अमिताभ ने जब राजनीति को ‘गटर’ कहा था

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उस सुबह, अमिताभ बच्चन के राजनीति में शामिल होने और इलाहाबाद से एक टिकट पर चुनाव लड़ने के बारे में मुंबई फिल्म इंडस्ट्री और पोलिटिकल सर्कल्स में जोरदार अफवाहे थी। मुझे पता चला था की अभिताभ वर्सोवा में कैप्टन के बंगले में शूटिंग कर रहे थे और मैं वहां उनसे मिला। मैंने उनसे इस अफवाह के बारे में पूछा और उन्होंने इसे आम अफवाहों कि तरह ही खारिज कर दिया और जब तक मैं नरीमन प्वाइंट पर स्थित अपने ऑफिस पहुंचा, मुझे महसूस हुआ कि अमिताभ पहले से ही इलाहाबाद में थे और उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी के रूप में बहुत ही पावरफुल राजनीतिज्ञ हेमवंती बहुगुणा के साथ चुनाव लड़ने के लिए अपना फॉर्म भरा था। उस क्षण से अमिताभ के लिए जीवन समान नहीं रहा था क्योंकि उनका पूरा ध्यान इलाहाबाद में लगा हुआ था और वह जल्द ही इलाहाबाद की गलियों और उपनगरों, गांवों और कस्बों में प्रचार करते नजर आए थे।
अली पीटर जॉनअमिताभ बच्चन

यह मानवता के समुद्र की तरह था जहां इवेंट और पॉलिटिकल ऐनलिस्ट और एक्सपर्ट्स ने विशेष रूप से उनके प्रतिद्वंद्वी श्री बहुगुना की टिकट प्रतिष्ठा के कारण उनके प्रास्पेक्ट्स के बारे में बहस की। अमिताभ ने यह फैसला अपने बचपन के दोस्त राजीव गांधी द्वारा किए गए अनुरोध के कारण लिया था, जिन्हें अपनी माँ श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस पार्टी को संभालने की जिम्मेदारी लेनी पड़ी थी।

अमिताभ की वजह से इस अभियान ने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सभी को आकर्षित किया था, अमिताभ जो एक रूलिंग सुपरस्टार थे उन्होंने तब राजनीती के मैदान में प्रवेश किया था। नेशनल और इंटरनेशनल हर अखबार और हर चैनल, इस सबसे रोमांचक और दिलचस्प अभियान को कवर करने के लिए सड़कों पर उतरा था। उत्तेजना इतनी प्रबल थी कि जो कोई भी राजनीति या फिल्मों में थे, वह इलाहाबाद आए थे और अमिताभ के अभियान में हर तरह से एक्टिव रूप से भाग ले रहे थे। मुझे भी उस महत्वपूर्ण अभियान का हिस्सा बनने का मौका मिला जब जाने-माने हिंदी उपन्यासकार गुलशन नंदा, जिनके पास खुद का पब्लिशिंग हाउस था, ने मुझे अमिताभ की कहानी अंग्रेजी में लिखने के लिए कहा और उन्होंने इसका हिंदी में अनुवाद कराया और फिर इसे इलाहाबाद के सभी वोटर्स के बीच वितरित या बेचा गया था। नंदा और उनके पब्लिशिंग हाउस ने बहुत पैसे कमाए और मुझे तब एक हजार रुपये की शाही रकम अदा की गई थी!

