बच्चन साहब कमाल हैं, कमाल करते रहते हैं और आगे भी करते रहेंगे

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क्या कभी अमिताभ बच्चन के बड़े से बड़े फैन ने यह कल्पना की थी कि फिल्म ‘जंजीर’, ‘दीवार’, ‘त्रिशूल’, ‘डाॅन’, ‘मुकद्दर का सिकंदर’ का ‘विजय’ आगे चलकर एक दिन ‘बागबान’ बाबुल, ब्लैक, द लास्ट लीयर, पा, शमिताभ तथा अब सत्तर वर्ष के भास्कर बनर्जी जैसे किरदार (जो अपने पेट की समस्याओं को अपनी सारी समस्याओं का जड़ मानता है) को लाजवाब ढंग से निभायेंगे। क्या उनके करोड़ों फैन्स ने कभी सोचा था कि वे दीपिका पादुकोण जैसी मंजी हुई अभिनेत्री के पिता का रोल करेंगे जिसका खुद का एक कैरियर है और जो उस फिल्म में अपने पचास शारीरिक समस्याओं से जूझते पिता का ख्याल रखती है। वो दर्शक जो अमिताभ के एंग्री यंग मैन वाली फिल्मों के साथ बड़े हुए है, वे यह कल्पना कर सकते हैं कि इस फिल्म में जो वृद्ध हर वक्त अपनी शारीरिक परेशानियों का रोना रोते रहते हैं, यह वही एंग्री मैन विजय है, जिसने कभी हार नहीं मानी थी और यह गाया था, ‘रोते हुए आते हैं सब हंसता हुआ जो जायेगा।’ जी हाँ, यही कुछ प्रश्न मन में यह फिल्म देखते हुए घुमड़ते हैं जिसमें अमिताभ ने बहत्तर वर्ष के बूढ़े का ऐसा लाजवाब अभिनय किय जो वर्षों वर्ष तक अभिनय के इतिहास में अंकित होकर अमिताभ को हमेशा की तरह इस बार भी सिनेमा जगत में महत्वपूर्ण स्थान देता रहेगा। फिल्म ‘पीकू’ में प्रथम दृश्य से ही अमिताभ दर्शकों के मन के द्वार में दस्तक देना शुरू करते हैं जिसमें वह ढीले पाजामा, लम्बा कुर्ता, स्वेटर, टोपा पहने होता है और जिन्दगी की सच्चाईयों के बारे में दृश्य दर दृश्य बोलता रहता है, खासकर दीपिका के साथ वाले दृश्यों में जिसमें दीपिका उनकी बेटी बनी है और यह रोल दीपिका के कैरियर जीवन की भी एक अभूतपूर्ण परफाॅर्मेन्स है जो साबित करता है कि वह एक बेहद लाजवाब अभिनेत्री बनने की ओर अग्रसर है, साथ में ब्रिल्येन्ट से भी ब्रिलियेन्ट इरफान खान तो है ही।

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शूजीत सरकार जिन्होंने अलग जोनर की फिल्में जैसे ‘यहां’, ‘मद्रास कैफे’, ‘विकी डोनर’ जैसी फिल्में बनाई थी उन्होंने यह एन्टरटेनमेन्ट, इमोशन और सीधी सच्ची सिंपल तरह की फिलाॅसफी से भरपूर फिल्म, जो आम इंसान के जीवन से जुड़ी है, बनाकर वाकई बड़ी विजय हासिल कर ली है और अगर इस फिल्म ने निर्विवाद रूप से कमर्शियल तथा क्रिएटिव सफलता हासिल कर ली है तो निश्चित तौर पर यह यर्थात के जीवन से जुड़े अमिताभ बच्चन के सराहनीय अभिनय के कारण हो पाया जिन्होंने भारतीय सिनेमा जगत को जीता है। जिस तरीके से अमिताभ अपना एक एक संवाद बोलते है उससे उन संवादों में उससे भी ज्यादा अर्थपूर्णता समा जाती है जितनी इन संवादों की लेखिका जुही चतुर्वेदी तथा निर्देशक शूजीत सरकार ने सोचा होगा जब वे भास्कर बैनर्जी का चरित्र तैयार कर रहे थे, उनके चेहरे पर ही वह सारे भाव, सोच तथा तमाम अनकहे प्रश्न उभर आते हैं जो उनके मन में तूफान मचा रहे हैं, खामोशी के साथ और जिनका दिल करोड़ों अनुभवों का गोदाम स्थल है।

