क्या आशा पारेख को फिल्में छोड़ देना चाहिए ?

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asha_apple_sajan

 

मायापुरी अंक 13.1974

फिल्म इंडस्ट्री में सफलता पानी ही तो योग्यता की कम और किस्मत की बहुत जरूरत पड़ती है। किसी सितारे के हाथ की भाग्य-रेखा बली है तो उसका पानी भी भक्-भक् करके जलेगा यदि किसी सितारे का भाग्य-सूर्य निस्तेज है तो उस बेचारे का पेट्रोल भी फुसफुसा कर बुझ जायेगा। ऐसी ही भाग्य की बली है आशा पारेख आशा के पास न तो कभी एक दर्जे का सौन्दर्य रहा है। न ही एक दर्जे की प्रतिभा फिर भी वह वर्षों तक एक दर्जे की हीरोइन बनी रही क्यों भला ? इसीलिए कि भाग्य उसके साथ था।

आशा की पहली फिल्म थी ‘दिल देके देखो’ फिल्म का संगीत मधुर और कर्णप्रिय था। साथ में था उछल-कूद में बन्दर से भी अधिक फुर्तीला शम्मी कपूर यानी फिल्म में आशा के अतिरिक्त भी बहुत कुछ था आशा पारेख के अभिनय में कोई जान नही थी किन्तु फिल्म में उसकी अदाएं और हाव-भाव दर्शकों को भा गये। एक स्थान पर वह रूठे शम्मी कपूर को मनाने के लिए शेर पर शेर बोलती है। उनके प्रत्येक शेर पर हाल में ऐसी तालियां पिटती थी मानों वह सचमुच के शेर का शिकार कर रही हो। तब तक दर्शकों ने किसी हीरोइन के मुख से इस किस्म के शेर नही सुने थे जहां वो कदम रखते है, वहां हम सिर पटकते है यह शायरी दर्शकों का मन गुदगुदा गई और दर्शकों ने आशा पारेख को उसी तरह धड़ल्ले से स्वीकार कर लिया जैसे आजकल वे केवल बदन देखकर नीतू सिंह, आशा सचदेव या रीना रॉय या किसी भी क-ख-ग हीरोइन को स्वीकार कर लेते है।

‘दिल देके देखो’ के बाद नाजिर हुसैन की प्रत्येक फिल्म की हीरोइन आशा पारेख रही। उनकी लगभग प्रत्येक फिल्म ने सिल्वर जुबली मनाई। नाजिर हुसैन ऐसा व्यक्ति है जो अपनी फिल्म कभी भी हीरोइन के कंधों पर नही छोड़ता। उसकी फिल्म में फोटोग्राफी, संगीत, पार्श्र्व-संगीत, सम्पादन सभी कुशलता से होत है। जो हो उसके कारण दस वर्ष आशा पारेख ए-क्लास हीरोइन बनी रही। लेकिन पिछले कई वर्षों से पूना इंस्टीट्यूट से थोक के भाव पर जो हीरोइन आ रही है। उन्होनें आशा पारेख की मार्केट ठण्डी कर दी। निर्मताओं को एकाएक ही लगा कि आशा में अभिनय की योग्यता नही है। (हालांकि यह योग्यता आशा में कभी भी नही रही थी) और तो और इस अंधी दौड़ में नाजिर हुसैन ने भी आशा का साथ छोड़ दिया (डूबती नैया के सहारे कौन दरिया पार करने का खतरा मोल लेता है) नाजिर ने अपनी फिल्म ‘यादों की बारात’ में जीनत अमान और नीतू सिंह को ले लिया।

क्या आप सोचते है कि इससे आशा पारेख को कोई सदमा नही लगा ? सदमा तो लगा मगर आशा ने यही कहा “मैं अपने विदेशी टूर पर इतनी व्यस्त थी कि मेरे पास नाजिर हुसैन की फिल्म के लिए कोई डेट नही थी। तब मैंने इंग्लैण्ड, अमेरिका और सिंगापुर का चार महीने का डांस-टूर प्लान कर रखा था। इस टूर से मैं विदेशों में कितनी प्रसिद्ध हो गई। मैं ‘यादों की बारात’ के लिए अपना ट्रिप कैंसल नही कर सकती थी” (आशा पारेख भी तो इन्सान है और सपनों की दुनिया में रहती है)

और यही आशा पारेख ऋषि दा की फिल्म ‘चुपके-चुपके’ में काम करने के लिए अपना डांस-टूर बीच में ही खत्म कर अमेरिका से लौट आई। मगर बम्बई पहुंच कर आशा पारेख को पता चला कि उसका रोल तो शर्मिला टैगोर उड़ा ले गई। डार्विन ने कितना ठीक कहा था इस संसार में केवल शक्तिशाली की जीत होती है वास्तव में ऋषि दा को आशा के अभिनय पर विश्वास नही था शर्मिला अनबन होने के कारण ऋषि दा ने अनमने से होकर गुजराती हीरोइन को ले तो लिया मगर वह दिल में नाखुश थे। जब शर्मिला ने एक हवाई यात्रा के दौरान ऋषि दो से अपने भेदभाव बराबर कर लिये तो ऋषि दा ने भी उसे पुरस्कार में ‘चुपके-चुपके’ का रोल दे डाला।

यह आशा पारेख के लिए दूसरा बड़ा सदमा था। विशेषतया इसलिए कि आशा शर्मिला को अपना शुभचिंतक समझती थी। उसने कहा भी “मुझे कम से कम शर्मिला से ऐसी आशा नही थी”

वास्तव में आशा पारेख की तरकश में कोई भी ऐसा तीर नही बचा जिसे उसने फिल्मों में ‘वापस’ आने के लिए आजमाया न हो। ‘चिराग’ में उसने अंधी हीरोइन की नाटकीय भूमिका निभाई मगर उसे विशेष सफलता न मिली चिराग अपने तमाम नाटकीय लटकों के बावजूद फ्लॉप गई। ‘प्यार का मौसम’ में उसे रोमांटिक भूमिका मिली मगर यहां भी आशा अपना रंग न जमा सकी। अंत में आशा ने ‘हीरा’ जिप्सी लड़की का रोल किया मगर ‘हीरा’ भी फ्लॉप हो गई। अब आशा पारेख इसे भले ही स्वीकार न करे मगर फिल्म इंडस्ट्री ने एक तरह से उसे भुला दिया है

अब आशा को क्या करना चाहिये ? क्या उसे सुनील दत्त की तरह वापस आने की कोशिश में जुटे रहना चाहिए ? नही हमारी नेक सलाह में आशा को अब स्वयं ही रिटायर हो जाना चाहिए। जितना अधिक वह ‘वापस’ आने की कोशिश करेगी, उतना ही उसकी प्रतिष्ठा नीचे आयेगी। इस समय आशा को वहीदा रहमान का उदाहरण अपनाना चाहिए। शादी और फिर घरेलू जीवन और साथ में मन-बहलाव के लिए देश विदेश में डांस ट्रिप आगे आशा की अपनी मर्जी है हम बीच में दखल देने वाले कौन होते है।  v


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Mayapuri

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