जैसा कि अनुमान लगाया जा रहा था और उम्मीद की जा रही थी कि अमिताभ उस तरह कि बहुमत के साथ चुनाव जीतेगंे, जैसा अतीत में किसी अन्य राजनेता के साथ नहीं हुआ था। बहुगुणा जो कभी भी चुनाव नहीं हारे थे को अमिताभ कि जीत से गहरा सदमा लगा था और कुछ ही महीनों में उनकी मृत्यु हो गई थी और अमिताभ संसद में शामिल हो गए थे।

उन्होंने लोकसभा के सदस्य के रूप में अपनी भूमिका को बहुत गंभीरता से लिया और सदन की प्रत्येक बैठक में भाग लिया और कुछ समय के लिए वह फिल्मों से दूर हो गए थे।

बोफोर्स गन स्कैंडल का एक इरप्शन हुआ था जिसमें उनके दोस्त राजीव शामिल थे और चूंकि वह उनके एक करीबी दोस्त थे, इसलिए उनका नाम भी इसमें घसीटा गया था। उन पर हुए हमले इतने उग्र हो गए कि हवाई अड्डों पर अज्ञात लोग और जहाँ भी उनका नाम लिया गया था और उन्होंने उन्हें ‘चोर है, चोर है’ कहा। हमलों ने अमिताभ को उस तरह का झटका दिया जिसकी उन्होंने कभी उम्मीद नहीं की थी। जब वह इस अवस्था में थे तब उन्होंने राजनीति छोड़ने और लोकसभा में अपनी सीट से इस्तीफा देने का फैसला किया। जब वह लोकसभा में थे तब भी वह इस उलझन में थे कि क्या वह एक अभिनेता के रूप में अपना करियर जारी रख पाएंगे और विपक्षी पार्टी के एक प्रमुख राजनेता श्री. मधु दंडवते उनके बचाव में आए और उन्हें बताया कि वह काम करना जारी रख सकते है क्योंकि अधिकांश सांसद अपने स्वयं के करियर को आगे बढ़ाने के लिए काम जारी रखते थे। अमिताभ वापस मुंबई आए और गंगा जमुना सरस्वती नामक एक नई फिल्म पर हस्ताक्षर किए, जिसे मनमोहन देसाई ने निर्माता एस. रामनाथन के लिए निर्देशित किया, जो एक तरह से अमिताभ के गुरु थे। यह फिल्म बहुत अच्छी नहीं चली, लेकिन इसने अमिताभ को फिल्मों में अपनी दूसरी पारी शुरू करने में बहुत मदद की, जो आज तक जारी है।अमिताभ बच्चन

बोफोर्स कांड उन्हें परेशान करता रहा और एक दिन उनके पिता डॉ. हरिवंश राय बच्चन उनके कमरे में गए और उनसे पूछा, “मुन्ना यह जो मैं सुन रहा हूँ, क्या सच है?” उस एक सवाल ने अमिताभ को शपथ दिला दी कि वह तब तक अपने पिता के कमरे में नहीं लौटेंगे, जब तक कि वह उन्हें यह साबित नहीं कर देते कि वह बोफोर्स मामले में दोषी नहीं थे। उन्होंने विश्व न्यायालय तक अपनी लड़ाई लड़ी को विजयी होने तक लड़ा और जब वह वापस मुंबई आए और हवाई अड्डे पर उतरे तो उनकी पत्नी जया, उनके दोस्तों यश जौहर और अन्य लोगों ने उनका स्वागत किया। लेकिन उसका पहला आग्रह था कि वह अपने पिता के कमरे में जाए, उनके चरणों में गिरकर उन्हें बताए कि उन्होंने खुद को समझा लिया है। यह उनके पिता की कविता के सच होने की प्रसिद्ध पंक्ति ‘कोशिश करने वालों कि कभी हार नहीं होती- की तरह था।अमिताभ बच्चन

अमिताभ को राजनीति में शामिल होने और राजनीतिक दलों का हिस्सा बनने के लिए कई तरह के लालच दिए गए थे, लेकिन उन्होंने राजनीती में शामिल न होने कि शपथ ली थी, लेकिन लोगों और देश की सेवा वह सर्वोत्तम तरीके से कर रहे हैं।अमिताभ बच्चन

40 साल से अधिक समय तक राजनीति से बाहर रहने के बाद, अब अमिताभ राजनीति के एक और जाल में फंसते नजर आ रहे हैं और यह देखना बाकि है कि वह इससे बाहर कैसे निकलते हैं।

अनु- छवि शर्मा

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