मेरा असली नाम गोवर्धन असरानी है – असरानी

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मायापुरी अंक 2.1974

आज के प्रसिद्ध कलाकार असरानी से मेरी भेंट यूं तो कई बार हुई मगर इस बार जब उन्हें राजेश खन्ना के साथ काम करते हुए फिल्म ‘बंडलबाज’ के सैट पर देखा तो बड़ा ही विचित्र लगा। विचित्र इसलिए कि राजेश खन्ना बार-बार रिटेक दे रहे थे और असरानी एक ही बार में इतने कमाल का शॉट दे गये कि सैट पर उपस्थित सभी लोगों के मुंह से वाह-वाह निकल पड़ी। मैंने असरानी से ‘मायापुरी’ के लिए एक इंटरव्यू टेप करने की इच्छा प्रकट की जिसे सहज भाव से उन्होनें स्वीकार कर लिया और दूसरे दिन मोहन स्टूडियो में असरानी से भेंट हुई। तो बड़ी ही प्रसन्न मुद्रा में वह बैठा थे। अपने वायदे के अनुसार उन्होनें हमें लगभग पैंतालिस मिनट का इंटरव्यू टेप करवाया। उसी टैप इंटरव्यू के कुछ अंश यहां प्रस्तुत है।

असरानी जी कि आपने अपना नाम असरानी क्यों रखा? क्या असरानी शब्द से किसी अर्थ विशेष की अभिव्यक्ति होती है?

जी नही, दरअसल मेरा नाम गोवर्धन कुमार है। असरानी थोड़ा छोटा नाम है और मन को अच्छा लगता है इसलिए रखा लिया। कोई खास अर्थ नही है इसका। बस यूं ही असरानी, आप देखिए कहने में भी थोड़ा मजा आता है क्यों?

बिल्कुल हां तो असरानी जी यह बतायें कि जब आप किसी पात्र को सैट पर करते है तो उसकी इमेज पहले ही आपके मन में होती है या सैट पर जा कर ही बनती है।

सैट पर जा कर तो बिल्कुल नही बनती जी। दरअसल पहले ही दिमाग में एक तस्वीर बनानी पड़ती है। इस संबंध में मैं चरित्र कलाकार डेविड साहब की एक बात आपको बताता हूं। एक बार डेविड साहब से मेरी भेंट हुई तो उन्होनें बताया कि उन्होनें एक सौ चालीस, पैंतालिस फिल्मों में काम किया है। अब तो शायद यह टोटल बढ़कर तीन सौ या उससे ज्यादा हो गया हो। हां तो उन्होनें कहा कि जिन फिल्मों में उन्होनें काम किया उनकी कहानी तक उन्हें नही पता थी। डेविड साहब बोले कि बस सैट पर जा कर पता चलता है कि हमें फलां हीरोइन का बाप बनना है और फलां का पति, वहां पर डायलॉग बता दिए जाते है और ड्रेस दे दी जाती है कि यह तुम्हारी ड्रेस है पहन लो। जब डेविड साहब की यह बात मैंने सुनी तो बड़ा दुख हुआ। दुख इसलिए कि जब आपको अपने कैरेक्टर का पता नही है, ड्रेस का पता नही है, और आपको अपनी कहानी का पता नही है तो अपने कैरेक्टर के साथ आप कैसे इंसाफ करेंगे। मैं तो साहब पहले कहानी सुनता हूं और उसमें अपना कैरेक्टर देखता हूं। अगर कोई कहानी पसन्द नही आती तो माफी मांग लेता हूं। कह देता हूं कि नही साहब डेट्स नही है या कहानी पसन्द नही है और ये कैरेक्टर वाली बात तो साहब, इसके बारे में तो पहले ही सोचना पड़ता है तभी अंदर की चीज बाहर आ पाती है।

खैर यह तो निश्चित बात है असरानी जी की कहानियों के प्रति तो विवेक से काम लेना चाहिए और कम से कम नए आर्टिस्ट के लिए तो यह बिल्कुल जरूरी है। इस बारे में आपका क्या ख्याल है?

आर्टिस्ट तो हमेशा नया ही होता है। कल तक तो मैं अशोक कुमार जी के साथ एक फिल्म में काम कर रहा था। कितने पुराने मंजे हुए कलाकार है। अशोक जी ?