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अपनी जिन्दगी के हलचलों के साथ हर जगह चलने का ढंग ही वह कमाल का है जो उनके कैरेक्टर भास्कर बनर्जी को जीवन्त करना है। अपने प्रत्येक दृश्य में जो अमिताभ ने दीपिका, इरफान या फिल्म के अन्य चरित्रों के साथ निभाया है वह वाकई देखते रहने में लाजवाब है, और इन प्रत्येक लाजवाब पलों में सब से दिल को छू लेने वाला पल वो है जब उनकी शांतिपूर्वक मृत्यु का दृश्य होता है, ऐसी ही मृत्यु की उन्होंने हमेशा उस फिल्म में कामना की थी, भास्कर बनर्जी का मृत्यु के पश्चात का वह शांत चेहरा दर्शकों के दिलों में लंबे समय तक घर कर लेती है, जब वे थिएटर से बाहर भी आ जाते हैं तब भी। कई डाॅक्टर, साइकाॅलाॅजिस्ट, साइकियाटिस्ट, साधु संतों ने शांतिपूर्ण मृत्यु के बारे में तमाम व्याख्या की है पर असल में शांतिपूर्ण मृत्यु किसे कहते हैं यह जानने के लिए उन्हें इस फिलम में भास्कर बनर्जी का मृत चेहरा देखना चाहिए, अमिताभ बच्चन के अन्दर के महान अभिनेता को इसके लिए विशेष सलाम और धन्यवाद देना चाहिए जिन्होंने जिन्दगी के हर रंग, रूप, हँसी, मुस्कान यहां तक की मृत्यु को अभिनीत करने की महारथ हासिल कर ली है।

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निर्देशक शूजीत सरकार तथा लेखिका जुही चतुर्वेदी को ऐसे चरित्र (जिस चरित्र की जिन्दगी अपनी बेटी (दीपिका) तथा इरफान के साथ जुड़ा हुआ है) को रचने के लिए बधाई। इरफान खान राणा चैधरी (जो एक टैक्सी सर्विस चलाता है) की भूमिका को वाई जी गये है लेकिन यह सारे चरित्र इस फिल्म में इसलिए जीवन्त काम कर पाये क्योंकि अमिताभ बच्चन जैसे महान कलाकार ने भास्कर बनर्जी के चरित्र को अमर कर दिया है। सारे क्रिटिक्स तथा सिनेमा प्रेमियों ने अमिताभ की जितनी तारीफ, एप्रीशियसन, एप्लाॅज किये इस परफाॅर्मेन्स के लिए वह सब भी यह व्याख्या करने के लिए कम पड़ता है कि अमिताभ जिन्होंने ढेर सारी बेहतरीन परफाॅर्मेन्स की है, उन्होंने इस एक परफाॅर्मेन्स (पीकू में) से दर्शकों को और, और, और ऐसे परफाॅर्मेन्स चाहने की प्यास बढ़ा दी है। हम इस स्टार आॅफ द मिलेनियम से इस तरह के और भी ढेर सारे दिल को छूने वाले असरदार, एन्टरटेनमेन्ट का भरोसा कर सकते हैं वर्षों वर्ष तक के लिए क्योंकि उनकी तरह एक्टर कभी उम्रदराज नहीं होता है और अपने बेहतरीन से बेहतरीन कोशिशों से कभी अघाता नहीं है। यह सच है कि ‘पीकू’ एक टीम वर्क का नतीजा है लेकिन अमिताभ बच्चन इस फिल्म में सब से ऊपर, फिल्म के हर पहलू में श्रेष्ठ है इससे कोई इंकार नहीं कर सकता।


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Mayapuri

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