एक स्वतंत्र, निर्भीक और निडर कवि, जिसने खुद को हिंदी फिल्मों में मिसफिट पाया और अब दुनिया छोड़ चुके है

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डाॅ. राहत इंदौरी

अली पीटर जॉन

भगवान दुनिया को बनाने के बाद उत्साह की स्थिति में थे और अपनी सबसे अद्भुत रचना, को रच रहे थे। वह इस आदमी को बनाने के बाद खुश थे और महसूस किया कि इस आदमी को एक साथी की आवश्यकता थी और इसलिए उन्होंने एक महिला भी बनाई और विभिन्न प्रकार के मनुष्यों को बनाने के लिए भगवान ने लंबा प्रयोग शुरू किया। वह उस तरह के इंसान से संतुष्ट नहीं थे जिन्हे वह पैदा कर रहे थे और इसलिए उन्होंने कुछ असाधारण इंसानों को बनाने का फैसला किया और एक बड़ा कदम उठाया और लेखकों, उपन्यासकारों, शाॅर्ट स्टोरी लेखकों और कवियों को बनाया। मनुष्यों के इस वर्ग को बनाने की उनकी अपनी योजना थी। उन्होंने उन्हें एक में कई मनुष्यों के होने की अनोखी क्षमता का आशीर्वाद दिया। और यह दुनिया की शुरुआत थी जिसमें लेखकों और अन्य रचनात्मक और संवेदनशील प्राणियों के अलावा कवि थे जिन्हें भगवान की अन्य सभी रचनाओं से चिह्नित किया गया था। और कवि अपने स्वयं के वर्ग में थे क्योंकि वे अपने सभी साथी मनुष्यों की भावनाओं को अभिव्यक्ति दे सकते थे, जिन देशों में वे पैदा हुए थे, दुनिया और यहां तक कि भगवान भी।

मुझे भारत की विभिन्न भाषाओं में लिखने वाले कुछ सर्वश्रेष्ठ कवियों के साथ रहने और समय बिताने का सौभाग्य मिला है और मेरा हमेशा से मानना रहा है कि एक कवि इसलिए विशेष होता है क्योंकि उसके भीतर उसकी अपनी एक दुनिया होती है। और ऐसे ही एक कवि थे डॉ.राहत इंदौरी, जिनसे मिलने के कुछ अवसर मुझे तब मिले जब वे अस्सी और नब्बे के दशक में कुछ हिंदी फिल्मों के लिए गीत लिख रहे थे।

वह एक साहित्यिक कवि के रूप में एक दुर्जेय पृष्ठभूमि के साथ फिल्मों में आए थे जिन्हें उर्दू कविता की दुनिया में पहचान मिली थी। उन्होंने गजल और शायरी लिखने के क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल की थी, वह गजल के प्रोफेसर थे और विषय में डॉक्टरेट थे।

वह कुछ अन्य ज्ञात कवियों के उद्देश्य के साथ मुंबई आए थे, यह उनकी कविताओं को फिल्मों के माध्यम से बड़े दर्शकों तक पहुंचने और थोड़ा और पैसा कमाने और अपने और अपने परिवार को एक आरामदायक जीवन देने की आवश्यकता थी। मुझे इस बात पर विश्वास करना मुश्किल था कि इस तरह की प्रतिष्ठा वाला कवि संगीतकार, निर्देशक और निर्माता के साथ कवि के रूप में अपने कैलिबर का मिलान कैसे कर सकता है, जो शायद ही कविता के बारे में कुछ भी जानते हों, लेकिन उन्होंने बिना किसी समझौते के उनके साथ काम करने का एक तरीका निकाला और उस समय की तरह की फिल्मों के लिए गीत लिखना जारी रखा। और मैं देख और महसूस कर सकता था कि उनका दिल जो वह कर रहे थे उसमें नहीं था और मैं यह भी देख सकता था कि वह एक दिन जल्द ही उस दृश्य को छोड़ देगे जैसे हिंदी और उर्दू भाषा के कुछ अन्य प्रसिद्ध कवि ने भी किया था।

