अशोक कुमार

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दादा मुनि को उनके जन्मदिन पर श्रदांजलि

अशोक कुमार ऐसे एक्टर थे जिनके अभिनय की दाद आज भी दी जाती है भारतीय फिल्मो के इतिहास में जब बोलती फिल्मो का दौर शुरू हुआ , उस वक्त अभिनय में काफी लाउडनैस हुआ करती थी | इसके साथ ही उस वक्त रंगमंच का भी अच्छा दौर था , पारसी रंगमंच के प्रभाव के कारण संवाद अदायगी पर काफी जोर दिया जाता था | उस दौर में अशोक कुमार “दादा मुनि ” हिंदी सिनेमा से ऐसे कलाकार के रूप में सामने आये , जिनके अभिनय से सहजता और स्वाभाविकता थी | उन्होंने अपनी अभिनय क्षमता से भारतीय सिनेमा में स्टारडम को नया आयाम दिया |

 इस बहतरीन एक्टर का जन्म बिहार के भागलपुर में गंगा तट पर स्तिथ आदमपुर मोहल्ले में 13 अक्टूबर 1911 को जन्मे कुमुद लाल गांगुली उर्फ़ अशोक कुमार को दादा मुनी के नाम से भी जाना जाता है। अशोक कुमार ने 300 से ज़्यादा फ़िल्मों में अभिनय किया।अशोक कुमार सभी भाई-बहनों में बड़े थे। उनके पिता कुंजलाल गांगुली मध्य प्रदेश के खंडवा में वकील थे।गायक एवं अभिनेता किशोर कुमार एवं अभिनेता अनूप कुमार उनके छोटे भाई थे। दरअसल इन दोनों को फ़िल्मों में आने की प्रेरणा भी अशोक कुमार से ही मिली। अशोक कुमार ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा मध्यप्रदेश के खंडवा शहर में प्राप्त की थी और बाद में अशोक कुमार ने अपनी स्नातक की शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पूरी की थी।

 अशोक कुमार का फ़िल्मी करियर बहुत उम्दा अभिनय से पारी पूर्ण था क्योकि वह कभी भी जोखिम लेने में नहीं घबराए और न ही उन्होंने अपने आप को किसी इमेज से बंधने दिया व उन्होंने ही उस वक्त नायक को नई छवि दी | ऐसे वक्त में जब हीरो को अच्छाई का प्रतीक समझा जाता था , उस वक्त उन्होंने फिल्म “किस्मत ” में एंटी हीरो की भूमिका निभाते हुए उस दौर की प्रचलित मान्यताओ को खारिज कर दिया | उन्होंने ऐसे दौर में अभिनय को सम्मानजनक स्थान दिलाया , जब फिल्मो को सम्मान की नजरो से नही देखा जाता था |

 फ़िल्म जगत में दादामुनी के नाम से लोकप्रिय अशोक कुमार के अभिनय सफर की शुरुआत किसी फ़िल्मी कहानी से कम नहीं थी। 1936 में बांबे टॉकीज स्टूडियो की फ़िल्म ‘जीवन नैया’ के अभिनेता अचानक बीमार हो गए और कंपनी को नए कलाकार की तलाश थी। ऐसी स्थिति में स्टूडियो के मालिक हिमांशु राय की नज़र आकर्षक व्यक्तित्व के धनी लैबोरेटरी असिस्टेंट अशोक कुमार पर पड़ी और उनसे अभिनय करने का प्रस्ताव दिया था। यहीं से उनके अभिनय का सफ़र शुरू हो गया। उनकी अगली फ़िल्म ‘अछूत कन्या’ थी। 1937 में प्रदर्शित फ़िल्म अछूत कन्या में देविका रानी उनकी नायिका थीं। यह फ़िल्म कामयाब रही और उसने दादामुनी को बड़े सितारों की श्रेणी में स्थापित कर दिया। उस ज़माने के लिहाज़ से यह महत्त्वपूर्ण फ़िल्म थी और इसी के साथ सामाजिक समस्याओं पर आधारित फ़िल्मों की शुरुआत हुई। देविका रानी के साथ उन्होंने आगे भी कई फ़िल्में की जिनमें ‘इज्जत’, ‘सावित्री’, ‘निर्मला’ आदि शामिल हैं। इसके बाद उनकी जोड़ी लीला चिटनिस के साथ बनी।एक स्टार के रूप में अशोक कुमार की छवि 1943 में आई ‘क़िस्मत’ फ़िल्म से बनी। पर्दे पर सिगरेट का धुँआ उड़ाते अशोक कुमार ने राम की छवि वाले नायक के उस दौर में इस फ़िल्म के जरिए एंटी हीरो के पात्र को निभाने का जोखिम उठाया। यह जोखिम उनके लिए बेहद फ़ायदेमंद साबित हुआ और इस फ़िल्म ने सफलता के कई कीर्तिमान बनाए। उसी दशक में उनकी एक और फ़िल्म महल आई, जिसमें मधुबाला थीं। रोमांचक फ़िल्म महल को भी बेहद कामयाबी मिली। बाद के दिनों में जब हिन्दी सिनेमा में दिलीप, देव और राज की तिकड़ी की लोकप्रियता चरम पर थी, उस समय भी उनका अभिनय लोगों के सर चढ़कर बोलता रहा और उनकी फ़िल्में कामयाब होती रहीं। अपने दौर की अन्य अभिनेत्रियों के साथ-साथ अशोक कुमार ने मीना कुमारी के साथ भी कई फ़िल्मों में अभिनय किया जिनमें पाकीज़ा, बहू बेगम, एक ही रास्ता, बंदिश, आरती आदि शामिल हैं।अशोक कुमार के अभिनय की चर्चा उनकी आशीर्वाद फ़िल्म के बिना अधूरी ही रहेगी। इस फ़िल्म में उन्होंने एकदम नए तरह के पात्र को निभाया। इस फ़िल्म में उनका गाया गीत रेलगाड़ी रेलगाड़ी.. काफ़ी लोकप्रिय हुआ था।

 उनके शानदार अभिनय के लिए उन्हें कई अवार्ड्स से सम्मानित किया गया जैसे 1959  संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया,1962  राखी फ़िल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला था,1967 अफ़साना फ़िल्म के लिए सहायक अभिनेता का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला था,1969  आशीर्वाद फ़िल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला था, 1969  आशीर्वाद फ़िल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिला था।1988  दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया, 1994  स्टार स्क्रीन लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित किया गया, 1995  फ़िल्मफ़ेयर लाइफटाइम एचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया, 1999  पद्म भूषण से सम्मानित किया गया, 2001  उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा अवध सम्मान दिया गया,2007  स्टार स्क्रीन की तरफ़ से “विशेष पुरस्कार” पुरस्कार से सम्मान दिया गया।

 क़रीब छह दशक तक बेमिसाल अभिनय से दर्शकों को रोमांचित करने वाले दादामुनी अशोक कुमार 10 दिसंबर 2001 को इस दुनिया को अलविदा कह गए। वह आज भले ही हमारे बीच नहीं हो लेकिन वह क़रीब 275 फ़िल्मों की ऐसी विरासत छोड़ गए हैं जो हमेशा-हमेशा के लिए दर्शकों को सोचने, गुदगुदाने और रोमांचित करने के लिए पर्याप्त हैं।

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Mayapuri