अनुपम खेर के सरनेम ‘खेर’ की दिलचस्प कहानी – अली पीटर जॉन

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कश्मीर में हिन्दुओं के बीच खेर सरनेम का कोई नहीं है। तो, अनुपम खेर को यह नाम कैसे मिला। इसके बारे में एक छोटी लेकिन दिलचस्प कहानी है। कश्मीर में ब्राह्मण हिन्दुओं को निशाना बनाया जा रहा था और उनमें से हजारों शरणार्थियों को रिफ्यूजी घोषित कर दिया गया। लोगों ने इसके बाद एक ऐसी जगह ढूंढी जहां वह बिना खतरे के अपना जीवन व्यतीत कर सकें।

अनुपम खेर के छोटे चाचा प्यारेलाल, अपने परिवार के पहले व्यक्ति थे जो श्रीनगर छोड़ शिमला में जा बसे। उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि उनका सरनेम खार उनके जीवन के लिए खतरनाक हो सकता है। तब उन्होंने अपना सरनेम खार से खेर किया। उनका सरनेम महाराष्ट्र व मध्य प्रदेश जैसे स्थानों पर काफी लोकप्रिय रहा। सरनेम बदलने से प्यारेलाल का नाम प्यारेलाल खेर, भाई का नाम पुष्करनाथ से पुष्करनाथ खेर, अनुपम का नाम अनुपम खेर व राजू का नाम राजू खेर हुआ और उनकी सभी आने वाली पीढि़यों का सरनेम भी खेर ही होगा।

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‘खेर’ सरनेम से अनुपम के साथ एक दिलचस्प कहानी जुड़ी हुई है। जब अनुपम खेर को लगा कि मुम्बई में रहने के लिए घर ढूंढना काफी मुश्किल है तब उन्होंने बांद्रा की एक झुग्गी बस्ती में एक कमरा लेने का फैसला किया। ‘जिसका नाम अब खेरवाड़ी है’ यह सब वाकई अनुपम के लिए अजीब रहा। अनुपम खेर, खेरनगर, खेरनगर पोस्ट ऑफिस, बान्द्रा ईस्ट यह अनुपम के घर का पता था। खेरवाड़ी बस्ती शिवसेना सुप्रीमो हिंदू हृदय सम्राट बालासाहेब ठाकरे के किले के करीब थी। अनुपम के सरल दिल के पिता पुष्करनाथ अपने बिट्टू (अनुपम खेर) के लिए उच्च महत्वाकांक्षा रखते थे। पुष्करनाथ का यह विश्वास था कि बेटे अनुपम खेर के घर का पता उपलब्धियों से प्रेरित था। पर वास्तविकता तो यह थी कि अनुपम खेर झुग्गी में रहने वाले बच्चों को ट्यूशन दिया करते थे और वह सिर्फ महीने के पांच रूपये लिया करते थे।

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अनुपम खेर के पास दो जोड़ी कुर्ता-पजामा थे जिसे वह खुद ही धोया करते थे। इसके बाद वह स्टूडियोज के चक्कर लगाया करते थे व उनका दिन पृथ्वी थिएटर पर समाप्त हुआ करता था। अपने पूरे दिन के व्यस्त शेड्यूल के बाद वह अपने घर खेरवाड़ी जाते थे। कई बार तो वह वहां के स्थानीय ‘चायवाले’ से छुपते हुए घर जाते थे क्योंकि कभी-कभी वह चायवाले को पैसे नहीं दिया करते थे।


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Mayapuri

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