अरुणा ईरानी

1 min


अरुणा ईरानी का जन्म 3 मई, 1952 मुंबई में हुआ. वह जानी मानी अभिनेत्री है. हीरोइन के तौर पर सफलता न पाते हुए भी रुपहले पर्दे पर लंबी पारी खेलते हुए दर्शकों के दिलो-दिमाग पर अपनी छाप अंकित कर देने वाली अभिनेत्रियों में से रही हैं अरुणा ईरानी।

सत्तर-अस्सी के दशक की फिल्मों के एक दर्शक वर्ग का हमेशा से यह मानना रहा है कि अरुणा में हीरोइन बनने के सारे गुण मौजूद थे, लेकिन कुछ खराब किस्मत, कुछ स्वयं के गलत फैसलों और कुछ फिल्म उद्योग की राजनीति के चलते उनकी पहचान मुख्यतः चरित्र अभिनेत्री के रूप में ही बन पाई। वैसे बाल कलाकार, कॉमेडियन, खलनायिका, हीरोइन, चरित्र अभिनेत्री कई रूप रहे हैं अरुणा ईरानी के।

09ndmparunairani_AR_162154e

कम ही लोगों को पता है कि अरुणा ने अपने करियर की शुरुआत सर्वकालिक महान क्लासिक मानी जाने वाली फिल्म “गंगा जमुना” (1961) से बाल कलाकार के रूप में की थी। इसमें उन्होंने चरित्र अभिनेत्री आजरा के बचपन की भूमिका निभाई थी और हेमंत कुमार के गीत “इंसाफ की डगर पे बच्चों दिखाओ चलके” में अपने गुरुजी के साथ गा रहे बच्चों में वे भी शामिल थीं।

इसके बाद उन्होंने “जहाँआरा”, “फर्ज”, “उपकार” जैसी फिल्मों में छोटे-मोटे रोल किए। फिर कॉमेडी किंग महमूद के साथ उनकी जोड़ी बनी, जो “औलाद”, “हमजोली”, “नया जमाना” जैसी फिल्मों में खूब पसंद की गई।

अरुणा के करियर में महत्वपूर्ण मोड़ आया 1971 में “कारवाँ” के साथ। इस सुपरहिट म्यूजिकल फिल्म में उन्होंने तेज-तर्रार बंजारन की यादगार भूमिका निभाते हुए अपने अभिनय कौशल के साथ-साथ नृत्य की प्रतिभा का भी प्रदर्शन किया।

“दिलबर दिल से प्यारे” और “चढ़ती जवानी मेरी चाल मस्तानी” जैसे गीतों से उन्होंने अपना लोहा मनवा लिया। निर्माताओं ने उन्हें ऐसी भूमिकाओं के लिए माकूल पाया जिनमें कुछ नकारात्मकता का पुट हो और जिनमें एकाध डांस का भी स्कोप हो।

इस बीच अरुणा को महमूद की “बॉम्बे टू गोवा” (1972) में हीरोइन का रोल मिला। हीरो थे अमिताभ बच्चन जो तब तक एक संघर्षशील कलाकार ही थे। “बॉम्बे टू गोवा” हिट तो हुई, लेकिन अरुणा हीरोइन के रूप में करियर न बना सकीं। हाँ, कई फिल्मों में सहायक भूमिका निभाते हुए वे हीरोइन पर भी भारी पड़ जाती थीं।

1973 में राजकपूर की “बॉबी” में एक संक्षिप्त मगर दिलचस्प भूमिका में उन्होंने अपनी छाप छोड़ी। इसके बाद वे लगातार एक सशक्त चरित्र अभिनेत्री के तौर पर अपना स्थान पुख्ता करती गईं।

“खेल-खेल में”, “मिली”, “लैला मजनू”, “शालीमार” आदि उनकी महत्वपूर्ण फिल्में रहीं। “कुर्बानी” में उन्होंने बदले की आग में धधकती स्त्री के रोल में फिरोज खान, विनोद खन्ना, जीनत अमान, अमजद खान जैसे कलाकारों के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

“लव स्टोरी” में वे “क्या गजब करते हो जी” गाते हुए कुमार गौरव को रिझाती नजर आईं, तो “कुदरत” में मंच पर शास्त्रीय अंदाज में “हमें तुमसे प्यार कितना” गाते हुए दिखाई दीं।

गुलजार की क्लासिक कॉमेडी “अंगूर” में देवेन वर्मा की पत्नी के रूप में वे अपने किरदार में पूरी तरह डूबी हुई थीं। 1984 में “पेट, प्यार और पाप” के लिए उन्हें फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेत्री अवॉर्ड मिला।

नब्बे के दशक में अरुणा ईरानी ने “बेटा” और “राजा बाबू” जैसी फिल्मों से माँ के रोल निभाने शुरू किए। “बेटा” में उन्होंने एक बार फिर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया और फिल्मफेयर अवॉर्ड जीता।

इसके अलावा उन्होंने टीवी के क्षेत्र में भी कदम रखा और धारावाहिक निर्माण करने लगीं। कई गुजराती फिल्मों में भी उन्होंने काम किया है। सई परांजपे की “साज” (1998) अरुणा की यादगार फिल्मों में से है, हालाँकि बॉक्स ऑफिस पर वह नहीं चली। वे फिल्म निर्माण के क्षेत्र में भी उतर चुकी हैं।

आज के दौर के निर्देशकों में अरुणा करण जौहर और इम्तियाज अली के साथ काम करने की इच्छुक हैं क्योंकि उनके मुताबिक ये निर्देशक नए दौर के अनुरूप फिल्में तो बनाते हैं लेकिन इमोशंस पर भरपूर जोर देते हैं। बचपन से काम करती आईं अरुणा की कामना है कि अंतिम साँस तक वे काम करती रहें।

SHARE

Mayapuri