मूवी रिव्यू: ‘एक नई पहल करने की कोशिश करती’ फिल्म‘ एंग्री इंडियन गाॅडेसेस’

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रेटिंग***

बाॅलीवुड में हिन्दी फिल्मों के दर्शकों को फिल्मों में हीरो हीरोइन और विलन देखने की आदत है इसीलिये इन तीन पात्रों के बिना कोई फिल्म कितनी भी अच्छी हो, उनकी समझ से बाहर होती हैं । निर्देशक पैन नलिन की फिल्म‘एंग्री इंडियन गाॅडेसेस’ एक ऐसी फिल्म हैं जिसमें कोई हीरो या हीरोइन नहीं बल्कि ऐसी सात लड़कियां हैं जिनकी जिन्दगीयों को लेकर कहानी घढ़ी गई है ।नलिन इससे पहलेएक दर्जन शॉर्ट फिल्मों के कारण काफी लोकप्रिय रहे है।

कहानी

कहानी ऐसी सात लड़़कियों की हैं जो अपनी अपनी लाइफ से जूुझ रही हैं । उनमें से एक फ्रिडा उन्हें अपनी शादी के मौंके बुलाती है । फ्रिडा की मेड हैं लक्ष्मी जिससे सारी लड़कियां एक दोस्त की तरह पेश आती है । इनमें कोई शादीशुदा हैं तो कोई अपने शादीशुदा जीवन से खफा है तो कोई अपने कॅरियर को लेकर संघर्षशील है । सभी की एक एक करके कहानी सामने आती है। जिसमें कोई सिंगर हैं लेकिन उसे सफलता नहीं मिल पा रही है, एक कंपनी की सीईओ है वह अपने पेशे को लेकर हमेशा नाराज रहती है, तो एक अपने शादीशुदा जीवन से परेशान हैं,एक हिन्दी फिल्मों में एक्ट्रस बनने के लिये प्रयासरत है , इसी तरह फ्रिडा की नौकरानी लक्ष्मी की भी एक कहानी है । सबसे दिलचस्प कहानी हैं मेजबान लड़की की जो समलैगिंग हैं और अपनी ही काॅलेज की दोस्त से षादी करने वाली है । उसी के लिये उसने अपने काॅलेज की दोस्तों को बुलाया है ।

निर्देशक

निर्देशक की सराहना करनी चाहिये कि उसने बरसों से भारतीय फिल्मों के पात्रों की परपंरा को तौड़ने के अच्छी कोशिश की है यानि उनकी फिल्मको महिलावादी फिल्मों की कैटिगिरी में रखा जा सकता है । दूसरे फिल्म में कोई मुख्य पात्र नहीं बल्कि सभी मुख्य हैं । जैसे सभी लड़कियां अपने औरत होने और अपने दोस्तों के साथ जिस तरह कीे बातें होती हैं उन्हें दिखाने में नलिन ने कहीं भी कोई संकोच नहीं किया बल्कि वे अपने पात्रों के द्धारा उनके संघर्ष,दुख को दिखाते हुये समाज पर कुछ कटाक्ष भी कर जाते हैं फिल्म में ओरतों की समस्या के अलावा समलैंगिंता को भी मुद्धा बनाने की कोशिश की है । लेकिन नलिन अंत में रूटिन फिल्मों से प्रभावित हुये बिना नहीं रह पाये, क्योंकि उन्होंने भी आखिर में वही जाने पहचाने दृश्यों को लेकर क्लाइमेक्स घढ़ दिया ।

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अभिनय

जंहा तक अभिनय की बात की जाये तो सभी नये चेहरे होने के बाद भी काफी आत्मविश्वासी दिखाई दिये । कुछ चुभते या एकांत में बोले जाने वाले संवादों को बोलते हुये किसी के भी चेहरे पर शर्म या झिझक के भाव नजर नहीं आये । जैसे सारा जेन डियास ने बहुत संभल कर अपनी भूमिका निभाई है, पवलीन गुजराल भी अच्छी रही, खसकर हाउसवाइफ की भूमिका में वे काफी सहज दिखाई दी । संध्या मृदुल को एक कंपनी की सीईओ की भूमिका में अपनी अभिनय प्रतिभा दिखाने का बढि़या अवसर मिला । खास कर बाॅलीवुड एक्टर बनने की ख्वाईशमंद अमुत मघेरा तथा नौकरानी के रोल में राजश्री देशपांडे ने बहुत ही स्वाभाविक अभिव्यक्ति दी हैं बाकी तनिष्ठा चटर्जी को ज्यादा कुछ करने के लिये नहीं मिल पाया, जबकि अनुष्का मनचंदा भी अपने रोल के साथ वफादार नजर आई । इन सब के अलावा आदिल हुसैन पुलिस आॅफिसर की छोटी सी भूमिका में ही अपनी छाप छोड़ जाते हैं ।

संगीत

इस तरह की फिल्मों में बैकग्राउड म्युजिक का प्रभाव ज्यादा होता है । एक दो गीत जो बैक्रग्रांउड में बजते हैं लेकिन उनकी तरफ इसलिये भी ध्यान नहीं जाता क्योंकि वे कहानी का ही एक हिस्सा लगते हैं ।

क्यों देखें

फिल्म रिलीज से पहले कई फिल्मों मेलों में घूमते हुये कुछ इनाम इकराम भी हासिल कर चुकी है । तो बेषक ये फिल्म उन खास वर्ग के लिये ही हैं जो हर बार कुछ अलग देखने की कोशिश करते हैं।


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Mayapuri

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