INTERVIEW!! “पेरेंटिंग कोई आसान काम नहीं है” – अरविन्द स्वामी

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लिपिका वर्मा

अरविन्द स्वामी लगभग 22 वर्षों के बाद, “डिअर डैड” फिल्म से वापसी कर रहे हैं। यह फिल्म तमिल/हिंदी में बनी है। मुंबई में अपनी फिल्म के प्रोमोशन्स हेतु मीडिया से बातचीत के दौरान ढ़ेर सारे प्रश्नों के जवाब दिए

22 साल पहले नेशनल अवॉर्ड फिल्मों से नवाजे गए अरविन्द स्वामी ने फिल्मी दुनिया में प्रवेश मणि रत्नम की फिल्म ‘थलपि’ से किया। जी हाँ मणि रत्नम ने मेरे कुछ एड्स देखें और मुझे ऑडिशन के लिए बुलावा भेजा और खुशकिस्मती से मेरा चयन भी हो गया। ‘थलपि’ के बाद ‘रोज़ा’ फिर ‘बॉम्बे’ में काम करने के बाद मुझे ऐसा लगा कि मैं स्टारडम बर्दाश्त नहीं कर पा रहा हूं। दरअसल में मैं काफी प्राइवेट हूँ और लाइम लाइट में रहने की वजह से मुझे अकेलापन नहीं मिल पा रहा था। सो मैंने ‘यू एस’ जाने का निर्णय लिया।”
कुछ सोच कर अरविन्द बोले, “अब जब मैं पलट कर देखता हूँ तो लगता है कि शायद उस वक़्त मैं मैच्योर नहीं था। अब मैं बहुत ही शांति से सबकुछ हैंडल कर लेता हूँ।

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अरविन्द ने फिल्मों से जुड़ने का फैसला किया, “जी हाँ आज मैं अपनी सारी जिम्मेदारियों से फ्री हो चुका हूँ। सो आज मैं फिल्मों के लिए समय दे पाउँगा। मुझे ख़ुशी है कि बॉलीवुड और टॉलीवुड के सब लोगों ने मेरी फिल्म, “तानी उरवां” देख कर उसकी तारीफ की है और अब मैं कुछ अच्छी फ़िल्में भी कर रहा हूँ। मेरी एक तेलुगु फिल्म भी सितम्बर में बनकर रिलीज़ होने वाली है। यह फिल्म तनिर्वान की रीमेक फिल्म है। इस फिल्म में मेरी बेटी अधीरा स्वामी मेरे कॉस्ट्यूम डिजाईन कर रही हैं। अधीरा को आर्ट्स में बहुत रूचि है, उसे स्कोलरशिप भी मिल रही है, सो मेरे बच्चे जिस किसी चीज़ में रूचि रखते हैं मैं उन्हें वही करने की इजाजत भी देता हूँ मेरा बेटा रूद्र पता नहीं फिल्मों में काम करना चाहेगा या नहीं, फ़िलहाल उसे भौतिक विज्ञान में बहुत रूचि है।

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अरविन्द ने खुद अपने दोनों बच्चों की अपनी देख रेख में परवरिश की है, “जी! पेरेंटिंग कोई आसान काम नहीं है। हमारी जनरेशन उस वक़्त की बहुत अलग थी। जो कुछ भी हमारे माता-पिता कह दिया करते उसका हम सब आज्ञाकारी बच्चों की तरह पालन किया करते। यदि फिर उस वक़्त हमे चाईनीज़ या कुछ अन्य खाने की इच्छा भी हो तो भी जो कुछ दिया जाता बस उसी को स्वीकारना होता था। मैंने भी अपनी जवानी के समय विद्रोह किया होगा। आज जब मैं पेरेंटिंग कर रहा था तब मैंने अपने आप में और अपने बच्चों की गलतियों के बीच अच्छा खासा संतुलन बनाए रखा था। आज के बच्चे बहुत ही एडवांस हैं टेक्निकली भी आज जो कुछ जानकारी आप को चाहिए वह सब नेट पर मिल जाती है। खैर मैंने भी अपने गुस्से को कंट्रोल रख अपने बच्चों को उनकी चूक पर भी बहुत सरलता से उन्हें समझाया है। यह सच है कि कोई भी व्यक्ति तनाव ज्यादा देर तक नहीं ले सकता है। किन्तु हर तनावपूर्ण स्थिति में भी मैं अपने बच्चों पर कभी भी क्रोधित नहीं हुआ हूँ। यही कारण है मेरे बच्चे सब कुछ मुझे बताया करते। दोस्ती रखना बच्चों के साथ अत्यन्त अनिवार्य है आज की दुनिया में, आज मेरी बेटी 19 साल की हो चली है और बेटा भी अपनी देख रेख खुद करने के लायक है और सबसे अच्छी बात यह है कि हमारे रिश्ते में समझदारी है।

तो क्या अरविन्द ने अपने बच्चों को खाना भी पका कर खिलाया है। हंस कर बोले जी बिल्कुल मैंने उन्हें साउथ इंडियन डिशेस जैसे, “इडली साम्भर, पुल्ली सद्दो और अन्य कई डिशेस बना कर खिलाई हैं।

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अरविन्द किस्मत से ज्यादा हार्ड वर्क में विश्वास करते हैं – बिल्कुल, देखिये कुछ वर्षों पहले मेरा एक्सीडेंट हुआ था और मैं पैरालाइसिस का शिकार हो गया था। यहाँ तक कि मैं बाथरूम तक भी चलने में असमर्थ था। किन्तु एक समय यह आया कि मैंने २२ किलोमीटर की दौड़ अपनी इच्छा शक्ति को मजबूत करने के लिए दौड़ी। तो यह मेरा हार्ड वर्क और आत्मबल ही तो था। मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि लक हमारी ज़िन्दगी में कोई मायने नहीं रखती। मैंने आज तक जो कोई भी काम हाथ में लिया है उसी फिर 22 घंटे क्यों न देने हो जरूर दिए हैं। हार्ड वर्क से ही आदमी उन्नति करता है। ..लक भी साथ देता है तब..

अरविन्द स्वामी ने फिल्म “डिअर डैड” के बारे में बताया कि यह फिल्म पिता-बेटे के रिश्तों पर आधारित नहीं है। यह एक बहुत ही उलझी (कॉम्पलिकेटेड) हुई फिल्म है और इस फिल्म की स्क्रिप्ट बहुत ही बेहतरीन है सो इसे पहली बारी पढ़ कर ही मैंने हामी भर दी। चलिए  वर्षों बाद अरविन्द को बड़े पर्दे पर देख लोगों की क्या प्रतिक्रिया होगी ये तो बॉक्स ऑफिस रिपोर्ट ही तय कर पायेगी।

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Mayapuri