बिग बी के सफर का एक नया मोड़ वे जितने बूढ़े होते जा रहे हैं उतना ही बेहतर हो रहे हैं – अली पीटर जॉन

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इस ऊँचे लंबे इंसान को झुकाया नहीं जा सकता चाहे जितना जोर लगा लीजिये। उन्होंने अनजाने राहगीर के रूप में, एक निर्देश हीन सफर की शुरुआत की थी लेकिन ‘नंबर एक से दस तक’ का खिताब, उनके नए-नए हासिल हुए स्टारडम को मद्देनजर रखते हुए गुलशन राय ( नब्बे के दशक के सर्वाधिक कामयाब डिस्ट्रीब्यूटर, प्रोड्यूसर्स में से एक, जिन्होंने  फिल्म ‘दीवार’ प्रोड्यूस की थी, जिस फिल्म ने अमिताभ को वह नाम दिया, ‘द एंग्री यंग मैन’ जो नाम तब भी उनके साथ जुड़ा रहा जब उन्होंने ‘कभी कभी’, ‘कसमे वादे’, ‘सिलसिला’ जैसी रोमांटिक फिल्मों के साथ-साथ ऋषिकेश मुखर्जी की लीक से हटकर फिल्में भी की।वे ‘द एंग्री मैन’ के खिताब को बहाल रख सकते थे अगर उन्होंने 5 वर्ष की वह बहुचर्चित वॉलेंट्री छुट्टी नहीं ली होती, जिसके बारे में  आज जब वे पीछे मुड़कर देखते हैं तो मानते हैं कि उन्हें नहीं लेना चाहिए था। जब वे दोबारा लौटे तो उनकी कैरियर की धरती पहले जितनी मजबूत नहीं थी। उन्होंने उस समय फिल्म, मृत्युदंड, सूर्यवंशी और मेजर साहब में काम किया जिसमें संयोग से उनका युवा पुत्र अभिषेक बच्चन, अपने पिता अमिताभ द्वारा, पूरी नेक नियति से खड़ी की गई खुद की कंपनी ‘एबीसीएल’ के प्रोडक्शन कंट्रोलर थे। लेकिन यह कंपनी एक के बाद एक मात का सामना करती रही। सबसे बड़ी मात रही, बैंगलोर में आयोजित ‘मिस वर्ल्ड पेजेंट शो’ जिसमें उनका बहुत करारा नुकसान हुआ और तब अमिताभ तथा उनकी कंपनी ने एक नया फैसला लिया कि अब कभी फिल्म प्रोडक्शन में हाथ नहीं आजमाएंगे। यह वह दौर था जब अमिताभ के पास वाकई कोई काम नहीं था और बताया जाता है कि उस वक्त वे अपने बेस्ट फ्रेंड यश चोपड़ा के पास बतौर एक्टर काम मांगने गए थे तथा यश चोपड़ा ने दोस्ती निभाते हुए उनके लिए फिल्म ‘मोहब्बतें’ बनाई जिसमें शाहरुख खान भी थे। वह फिल्म भले ही बहुत अच्छी न चली हो लेकिन अमिताभ बच्चन एक एक्टर के रुप में स्थापित हो गए, जो अपनी उम्र के अनुसार किसी भी रोल के प्रति न्याय करने की क्षमता रखते थे। उनके इसी एटीट्यूड और बहुचर्चित दृढ़ता के चलते वे उस कठिन दौर को पार कर गए तथा भारत के सर्वश्रेष्ठ वर्सेटाइल एक्टर के रूप में उभरे जो हर दौर के दर्शकों को, चाहें उनके जमाने के दर्शक हो या एकदम नए जमाने के, बेहद कम उम्र दर्शन हों, सबको थिएटर तक खींच लेने की शक्ति रखते थे।  फिल्म- बागवान, बाबुल, के साथ शुरू हुआ, वह ‘बिग बी’ संग्राम जिसमें वे एक के बाद एक फिल्मों में वैरायटी रोल्स करते हुए, कामयाबी की बुलंदी छूते चले गए। सच कहूं तो इस नए अमिताभ ब्रांड के पास, बदलते समय की कई सफलतम खान और कुमार से भी ज्यादा फिल्में आने लगी। उनकी कई फिल्में और उसमें उनके द्वारा की गई भूमिकाओं को एक नजर देखते हुए आपको पता चल जाएगा कि क्यों लगभग पैंतालीस वर्षों से काम करने के बावजूद आज भी उनका जादू चलता है। उनकी चंद फिल्मों की बानगी देखिए, भूतनाथ, भूतनाथ रिटर्न्स, ब्लैक, पा, द लास्ट लीयर (उनकी पहली अंग्रेजी फिल्म)

द ग्रेट गेट्सबी (उनकी अब तक की पहली और एकमात्र हॉलीवुड फिल्म) पीकू, पिंक, साथ ही तीन पत्ती जैसी फिल्म भी जिसमें उन्होंने सर बेन किंग्सले (फिल्म गांधी में जो गांधी बने थे) के साथ काम किया था जिसमें श्रद्धा कपूर ने एक प्रभावहीन डेब्यू किया था।

