इतने हास्य कलाकारों में से मुझे ही क्यों चुना गया? – असरानी

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मायापुरी अंक 52,1975

ऋषिकेश मुखर्जी जैसे सुलझे दूरदर्शी फिल्म निर्माता ने इतने हास्य कलाकारों में से असरानी को विमलराय कृत ‘चेताली’ फिल्म के लिए चुना आखिर क्यों? और भी तो खलनायक, हास्यकलाकार तथा चरित्र कलाकार ऐसे हैं जिन्हें सिनेदर्शक उनकी असाधारण अभिनय क्षमता तथा खलनायकपन की विशेषता के लिए भली-भांति जानते और मानते हैं। वे भी तो ‘चैताली’ फिल्म की उस भूमिका के लिए, (एक शराबी बदमाश पर अच्छे दिलवाला, जो कि फिल्म की हीरोइन से प्यार करता है) उपयुक्त हो सकते थे। फिर ऋषिकेश मुखर्जी ने व्यावसायिक यथार्थ के खिलाफ ऐसा चयन क्यों किया?

जब असरानी से इस बारे में पूछा गया तो, आराम कुर्सी पर बैठे दोस्ताना हंसी हंसते हुए (गुड्डी ‘अभिमान’ ‘कोशिश’ ‘परिचय’ ‘बिदाई’ ‘रोटी’ ‘चुपके चुपके’ ‘खुश्बू’ आदि फिल्मों का कामयाब कलाकार) ने बड़े ही कोमल स्वर में कहा, अभिनय आज अधिक गहराई में पहुंच चुका है और फिल्म तकनीक की तरक्की इस हद तक हुई है कि कलाकार को अब पुरानी पद्धति और बंधी तुली रीति पर चलने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता उसे तो अब आप अपनी उंगली उठाकर, विशेष ढंग से दृष्टि-भंगिमा के साथ आना-जाना है जिससे वांछनीय प्रभाव की सृष्टि हो पाये, वातावरण को हास्यमय बनाते हुए असरानी ने फिर कहा, कॉमेडी को भोंडेपन में उतारना ठीक नहीं है। अक्सर मैंने देखा है कि बहुत से माने हुए चरित्र कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन ठीक प्रकार नही कर पाते। उसका कारण है कि वे कॉमेडी की पुरानी धारा से लिपटे हुए हैं।

विश्वास को निभाया

जब ऋषिकेश मुखर्जी ने फिल्म ‘चैताली’ में असरानी को एक जटिल पात्र निभाने के लिए दिया तो बहुत से फिल्मी लोग उनकी इस राय से सहमत नही हुए क्योंकि वे सभी असरानी को बहुत मुलायम और हास्य कलाकार समझते थे, और इस प्रकार के जटिल पात्र के लिए उपयुक्त नहीं समझते थे, उनकी राय थी कि यह पात्र असरानी के बजाय किसी माने हुए खलनायक को ही चुना जाए परंतु ऋषिदा जो अपनी व्यक्तिगत विचार-धार रखते हैं, उन पर इस अवहेलना का कोई असर नहीं पड़ा, ऋषिदा कलाकारों के चयन मे किसी का दख़ल सहन नहीं करते।

आज उन्हीं लोगों का विचार है (जो कि उस जटिल-पात्र असरानी द्वारा निभाये जाने के पक्ष में थे) कि असरानी ने उस जटिल पात्र को बड़े ही प्रभावशाली ढंग से निभाया है।

भरोसा करने लायक कलाकारों की कमी

फिल्म उद्योग में भरोसा करने लायक कलाकारों का बड़ा अभाव है। मोती लाल और याकूब जैसे कलाकारों की मृत्यु के उपरांत और अब ‘चैताली’ फिल्म के बाद प्राण, प्रेमनाथ और असरानी को भी विश्वास भरोसा करने लायक कलाकारों की गिनती में गिनना यकीनी हो गया है।

पर एक प्रश्न यह भी उठता है कि अगर असरानी इतना अच्छा अभिनय करते है जिससे सिनेमा प्रेमी उनकी कला देखने सिनेमा हॉलो में दौड़ पड़ते हैं, तो फिर अपने प्रथम कॉमेडियन को नियुक्त क्यों नही रखते? और अपने उन्नत स्थान का आनंद क्यों नहीं भोगते? जो कुछ उन्होंने पा लिया है, उसे क्यों त्यागते हैं? पुरानी हास्य शैली की खिलाफत क्यों करते हैं?

इन सबका जवाब असरानी ने यूं दिया

मैं अपने आपको प्रथम हास्य कलाकार कभी नहीं मान सकता, और ना ही अपने आपको एक ही तरह के पात्रों में बांध कर रख सकता हूं, क्योंकि कलाकार को अपनी कला में चहुंमुखी प्रतिभा का विस्तार करना आवश्यक होता है।

फिर भी मुझे हास्य अभिनय ही अधिक पसंद है क्योंकि उसमें कुछ शक्ति होती है तथा उसमें कुछ कर दिखाने का आमत्रंण रहता है,

असरानी के अनुसार आज हिंदी फिल्मों में ‘कॉमेडी’ को इस कदर विकृत और भोंडा बना दिया गया है कि एक सच्चे कलाकार को घृणा होने लगती है जब उसे अश्लील भाव भंगिमाओं द्वारा ‘कॉमेडी’ का रूप देना पड़ता है।

मेरे विचार में अंतिम विश्लेषण किया जाए तो कहना पड़ेगा कि हर कलाकार को अपने आपको अपने प्रशंसको के अति चतुर (टीका टिप्पणी) की भीतरी तहों में देखना चाहिए।

इस युवक कलाकार ने बड़े ही नम्रता पूर्वक कहा, मुझे मेरे प्रशंसक चाहे मुझे ‘भांड’ के रूप में देख या उठाईगीर, शराबी जुआरी या चोर के रूप में, इसकी कोई बात नही, क्योंकि मुझे अपने हर प्रकार के प्रशंसक या आलोचकों से संपर्क रखना ही है। दर्शक ही मेरे काम की सच्ची कसौटी है।

हमें अब प्रतीक्षा है ‘चैताली’ के प्रदर्शन की और यह देखने की जिज्ञासा भी कि ‘असरानी’ अपने इस रूप को साकार करने में कहां तक सफल होता है, अगर उक्त विवरण के अनुरूप असरानी अभिनय क्षमता का प्रमाण, पात्र के सांचे में ढाल देता है तो निश्चय असरानी एक नई इमेज स्थापित करने का हकदार होगा वैसे भविष्यावाणियों कम ही सफल हो पायी है ‘मायापुरी’ असरानी के नये रूप को सफल होने के लिए शुभ कामना करती है।


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Mayapuri

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