मूवी रिव्यू: ‘अजहर’ के अपने प्वाइंट ऑफ व्यू से कही गई कहानी है – ‘अजहर’

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रेटिंग**

इन दिनों बॉलीवुड में बायोपिक का दौर है खासकर स्पोर्ट्स पर बनी बायोपिक फिल्में जैसे ‘मैरी कॉम’ और ‘भाग मिल्खा भाग’ सुपर हिट सबित हुई। अब इन्हीं फिल्मों में शामिल हुई फिल्म ‘अजहर’ को बायोपिक तो नहीं कहा जा सकता। फिल्म निर्देशक टोनी डिसूजा के अनुसार ये क्रिकेटर अजहरुद्दीन के जीवन के कुछ संस्मरणों पर आधारित टू लाइन स्टोरी है, लेकिन ‘अजहर’ अपने मानकों पर सही नहीं उतर पाती।

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कहानी

हैदराबाद में जन्में अजहर (इमरान हाशमी) को बचपन से क्रिकेट का शौंक रहा, ऊपर से उनके नाना (कुलभूषण खरबंदा) ने उस शौंक को एक गहराई दी। बाद में उनके क्रिकेटर बन जाने के बाद उनकी शादी नौरीन (प्राची देसाई) से करवा दी जाती है। लंदन में एक मैच के दौरान अजहर बॉलीवुड अभिनेत्री संगीता बिजलानी (नरगिस फाखरी) पर कुछ इस तरह मोहित हो जाते हैं कि एक मैच के दौरान वो ‘मैन ऑफ द मैच’ अवॉर्ड संगीता के नाम कर अपने प्यार का इजहार सार्वजनिक तौर पर कर देते हैं। अजहर के पीक पीरीयड में एक ऐसा दौर भी आता है जहां से उसका पतन होना शुरू हो जाता है। उस पर मैच फिक्सिंग का आरोप लगता है जिसके बाद उसके क्रिकेट खेलने पर आजीवन बैन लगा दिया जाता है। बाद में बिना किसी की हैल्प के वो बरसों बाद अपने पर लगा ये कलंक धोने में  किस तरह कामयाब होकर दिखाते हैं।

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निर्देशन

फिल्म के प्लस प्वाइंट कम और माइनस प्वाइंट ज्यादा हैं इसीलिये फिल्म दर्शकों की पसंद पर खरी नहीं उतर पाती। एक तो सब्जेक्ट पूरी तरह से अजहर द्वारा बताये गये वाकयों पर आधारित है, लेखक या निर्देशक ने अपनी तरफ से कोई रिसर्च करने की कोशिश नहीं की लिहाजा जो ‘अजहर’ फिल्म के जरिए बाहर लाना चाहता था फिल्म में वही है और कन्फ्यूजन भरा है क्योंकि अजहर की जिन्दगी के उतार चढ़ाव में न तो कोई रोमांच है और न ही जिज्ञासा। दूसरे फिल्म की कास्टिंग अनघढ है इसका एहसास सचिन और कपिल बने किरदारों को देखकर होता है जिन्हें फिल्म में देख निराशा के साथ हंसी भी आती है। फिल्म में अजहर को उसके संघर्ष के बजाय उसके प्रेम प्रसंग के तहत गाने गाते दिखाया जाना हास्यप्रद लगता है।

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अभिनय

इमरान हाशमी अजहर के रूप में बेशक फिट नहीं बैठते क्योंकि अजहर और उनकी कदकाठी में कहीं कोई मेल नहीं बावजूद इसके इमरान की मेहनत साफ नजर आती है खासकर उसने अजहर की बॉडी लैंग्वेज तथा उसके चलने फिरने के अंदाज को खूबसूरती से फॉलो किया है। प्राची देसाई नौरीन के किरदार में अच्छी लगी हैं उन्होंने अभिनय भी अच्छा किया। नरगिस फाखरी संगीता के वेश में उनके आसपास तो क्या दूर दूर तक नहीं दिखाई देती। अजहर के नाना के किरदार को कुलभूषण खरबंदा तथा मैच फिक्सर शर्मा के रोल को राजेश शर्मा ने प्रभावशाली ढंग से निभाया है। रवि शास्त्री बने गौतम गुलाटी ठीक ठाक लगे लेकिन कपिल देव के तौर पर वरूण वडोला और सचिन बने मोहित छाबड़ा को देखकर गहरी निराशा होती है। दबंग वकील के तौर पर लारा दत्ता ने बढ़िया अभिव्यक्ति दी है वहीं कुणाल रॉय कपूर ने साउथ इंडियन वकील रेड्डी जो अजहर का वकील है के किरदार को अच्छे ढंग से निभाया है। रजित कपूर भी एक सीन में दिखाई देते हैं। फिल्म की कुछ कास्टिंग लंदन से भी की गई थी वहां से कास्ट किये गये, सीसीआई के चेयरमैन के किरदार में के के टंडन महज एक सीन में ही एहसास करवा जाते हैं कि वे एक बेहतरीन अदाकार हैं। इससे पहले वे फिल्म ‘शानदार’ में भी दिखाई दिये थे।

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संगीत

इस फिल्म में अमान मलिक, प्रीतम, डीज चीताज तथा संदीप आदि संगीतकार हैं। वैसे फिल्म के दो गीत बोल दो न जरा तथा इतनी सी बात पहले से ही पसंद किये जा रहे हैं लेकिन फिल्म में वे अटपटे लगते हैं।

क्यों देखें

बायोपिक के तौर पर तो फिल्म में कुछ नहीं लेकिन इमरान हाश्मी के फैन ये फिल्म देख सकते हैं।

 

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Mayapuri