Birthday Special: आशुतोष गोवारिकर, हम फिल्में बनाएंगे जी जान से

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आशुतोष ने भले ही अनगिनत नैशनल और इंटरनेशनल अवार्ड्स जीते हैं, उनकी फिल्म लगान के लिए उनको ऑस्कर नॉमनैशन भी मिला है लेकिन आर्ट डायरेक्टर नितिन देसाई – जिन्होंने एक से बढ़कर एक फिल्में बनाई हैं – जोधा अकबर की शूटिंग के दौरान जो आशुतोष केलिए बोले (जोधा अकबर ऑल्मोस्ट उनके एनडी स्टूडियो में भी शूट हुई थी) वो किसी भी अवॉर्ड-रिवार्ड से बढ़कर है। उन्होंने कहा था “ऐसी फिल्म बनाने के लिए जिगरा चाहिए, ऐसी फिल्म बनाने के लिए जोश और दीवानगी चाहिए और ये गुण सिर्फ और सिर्फ आशुतोष गोवारिकर में मैंने देखा है”
अली पीटर जॉन

कई बार जाने कैसे सिर्फ एक मुलाकात ही किसी से ऐसी होती है जो दोस्ती में बदल जाती और वो दोस्त बहुत बड़े-बड़े बदलाव ले आते हैं।

आशुतोषआमिर खान और आशुतोष गोवरिकार, दो युवा कलाकार केतन मेहता की होली के लिए शूटिंग कर रहे थे और वहीं वो ऐसे दोस्त बने जिन्होंने भारतीय सिनेमा के इतिहास में बहुत उलटफेर कर दिया।

वो एक स्क्रिप्ट पर काम करने लगे जिसमें ब्रिटिश सैनिकों और लोकल गाँव वालों के के बीच – जो ब्रिटिश सरकार द्वारा बेतुके टैक्स के मारे हैं –एक क्रिकेट मैच हो रहा है। उस स्क्रिप्ट का हिसाब किताब एक बहुत बड़े लेवल की फिल्म बनने की ओर इशारा करने लगा। पहले बात हुई थी कि आमिर उस फिल्म को डायरेक्ट करेंगे लेकिन फिर यही ते हुआ कि आशुतोष डायरेक्ट करेंगे और आमिर अपने बैनर आमिर खान प्रोडक्शन तले उसको प्रोड्यूस करेंगे। फिर क्या था, आमिर और आशुतोष, दो दोस्तों ने मिलकर, समय, पैसा या मेहनत में कोई कसर न छोड़ी और इस मेहनत से जो फिल्म बनी, उसका नाम रखा गया लगान। फिर वही फिल्म एक मास्टरपीस कहलाई, लैंडमार्क हो गई। इस फिल्म का नतीजा ये हुआ कि आशुतोष एक बेहतरीन डायरेक्टर के रूप में ईस्टैब्लिश हो गए और आमिर एक अच्छे प्रोड्यूसर के नाते जाने जाने लगे। दोनों ने जता दिया कि रिस्क लेने से वो पीछे नहीं हटते हैं।

