INTERVIEW!! फिल्म ‘की एंड का’ करने से पहले मैंने कूकिंग क्लास ली थी – अर्जुन कपूर

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फिल्मी पृष्ठभूमि में पले बढ़े अर्जुन कपूर की अब तक ‘इश्कजादे’, ‘औरंगजेब’, ‘टू स्टेट्स’, ‘गुंडे’, ‘तेवर’ जैसी फिल्में रिलीज हो चुकी हैं। मगर ‘इश्कजादे’ व ‘टू स्टेट्स’ के अलावा बाकी फिल्में बाक्स ऑफिस पर धराशाही रहीं। अब वह अपनी हालिया रिलीज़ फिल्म ‘की एंड का’ को लेकर काफी उत्साहित हैं। उन्हें लगता है कि आर बाल्की निर्देशित इस फिल्म से उनके करियर को ऊंचाई मिलगी।

कहा जा रहा है कि फिल्म ‘तेवर’ की असफलता से आप काफी निराश हुए ?

सच कहूँ तो मैं ही क्या हर कलाकार को निराश होती ही है, जब उसकी कोई फिल्म असफल होती है। यूँ तो हर कलाकार के करियर में सफलता व असफलता आती रहती हैं लेकिन ‘तेवर’ का असफल होना इमोशनल मामला रहा क्योंकि इसका निर्माण मेरे पिता ने किया था ‘तेवर’ के बाद मैंने कुछ समय ब्रेक लिया तो लोगों ने इसे फिल्म की असफलता के साथ जोड़ दिया, जबकि हकीकत यह है कि तीन साल में छह फिल्में करके मैं थक गया था सच कहूं तो आप और दर्शक भी मुझे देखते देखते थक गए होंगे इसलिए ब्रेक लेना जरूरी था फिर जब मैं कुछ अलग करने की सोच रहा था, तभी आर बाल्की साहब ने ‘की एंड का’ का ऑफर दे दिया। इसी तरह ‘खतरों के खिलाड़ी’ भी मुझे बहुत सटीक समय पर मिला।

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फिल्म ‘की एंड का’ करने की वजह क्या रही ?

फिल्म ‘तेवर’ करने के बाद जब आर बाल्की जी ने मेरे सामने ‘की एंड का’ का प्रस्ताव रखा, तो यह इतनी अलग फिल्म थी कि मैंने हामी भर दी। एक कलाकार के तौर पर मेरे लिए उत्साह की बात यह थी कि मुझे इतनी अलग तरह की फिल्म मिल रही है। इसके अलावा फिल्म के निर्देशक आर बाल्की का मैं फैन हूं। उनके साथ काम करने की मेरी इच्छा थी। वह उम्दा निर्देशक हैं भले ही अभी तक उनकी तीन फिल्में ही आयी हों, पर उनकी हर फिल्म में एक सामाजिक संदेश होता है तो कभी कभी ऐसी फिल्में भी करनी चाहिए, जो कि पर्सनल से थोड़ी आगे जाए, देश के माहौल को दर्शा या बतला सकें।

आपको ‘की एंड का’ में अलग क्या नजर आया ?

जब आर बाल्की ने मुझे इस फिल्म का आइडिया सुनाया, तभी मैं खुश हो गया था। आर बाल्की ने मुझसे कहा – ‘‘हर लड़का बड़ा होकर अपने पिता की तरह बनना चाहता है अगर तुम्हे कोई ऐसा लड़का मिल जाए, जो अपने पिता की तरह नहीं, बल्कि अपनी मां की तरह बनना चाहे, तो?’’ यह सुनकर मेरे मन में ऐसे लड़के से मिलने की उत्सुकता पैदा हो गयी। यही सुनकर मैंने अपनी जिंदगी में पहली बार बिना पटकथा सुने ही फिल्म करने के लिए हामी भर दी थी जबकि ऐसा बहुत कम होता है। मुझे आर बाल्की की आइडिया ही अतरंगी नजर आयी मुझे लगा कि आज भारत में ऐसे माहौल/विचार को दिखाने की जरुरत है। हमारे देश में आज भी तमाम घरेलू महिलाओं को उनका ड्यू नहीं मिलता है। कमाल की पटकथा लिखी है इसके बाद जब मैं पटकथा पढ़ रहा था, तो मेरे दिमाग में बार बर यही बात आ रही थी कि यह कहानी कहनी बहुत जरुरी है। मेरी राय में यह फिल्म बहुत सही समय पर बनी है आज खुले विचारों वाले लोग बहुत हैं लोग फिल्म के विचार से सहमत हों या न हों, मगर इस विचार को प्रोत्साहित जरुर करेंगे।

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फिल्म के अपने किरदार को लेकर क्या कहेंगे ?

