देन लाइफ बनाने की कोशिश करते हैं। जाहिर सी बात है ऑडियंस तीन घण्टे यदि कहानी से जुड़ी न रहे तो उसका कुर्सी पर बैठना मुश्किल हो जाता है। फिल्म ‘मशीन’ में भी ड्रामा-थ्रिल इमोशन्स तो होगा ही पर इस फिल्म में एक रोमांटिक एंगल भी दिखाया जायेगा। जो आज का यूथ बेहतर समझ पाएंगे।

मुस्तफा को आप लोगों ने कब और कैसे अपनी फिल्म में लेने की सोची?

दरअसल, मुस्तफा हमारे साथ तीन फिल्मों में असिस्ट कर चुके है प्लेयर्स, किस किस को प्यार करें इत्यादि. हमें नहीं ज्ञान था कि मुस्तफा को पूरी तरह से एक्टिंग पर उतारना है। मुस्तफा के भाई ने जब हमसे कहा न्यू कमर को ही लेना है तो फिर मुस्तफा को ही ले लो। दरअसल में उसने हमारी एक फिल्म में कैमियो भी किया है। अब्बास मुस्तान कहते है की चाचा भतीजा यहाँ नहीं है वह हमारा ही बेटा है। क्योंकि हम दोनों ने ही मिल कर उसे गोद में भी लेकर पाला है। खेर जब हमें पता चला तो हमने उसे एक दिन ऑफिस में बुलाया और उसे फिल्म ‘मशीन’ की पूरी कहानी एक्ट करके नरेशन देने को कहा। पर यह बात सारे ऑफिस कर्मचारियों को कह दी गयी थी की उसका टेस्ट हो रहा है मत बोलना। उसने जब नरेशन बेहतरीन ढंग से अभिनय करके दिखाया तब हमें एहसास हुआ कि यही हमारी फिल्म ‘मशीन’ का हीरो बन सकता है।

Abbas Burmawalla kiara advani Mustafa burmawala Mustan burmawala
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कियारा को कैसे कास्ट किया इस फिल्म में?

एक दिन जब हमने उसे ऑफिस में बुलाया तो मुस्तफा और दोनों बहुत घुल मिल गए। हम लोग कभी ऑडिशन्स नहीं लेते हैं सिर्फ हाव-भाव और किसी से बातचीत कर उसकी अभिनय क्षमता समझ लेते हैं। दोनों में अच्छी दोस्ती हो गयी बस फिर हमे लग गया इनकी कैमेस्ट्री पर्दे पर भी जरूर जमेगी।

मुस्तफा डेब्यू कर रहा है उम्मीदे बहुत होंगी बॉक्स ऑफिस प्रेशर भी होगा?

हम दिल लगा कर काम करते हैं। और मुस्तफा ने हमे तब आश्चर्य चकित कर दिया जब वह 6 माह दिल्ली जाकर शर्मा जी से मिल कर आया तो उसकी चाल-ढाल में बहुत ही फर्क लगा हमे। उसमें हमने ढेर सारा आत्मविश्वास भी देखा। दोनों बच्चों ने बहुत मेहनत भी की है। जैसा की ट्रेलर रिलीज के बाद सब तारीफ भी कर रहे हैं, हमें उम्मीद है फिल्म अच्छी ही चलेगी। फिलहाल हम फिल्म रिलीज की सोच रहे है बॉक्स ऑफिस की बात बाद में होगी. फिल्म अच्छी बनी है तो जाहिर सी बात है फिल्म अच्छा ही करेंगी। हमारी फिल्म के कैरक्टर्स कुछ ग्रे शेड के हैं।

अक्षय की फिल्म ‘मोहरा’ के गाने को आपने इस फिल्म में अपनी स्टारकास्ट पर पिक्चराईज किया है। क्यों? अपनी फिल्म का कोई गाना नहीं लिया?

आज के बच्चे क्लब जाते हैं और यह ‘तू चीज बड़ी मस्त मस्त’ हमारी फिल्म में और सिचुएशन पर फिट बैठता है इसलिए यह गाना ही लिया है। हाल में इस गाने को लांच करने भी अक्षय कुमार आये थे और उन्होंने अपनी खुशी जाहिर भी की थी जब हमने उन्हें बताया था कि उनके इस गाने को फिल्म ‘मशीन’ में लिया गया है। ट्विटर पर भी यह गाना यूथ ने बहुत पसन्द भी किया है।

Mustan burmawala, Akshay kumar, Abbas Burmawalla
Mustan burmawala, Akshay kumar, Abbas Burmawalla

फिल्म की कहानी में ऐसी कौन-सी बात थी की आपने इसे बड़े परदे पर उतारने कि सोची?

बस एक ही बात -दिल से सोचो। …दिमाग से नहीं। जब भी दिल से सोचोगे तो सूफियाना सी फीलिंग्स मिलेगी और आप हर बार जीतोगे ही।

अब्बास-मुस्तान एक ज्वाइंट फैमिली संस्कृति आज भी कायम रखे हुए हैं क्या कहना चाहेंगे?

हम लोगों का यही मानना है यदि आप एक जुट रहोगे तो कोई भी आप का फायदा नहीं ले पायेगा। जहाँ बिखर जाओगे तो लोग आपका फायदा ले सकते है। जीवन में अच्छी तरह मिल जुल कर रहें तो हमारी फैमिली और देश की भी उन्नति होती है। जब तक मुट्ठी बन्द रहती है कोई उसका नुकसान नहीं कर सकता है। हमारे घर में सब एक ही माने जाते हैं साथ मिल कर रहने की कसमें ली है हमने। पारिवारिक रिश्ते जुड़े रहे, यह ही हमारी संस्कृति है और हम सब सफलता की और बढ़े यही सोच होनी चाहिए। लड़ाई झगड़े से नुकसान ही होता है।
– लिपिका वर्मा


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