‘‘उन फिल्मों में दर्शक भी मिलते हैं और ढेर सारा पैसा भी’’ – नसीरूद्दीन शाह-

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नसीरूद्दीन शाह का किसी फिल्म में दिखाई देना यानि अच्छी फिल्म होने का सुबूत माना जाता है । उनकी आने वाली फिल्म ‘धर्म संकट में ’ में उनके  अलग से अवतार को देखकर फिल्म के लिये इसीलिये सभी उत्सुक है। इस फिल्म को लेकर खुद क्या कहते हैं नसीर ।
क्या फिल्म किसी अंग्रेजी फिल्म का रीमेक है ?
इसे रीमेक नहीं कहा जा सकता क्योंकि फिल्म के बाकायदा पहले अधिकार खरीदे गये हैं ।इसके बाद इसका पूरी तरह से भारतीय करण किया गया । बेशक कहानी वही है लेकिन पात्रों को यहां के मुताबिक पूरी तरह बदल दिया है ।
 क्या फिल्म जातिवाद को लेकर है ?
बेशक  कहानी जातिवाद जैसी समस्या को लेकर ही है जंहा बताया गया ह एक बंदे का जन्म  मुसलमान के यहां होता है लेकिन उसका पालन पोषण हिन्दू के यहां होता है ।और जब उसे पता चलता है तो उसके बाद उसकी ज़िन्दगी में क्या बदलाव आते हैं ।

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इस फिल्म के ऑफर के बारे में क्या कहना चाहते हैं ?
करीब दो साल पहले फवाद खान जो फिल्म का डायरेक्टर है ने अंग्रेजी फिल्म ‘ द इंफिडाल’ की डीवीडी दी  और कहा कि इस पर फिल्म बनाने की योजना है लेकिन मुझे यकीन नहीं था। परन्तु साल बाद जब फवाद ने मुझे बांउड स्क्र्रिप्ट दी । मैंने स्क्रिप्ट पढ़ी जोे बहुत पसंद आई । बाद में फिल्म में परेश रावल और अनु कपूर जैसे एक्टर भी आ गये जो मेरे बहुत अजीज  हैं ।
फिल्म में आपका लुक काफी अलग सा है ?
मैं फिल्म में बाबा नीलानंद की भूमिका निभा रहा हूं ।  मैंने देखा है कि यह जितने भी बाबा होते हैं यह अपने अलग से लुक से लोगों का ध्यान खींचतेे हैं ।  क्योंकि इन्हें प्रभावशाली दर्शाने में इनके लुक का बहुत ज्यादा योगदान होता है ।
किसी भी फिल्म की आप कैसे पहचान करते हैं कि वह आपकी पंसदीदा फिल्म है ?
कोई मुश्किल काम नहीं है ये । मुझे महज पांच मिनट लगते हैं समझने में कि मुझे यह फिल्म करनी है या नहीं करनी । अब जैसे नीरज पांडे की फिल्म वैडनस डे को ही ले लो, मुझे कहानी सुनाई गई तो  उसका कुछ पार्ट सुनने के बाद ही उस फिल्म को करने का मन बना लिया था ।
यहां धर्म के नाम पर विवाद फैलाना चुटकियों का काम है फिर वो किसी फिल्म में ही क्यो न हो ?
ऐसे विवादों से डर कर ऐसी फिल्मों से किनारा तो नहीं किया जा सकता  । हम शोर मचा मचा कर कहते हैं हमारी संस्कृति पांच हजार साल पुरानी है हमारा धर्म बहुत मजबूत है। फिर भी हमें ऐसा क्यों  लगता है  जरा जरा सी बातों से हमारा धर्म संकट में पड़ जायेगा ।

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बहुत सारी उद्देष्यपूर्ण फिल्में जो रिलीज तक नहीं हो पाती ?
नही हो पाती, क्या किया जाये। खुद मेरी पच्चीस तीस फिल्में हैं जो आज तक रिलीज नहीं हुई । यहां हम कुछ नहीं कर सकते है । इनमें गुलजार साहब की भी एक फिल्म हैं जो आज तक रिलीज नहीं हुई।
आप कहते हैं कि मैं वो फिल्में करता हूं जो दिल को छू जाये । फिर जैकपॉट जैसी फिल्मों के लिये क्या तर्क देगें ?
उनमें  ढेर सारे पैसे मिलते हैं । जैकपॉट ही क्यों, ऐसी ढेर सारी ऐसी फिल्में हैं जिनके बारे में मैं आज भी सोचता हूं कि वह मैंने क्यों की।  फिर जवाब मिलता है हम कोमर्शिअल फिल्मों का हिस्सा भी बनते रहते हैं क्योंकि वह फिल्में हमें हर तरह के दर्शक तक पहुंचाती हैं, और उनमें पैसा भी मिलता है ।
आने वाली फिल्में ?
वैलकम बैक । यहां  एक अरसे बाद परेश रावल, नाना पाटेकर, अनिल कपूर तथा आदि  आर्टिस्टों के साथ काम करने का मौंका मिला । काफी मजा भी आया । तथा एक अंग्रेजी फिल्म है ‘द वेटिंग’ जिसमें मेा अपोजिट कल्कि कोचलिन है ।


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Mayapuri

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