मुझे यहाँ यह उल्लेख करना चाहिए कि केवल कुछ बड़े कवि जो मुंबई में फिल्म इंडस्ट्री में बचे थे, साहिर लुधियानवी थे, शायद एकमात्र कवि जिन्होंने अपनी शर्तों पर काम किया, मजरूह सुल्तानपुरी, जो समझौता भी कर सकते थे और कैफी आजमी, जिन्होंने उन फिल्मों में सीमित संख्या में गीत लिखे, जिन पर उन्हें विश्वास था। डॉ.इंदोरी ने अनु मलिक के साथ सबसे अधिक काम किया (और यह एक अजीब संयोजन क्या था) और अन्य संगीतकारों के साथ उन्होंने शंकरएहसानलाॅय और .आर.रहमान के साथ मिलकर काम किया।

जब वह एम. एफ. हुसैन कीमीनाक्षी टेल ऑफ टू सिटीजके लिए गीत लिखते थे, तभी वह वास्तव में संतुष्ट होते थे। उनका हुसैन साहब के साथ बहुत अच्छा व्यवहार था, जो उर्दू कवियों और उनकी शायरी के लिए बहुत मजबूत कमजोरी थी। यह लगभग आखिरी फिल्म थी जिसके लिए उन्होंने गीत लिखे और फिर हार मान ली और अपने पहले प्यार के लिए वापस चले गए, देश, पाकिस्तान और खाड़ी राज्यों में आयोजित विभिन्न मुशायरों में गजल और शायरी का पाठ करना कवियों के बीच एक सितारे थे और कहीं भी एक स्टार से बेहतर माने जाते थे।

डॉ.इंदौरी ने फिल्मों के लिए लिखने के बारे में जो महसूस किया वह इस एक छोटी सी कहानी में महसूस किया जा सकता है। वह एक फिल्म के गीत लिख रहे थे जिसके लिए अनु मलिक संगीत बना रहे थे। जिन निर्माताओं को कविता के बारे में कुछ नहीं पता था, उन्होंने डॉ.इंदौरी को उर्दू में लिखी एक पंक्ति दिखाई और जोर देकर कहा कि वह लिरिक्स में लाइन को शामिल करते हैं।

डॉ. इंदौरी उन्हें बताते रहे कि लाइन मिर्जा गालिब की लिखी एक कविता से थी और वह लाइन को शामिल नहीं कर सकते थे क्योंकि अगर वह ऐसा करते तो उनकी बिरादरी में हंसी का पात्र बन जाते और वे मुश्किल में पड़ जाते। निर्माता ने कुछ देर सोचा और फिर डॉ. इंदोरी से कहा, “कौन है ये गालिब? एक दो हजार दे दो और निपटा दो उसेयह एक कहानी थी जिसे डॉ. इंदौरी भुला नहीं सके और उन्होंने कहा, उनके पास इस तरह की कई अन्य कहानियाँ थीं, जहाँ निर्माता, निर्देशक और संगीतकार ने उन्हें कविता लिखनेसिखानेका प्रयास किया था।

डॉ. इंदौरी बाद में उन प्रमुख कवियों में से एक रहे, जिन्होंने जीवन और प्रेम की वास्तविकताओं के बारे में लिखा, लेकिन वे अपनी लोकप्रियता के चरम पर पहुंच गए जब उन्होंने खुले तौर पर और निडर होकर मोदी और उनकी सरकार के खिलाफ बुराई की। वह असंतोष की आवाज थी और उन्होंने लिखी कुछ पंक्तियों ने उन्हेंजनता की आवाज का नायकबना दिया था। उनकी एक ऑलटाइमलाइन थी, जिसे मैंने मोटे तौर पर उनका उदाहरण दिया थाइस मिटटी में शामिल है हर किसी का खून, ये किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है?” लाइन मोदी सरकार के खिलाफ विद्रोह के एक गान में बढ़ गई, जिसने कभी उन्हेंजिहादीकहा था, जिस पर उन्होंने एक पंक्ति लिखी थी जिसमें उन्होंने पूछा था कि उनकी कब्र तो खून से सना हुआ है कि वह एक हिंदुस्तानी है।

डॉ. इंदौरी जैसे कवि जो मानते थे कि उनमें विवेक है और वे अपने जीवन के जोखिम पर भी इसे अभिव्यक्ति देंगे, एक तरह से एक बार पैदा होते हैं। और कोई खतरा नहीं और मृत्यु भी उन्हें रोक नहीं सकती थी। विशेषकर ऐसेे समय में जब मीडिया दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्रों में से एक में झुक रहा है और टूट रहा है, कभी नहीं भुलाया जा सकता है। या वे करेंगे?

अनुछवि शर्मा


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