मुझे तो समझ ही नहीं आता कि उनका दिमाग कैसे ये सब हैन्डल कर लेता है

आशुतोष को देखकर कोई भी कह सकता है कि उन्हें इतिहास बहुत पसंद है, उनकी फिल्में देख भी ऐसा ही लगता है। वो इतिहास के कुछ पन्नों को पलटते हैं, उन्हें बाँचते हैं और फिर कुछ ऐसा कमाल करते हैं कि इतिहास को फिर एक बार जीने के लिए साँसे मिल जाती है। उन्होंने अबतक जो भी फिल्में इतिहास की पृष्टभूमि पर बनाई हैं, जिनमें जोधा अकबर, मोहेनजों-दारो और पानीपत है शामिल हैं। ऋतिक रोशन जो जोधा अकबर में अकबर का किरदार निभा रहे थे, एक दफा बोले “मुझे तो समझ ही नहीं आता कि आशुतोष का दिमाग कैसे ये सब हैन्डल कर लेता है। इतना पैसा, इतना डिसिप्लिन, इतनी मेहनत वो इन फिल्मों को बनाने में लगाते हैं जहां इस बात की कोई गारंटी भी नहीं होती कि लगाया पैसा लौट ही आयेगा। मैं दुआ करता हूँ कि आशुतोष यूं ही ऐसी फिल्में बनाते रहे जो कलाकारों को, लेखकों को एक नया चैलेंज देती रहे और इंडियन सिनेमा का नाम ऊंचा होता रहे। मैं आशुतोष के जज़्बे को सलाम करता हूँ। जैसे ऋतिक ने आशुतोष के बारे में अपने ख्याल व्यक्त किए ऐसे हर कोई तो नहीं कर सकता लेकिन उनके साथ काम करने वाले हर शख्स का ख्याल कमोबेश सें ही होगा। किसी एक जगह कहा था कि “आशुतोष गोवारिकर मॉडर्न युग के महबूब खान और के आसिफ का कॉमबीनेशन है”

सबका ख्याल रखते हैं आशुतोष

आशुतोष द्वारा इतिहासिक फिल्में बनने का एक मेजर बेनीफिट ये भी होता है कि सैकड़ों, बल्कि कई बार तो हज़ारों आदमियों, औरतों और बच्चों (आर्टिस्टस) को अच्छी दिहाड़ी पर अच्छा काम मिल जाता है। एक घोड़े वाले ने कहा था “आजकल घोड़ों को कोई पूछता नहीं, घोड़े और इंसान दोनों ही बेकार और भूखे भी हैं, एक यही आशुतोष हैं जो ऐसी फिल्में बनाते हैं कि सबका भला हो जाता है”

आशुतोषअभिनेताओं को ऐसा रोल देने के लिए भी आशुतोष को जाना जाता है जैसा रोल उन्हें और कोई फिल्ममेकर नहीं दे पाता। इसीलिए वो आशुतोष की फिल्म में कहीं कम फीस में भी काम कर लेते हैं जो उन्हें बाकी फिल्ममेकर्स से मिलती है। बहुत से हीरोज तो ऐसे किसी मौके का बाकायदा इंतज़ार करते हैं। आशुतोष ने इंडस्ट्री को बड़ी अभिनेत्रियाँ भी दी हैं जिनमें ऐश्वर्या राय, प्रियंका चोपड़ा के वो रोल भी शामिल हैं जिनमें पैसे के पीछे भागती किसी गुड़िया की बजाए उन्हें एक बेहतर अभिनेत्री की तरह बेहतर पहचान मिलती है।

लेकिन आशुतोष ने हल्की फुलकी फिल्में भी बनाई हैं, जिनमें खेलें हम जी जान से, व्हाट्स योर राशि, और कुछ और फिल्में शामिल है लेकिन ये फिल्में बॉक्स ऑफिस पर उतनी कामयाब नहीं हो पाईं जितनी उनकी बाकी बड़ी, इतिहासिक फिल्में हुई हैं।

आशुतोष की पिछली फिल्म पानीपत सफल नहीं हो पाई लेकिन वो फिर भी एक और बड़ी, भव्य और पिछली से ज्यादा कठिन फिल्म प्लान कर रहे हैं।

आशुतोषआशुतोष एक और नए प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे जिसमें उस महिला की कहानी थी जो लिज्जत पापड़ मूवमेंट की सूत्रधार थीं, लेकिन फिर लॉकडाउन लग गया और उस फिल्म के बारे में ज़्यादा कुछ पता नहीं चल सका। वो राजीव कपूर के साथ भी एक फिल्म प्लान कर चुके थे जिससे राजीव कपूर वापसी करने वाले थे।

मगर फिर राजीव की पिछले हफ्ते आकस्मि)क मृत्यु हो गई और उनकी मौत ने ये एक बार फिर याद दिला दिया कि फिल्म बनाना बहुत बहुत मुश्किल काम है। लेकिन जैसा आशुतोष ने कहा था “खेलें हम जी जान से” तो फिल्मों से जूझने का आशुतोष का ये खेल जारी रहेगा।

– Translated by – सिद्धार्थ अरोड़ा ‘सहर’


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