मगर आज भी उन्हें सैट पर दस बजे पहुंचना है तो ठीक दस ही बजे पहुंचेंगे। ये मैंने खुद अपनी आंखो से देखा है कि वे सैट पर मेरा डायलॉग क्या है, मुझे क्या करना है, मैं कहां बैठूं इस तरह निर्देशक से पूछते है कि उसे पहला दिन हो उनकी जिन्दगी में शूटिंग का। तो इस बात को आखिर आप क्या कहेंगे ? मेरी अपनी पूरी कोशिश यह रहती है कि मैं कुछ सीखूं। सम्पूर्णता में मैं यकीन नही रखता। यदि कोई आर्टिस्ट अपने आप को सम्पूर्ण समझता है तो यह उसकी बड़ी भारी भूल है। ऐसा आर्टिस्ट बहुत जल्दी खत्म हो जाता है।

पूना इंस्टीट्यूट से आने वाली प्रतिभाओं का अभिनय जीवन प्राय: क्षणिक रहता है। एक साल, दो साल या तीन साल और फिर धीरे-धीरे ये प्रतिभाएं समाप्त हो जाती है। क्या कभी आपने इस बारे में भी सोचा है असरानी जी कि आप लम्बे समय तक टिक पाने के लिए कुछ ऐसा करें कि दर्शकों के हमेशा चहेते बने रहें।

हूं असरानी ने एक पल सोचते हुए कहा, बात यह है वशिष्ठजी कि यह तो आप मानेंगे कि कुछ तो है इन प्रतिभाओं में, नही तो ‘चेतना’ जैसी फिल्म चलती नही। हुआ क्या, हुआ ये कि धीरे-धीरे इन प्रतिभाओं ने दर्शकों को निराश कर दिया। वो चमत्कार नही दिखलाया जो दिखलाना चाहिए। दर्शक बेचारे क्या करें, उन्होनें एक नही दो और तीन मौके दिए और फिर भी कुछ बात नही बनी तो उन्होनें ऐसे आर्टिस्टों को भुला दिया जो उनका मनोरंजन न कर सकें। बेचारे दर्शक तो आखिरी क्षण तक ताली बजाने के लिए तैयार रहते हैं मगर कलाकारों को भी तो सोचना चाहिए। रही मेरी बात, तो मैं तो साहब तरह-तरह की भूमिकाएं करना चाहता हूं अशोक जी की तरह एक ही तरह का मनोरंजन दर्शकों में उकताहट पैदा कर देता है, इसलिए मेरी कोशिश हमेशा यही रहती है कि कुछ नयापन हो। कुछ जानदार चीज सामने आए क्यों ?

निश्चिच बात है असरानी जी। हां, तो आप हास्य कलाकार है असरानी जी, एक बात बतायें कि आज जबकि जीवन की परेशानियां इतनी बढ़ गई है। लोग दाने-दाने के लिए परेशान है तो मान लो आपको किसी ऐसी भीड़ में खड़ा कर दिया जाए जो भूखे-नंगे हो, जिनके चेहरे भूख से कुम्हला गए हो और उन्हें पता हो कि अभी छ: दिन उन्हें और खाना नही मिलेगा। इस तरह के लोगों के बीच आपको खड़ा करके कहा जाये कि असरानी जी हंसा दीजिए इन्हें, इनके चेहरे पर मुस्कुराहट लाइए तो आप क्या करेंगे ?

असरानी दूर धूंधलके में जैसे कही खो गये थे। बड़ी ही भावुकता से वह बोले, नही ऐसे लोगों को मैं नही हंसा सकता। ऐसी भीड़ में तो मैं खुद खो जाऊंगा, मेरी इंसानियत बाहर आ जायेगी। हां, यदि मेरे सीने पर बन्दूक रख कर जबरदस्ती कहा जाए तो शायद कुछ कोशिश करूं असरानी ने संयत होते हुए कहा।

एक हास्यास्पद प्रश्न पूछ रहा हूं असरानी जी, जो पाठकों के लिए रुचिकार होगा। आपकी मान लीजिए यदि शादी न हुई होती तो जिस तरह राजेश खन्ना ने या अमिताभ ने सरप्राईज दिया विवाह के मामले में, तो आप क्या सरप्राईज देते?

भई मैं तो जीनत अमान को लेकर भाग जाता। असरानी ने ठहाका लगाते हुए कहा।

‘मायापुरी’ के संबंध में असरानी ने अपनी शुभकामनाएं व्यक्त करते हुए कहा, इसे आप स्वस्थ और रुचिकार पत्रिका बनाएं। ऐसी पत्रिका ‘मायापुरी’ में बने, जिसमें पाठकों का भरपूर मनोरंजन हो कलाकारों के विषय में उचित और तर्कसंगत बातें लिखी जायें तभी सच्ची तस्वीर सामने आयेगी।


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Mayapuri

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