मैंने इस फिल्म में कबीर का किरदार निभाया है जिसने आईआईएम से शिक्षा हासिल की है एक अच्छे परिवार से है पर उसने बहुत पहले निर्णय ले लिया था कि वह अपने पिता नहीं, बल्कि अपनी माँ की तरह बनेगा वह नौ से पाँच की नौकरी में अपना वक्त जाया नहीं करना चाहता। वह मशीन नहीं बनना चाहता कबीर एक विचित्र इंसान हैं। कबीर की जिंदगी में दुनिया की सबसे ज्यादा अति महत्वाकांक्षी औरत किया (करीना कपूर) आती हैं। वह उससे कहता है कि यह तो अच्छी व मजेदार बात है तू काम कर और मैं घर चलाता हूं, किया ऐसी औरत है, जिसने अब तक शादी इसलिए नहीं की कि उसका पति उसे काम करने से रोक देगा पर यहाँ उल्टा हो रहा था। कबीर उसे खुलकर काम करने की छूट देता है किया, कबीर संग शादी कर प्रयोग करने के लिए तैयार हो जाती है। उसका यह प्रयोग सफल भी होता है मगर समाज इनको लेकर किस तरह की बातें करता है। दूसरों के रोकने व टोकने से इनके रिष्तों में किस तरह के उतार चढ़ाव आते हैं, वह फिल्म देखने में ही आनंद देगा।

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कबीर के किरदार के साथ न्याय करने के लिए कोई खास तैयारी करनी पड़ी ?

निजी जिंदगी में मुझे किचन का काम करना बिलकुल नहीं आता। मैं चाय भी नहीं बना सकता, पर कबीर के किरदार के लिए जरुरी था कि मैं किचन में कम्फर्ट रहूं। सच कहूं तो मुझे किचन में जाकर पानी उबालना भी नहीं आता। इसलिए फिल्म की शूटिंग पूरी करने से पहले मैंने तीन सप्ताह की कुकिंग क्लास ली थी। इससे मुझे बहुत सहूलियत मिली कुकिंग क्लास जाने से मुझे यह पता चला कि रोटी पकाते समय क्या करना होता है अंडे का ऑमलेट बनाते समय क्या करना होता है। फ्रिज में क्या रखा जाना चाहिए, क्या नहीं बाकी तो मैंने वही किया, जो बाल्की साहब ने कहा।

शूटिंग के अनुभव कैसे रहे ?

हमने चालिस दिन के अंदर शूटिंग खत्म की यह शहरी रोमांटिक प्रेम कहानी है हमने इसकी शूटिंग ‘यशराज स्टूडियो’ में खासतौर पर बनाए गए सेट के अलावा दिल्ली में की। फिल्म का कुछ हिस्सा हमने दुबई में फिल्माया है क्योंकि कबीर कुछ समय के लिए विदेश जाता है।

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क्या फिल्म ‘की एंड का’ के प्रदर्शन के बाद लिंगभेद की परंपरागत धारणा का अंत हो जाएगा ?

महज एक फिल्म से समाज में अमूल चूल बदलाव नहीं आएगा हर फिल्म वही दिखाती है, जो कुछ समाज में हो रहा होता है जरुरत है लोगों में जागरूकता लाने व हर विषय पर चर्चा करने की लेकिन इस फिल्म को देखने के बाद हर पुरूष अपनी पत्नी को उसके काम का श्रेय देना शुरू कर देगा देखिए, हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि पुरूष यानी कि पति को खिलाने पिलाने से लेकर उसका ख्याल रखने के पीछे औरत अपनी आवश्यकताओं, जरुरतों, इच्छाओं और महत्वाकांक्षाओं का बलिदान करती है।

क्या बॉलीवुड में पुरूष व महिला समान हैं ?

मैं अपनी फिल्म ‘की एंड का’ का उदाहरण देकर कहना चाहूंगा कि बॉलीवुड में समानता है फिर इस साल अभी तक दो फिल्में ‘एयर लिफ्ट’ और ‘नीरजा’ सफल हुई हैं एक के हीरो अक्षय कुमार हैं, तो दूसरे की सोनम कपूर मैंने जिन फिल्मों में काम किया, उन सभी में नारी पात्र हमेशा फैंटास्टिक रहे हैं अब वह सिनेमा नहीं रहा, जहां हीरोइन के हिस्से सिर्फ दो तीन गाने आते थे लोगों की सोच बदली सिनेमा देखने की रूचि बदली तो सिनेमा में पुरूष व महिला पात्र समान स्तर पर नजर आने लगे।

करीना कपूर खान के साथ काम करने के अनुभव ?

मैंने काफी इंज्वॉय किया ।

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स्वरुप संपत के साथ काम करने के अनुभव ?

वह फिल्म में मेरी सास बनी हैं, पर मेरे लिए तो वह मां की ही तरह रहीं।

सोशल मीडिया को लेकर आपकी क्या सोच है?

यह सशक्त माध्यम है मैं तो हर सुबह, दोपहर व शाम ट्वीट करता रहता हूं। सोशल मीडिया हमारे फैन्स के लिए बहुत अच्छा है, आप मीडिया वालों को भी कई चीजों की जानकारी हमारे ट्वीट से मिल जाती है।

‘की एंड का’ के बाद कौन सी फिल्म कर रहे हैं ?

इसके बाद मैं फिल्म ‘हाफ गर्ल फ्रेंड’ की शूटिंग शुरू करने वाला हूं इसके लिए मैं भोजपुरी भाषा के साथ साथ बास्केटबॉल खेलना सीख रहा हूं।

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Mayapuri