INTERVIEW: ‘‘मुझे हैरानी हुई कि क्या‘ टॉयलेट- एक प्रेम कथा’ भी किसी फिल्म का शीर्षक हो सकता है’’ – भूमि पेडनेकर

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बॉलीवुड में दुबली पतली काया की हीरोइनों को ही पंसद किया जाता है, लेकिन यशराज की फिल्म ‘ दम लगा कर हईशा’ में भूमि पेडनेकर अपने भारी वजन के बावजूद दर्शकों द्धारा खूब पंसद की गई। बेशक उनका बढ़ा हुआ वजन उसकी भूमिका का हिस्सा था, बावजूद इसके उसके लिये एक रिस्क तो था ही। अब भूमि जल्द ही अक्षय कुमार के साथ‘ टॉयलेट – एक प्रेम कथा’ में दिखाई देने वाली हे। फिल्म और उसके पहले से कहीं कम वजन को लेकर एक मुलाकात।

पहले तो आपके और कम होते वेट के लिये बधाई ?

धन्यवाद। लेकिन जैसा कि मैं पहले भी बता चुकी हूं कि मेरी पहली फिल्म में मैने भूमिका की डिमांड को देखते हुये अपना करीब पच्चीस किलों वजन बढ़ाया था। नार्मली तो मैं नार्मल वजन की लड़की हूं।

जब आपको फिल्म का टाइटल बताया गया तो आपका क्या रिएक्शन था?

जब मुझे बताया गया कि फिल्म का नाम‘ टॅायलेट एक प्रेम कथा’ है तो मैं थोड़ा हकबकाई, और जब आगे पता लगा कि ये एक लव स्टोरी है तो और ज्यादा हैरानी हुई क्योंकि मुझे नहीं लगता कि इससे पहले किसी ने अपनी फिल्म का ऐसा नाम रखने की हिमाकत की होगी और न ही आगे ऐसे नाम वाली कोई फिल्म आ सकती है, इसलिये मैं सबसे पहले स्क्रिप्ट सुनने के लिये बेचैन हो उठी।

फिल्म में क्या अच्छा लगा, जिसके लिये आप फिल्म करने के लिये तैयार हो गई ?

मैने जब कहानी सुनी जिसकी वन लाइन थी कि एक सिंपल सी प्रेम कहानी, लेकिन इसके बीच सबसे बड़ा विलन बन जाता है टॉयलेट। ये कांसेप्ट अद्भुत था। बाद में मैने जब इसका नरेशन सुना तो ये एक कमाल की लव स्टोरी निकली। जिसमें अडंर करंट एक बहुत ही स्पेशल इशू है लेकिन ये डाकूमेन्ट्री नहीं है और न ही ये कहती है कि आप बाथरूम बनाओ, क्योंकि फिल्म के किरदारों को देखकर आप खुद सोचने लगेंगें कि हां यार हमारे देश में ये तो वाकई बहुत बड़ा प्रॉब्लम है। ये सब जानने के बाद मैं फिल्म करने के लिये उतावली हो उठी। ये मुझे बाद में पता चला कि फिल्म में में अक्षय कुमार के अपोजिट हूं।

आज भी गांव ही नहीं बल्कि शहरों में भी टॉयलेट काफी बड़ी समस्या है। आप इस बात को मानती हैं?

बिलकुल मानती हूं। क्योंकि जब मुझे रिसर्च के आकंड़े बताये गये तो मैं हक्की बक्की रह गई। मुझे याद हैं जब मैं स्कूल जाया करती थी तो मैं देखती थी कि लोग बाग रेलवे ट्रैक पर या कहीं भी खुले में काली छतरी के साये में शौच कर रहे होते थे। आज मुझे रिलाइज हो रहा है कि ये कितना बड़ा इशू है।

हाल ही में हमारे प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी पर एक किताब,जिसका विमोचन अमित शाह ने किया। उसमें लिखा था आज जब एक सोलह साल की लड़की खुले में शौच करने जाती है तो उसके आत्म सम्मान को कितनी ठेस लगती होगी। भूमि का कहना है कि यही बात फिल्म भी कहती है।

आपको नहीं लगता कि इस तरह के इशू को लेकर ऐसी फिल्में बहुत पहले बन जानी चाहिये थी?

मैं आपकी बात से सहमत हूं क्योंकि ये सवाल हमारे देश की स्थिति के बारे में काफी कुछ कहता है। हमारे देश में कुछ साल पहले ही साफ सफाई को लेकर स्वच्छता अभियान शुरू हुये हैं। उसका फर्क भी पड़ता दिखाई दे रहा है क्योंकि पहले तो सड़कां पर डशबिन भी नहीं होते थे, अब वे दिखाई देने लगे हैं और लोग भी अब कचरा फेंकने के लिये अपने आसपास डशबिन तलाशने लगे हैं।

क्या आपके साथ कभी इस तरह का इशू हुआ है ?

क्यों नहीं । जब हम रोड़ ट्रिप किया करते थे तो मुझे कितनी बार इस स्थिति का सामना करना पड़ा है । मुझे याद है बचपन में में जब अपने परिवार के साथ जयपुर से दिल्ली जा रही थी या मुबंई से गोवा जा रही थी तो उस दौरान कई कई किलोमीटर तक षौच करने की सुविधा नहीं होती थी। एक बार तो मैने करीब ढाई घंटे तक कंट्रोल किया, उस वक्त मैं पंदरह सोलह साल की हो चुकी थी । मुझे याद हैं कि बीच में कोई गांव सा आया था तो एक घर में जाकर मैने एक मराठी महिला से उनका टॉयलेट इस्तेमाल करने की इजाजत मांगी थी जो थैंक गॉड मिल गई थी ।

इस प्रॉब्लम को लेकर आप क्या सोचती हैं ?

मुझे लगता है कि ये इंस्ट्रक्चर की प्रॉब्लम नहीं बल्कि ये मांइड सेट की प्राब्लम है। जो मुझे ये फिल्म करने के बाद रिलाइज हुआ। हैरानी होती है कि आज भी जुहू बीच जैसे पॉश इलाके में सुबह सुबह आपको समुद्र किनारे लोग बैठे दिखाई दे जायेगें। चलो पहले हम सोचते थे कि हमारे देश में गरीबी अशिक्षा है इसलिये हम ये सब नहीं कर पा रहे लेकिन आज भी लोग बाग जानबूझ कर ऐसा कर रहे हैं। हमारी फिल्म में एक सीन है जिसमें एक किरदार कहता हैं कि जिस घर में तुलसी का आंगन हो वहां शौचालय कैसे बनायें? ये बहुत बड़ा माइंड सेट इशू है हमारी फिल्म इसी माइंडसेट को लेकर चल रही है।

 


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Mayapuri

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