उसके बाद शुरू हुआ सरकार फ्रेंचाइज, जिसे बनाया था रामगोपाल वर्मा ने। यह वह शख्स है जिसे कभी भारतीय सिनेमा के उद्धारक के रूप में देखा जाता था और जो खुद को ‘द फैक्ट्री’ कहा करते थे। रामगोपाल वर्मा, जिन्हें ‘आर जी वी’ के नाम से भी संबोधित किया जाता था, ने कई छोटी लेकिन अभूतपूर्व फिल्में  जैसे-सत्य और कंपनी बनाकर धमाल मचाया था, साथ ही कई ऐसी फिल्में भी बनाई थी जो धराशाही हो गई। लेकिन उनमें कुछ तो ऐसी बात थी जो अमिताभ और उनके परिवार को पसंद आती थी। आरजीवी ने अमिताभ और अभिषेक के साथ सरकार तथा सरकार-2 फिल्में बनाई। यह फिल्में अपने आप में क्लास फिल्में मानी जाती है क्योंकि इसमें अमिताभ बच्चन ने सीनियर डॉन सुभाष आंग्रे के रूप में अपनी सशक्त उपस्थिति स्थापित की थी। यह 12 वर्ष पहले की बात है। इसी दौरान अमिताभ अपनी प्रत्येक फिल्म के साथ एक शक्तिशाली, सीजेंड एक्टर के रूप में उभरते रहे जब कि आरजीवी अपनी प्रत्येक बेकार या प्रभावहीन फिल्मों के साथ गिरते लड़खड़ाते रहे। फिर भी अमिताभ ने आरजीवी के प्रति अपना विश्वास को जीवित रखा और जब फिर से आरजीवी उनके पास इस फिल्म के फ्रेंचाइज जारी रखने के आइडिया के साथ मिले तो ना सिर्फ अमिताभ मान गए बल्कि उन्होंने उस फिल्म को टॉप प्रायोरिटी दिया और चंद महीनों में ही सरकार थ्री की शूटिंग पूरी कर ली, हालांकि इसमें अमित साध, मनोज बाजपाई, यामी गौतम, जैकी श्रॉफ जैसे बेहद व्यस्त साथी कलाकार थे। इस फिल्म ‘सरकार थ्री’ में फिर से सुभाष आंग्रे का किरदार अमिताभ ने बखूब निभाया, जो किरदार वक्त के साथ भले ही थोड़े बूढ़े और शांत हो गए हो लेकिन जिनके सीने में अभी भी अपने बेटे शंकर, ( ‘सरकार’ तथा ‘सरकार टू’ में अभिषेक ने उनके बेटे शंकर का रोल निभाया था) को खत्म करने वालों के प्रति बदले की ज्वाला धधक रही थी। पिछली ‘सरकार’ तथा ‘सरकार टू’ में के.के मेनन ने भी अभूतपूर्व काम किया था लेकिन इस बार उनकी कमी लोगों को बहुत खली। खैर, दर्शकों को यह भी समझ में नहीं आया कि आरजीवी ने क्या सोचकर जैकी को एक विलेन के रूप में पेश किया जो सुभाष आंग्रे के खून का प्यासा होता है। सभी एक्टर्स ने बेहतरीन काम किया, लेकिन सबसे ज्यादा कमाल किया चौहत्तर वर्षीय अमिताभ ने जिन्होंने यह साबित कर दिया कि वे आज के जमाने के किसी भी एक्टर को चुनौती दे सकते हैं और उनके सारे जलवे फीके कर सकते हैं। मैं कभी आलोचक नहीं रहा और ना ही आज के मीडिया माहौल में क्रिटिक बनना चाहता हूं लेकिन, भले ही मुझे अमिताभ की इतनी ज्यादा तारीफ करने के लिए लोग कुछ भी कहे,  फिर भी पिछले 44 वर्षों से उनके अभिनय को देखते रहने के कारण मैं यह कहना चाहूंगा कि ‘सरकार 3’ में उनका यह परफॉर्मेंस एक और अभूतपूर्व मिसाल है। वैसे भी वे हर फिल्म में अपना बेस्ट परफॉर्मेंस देने के मौके को कभी नहीं चूकते। मैंने कई बेहद जहीन, हाइली क्वालिफाइड, मुझसे आधी उम्र के आलोचकों द्वारा लिखी रिव्यूज पढ़ी है, लेकिन वे लोग भी अमिताभ के परफोर्मेंस में कोई त्रुटि नहीं निकाल पाए। जो रोल अमिताभ ने निभाया है , वह उनके जमाने का कोई भी एक्टर शायद निभाने में हिचकिचाए या शायद इंकार ही कर दे।

अब फिर से एक बार अपनी योग्यता का लोहा मनवाने के पश्चात, यहां से अमिताभ आगे क्या करेंगे?? उनके जैसे एक्टर के बारे में यह कयास लगाना बहुत कठिन है। फिलहाल जो एक फिल्म की खूब चर्चा हो रही है (जिसकी शूटिंग अभी शुरू नहीं हुई है) वह है ‘हिंदुस्तान का ठग’। आज से 20 वर्ष पहले अमिताभ और आमिर को लेकर कोई फिल्म बनने वाली थी जो नहीं बन पाई, लेकिन इस बार यकीनन ऐसा होकर रहेगा। अपने अपने समय के दो दिग्गज कलाकार जब एक फिल्म में साथ काम करेंगे तो वह फिल्म कितनी दिलचस्प बन पड़ेगी उसे देखने के इंतजार में सब बेसब्र है। बताया जा रहा है कि अमिताभ, एक फिल्म ऋषि कपूर के साथ भी कर रहे हैं। दोनों ने अपने पीक पीरियड में कई फिल्में साथ की थी।  अक्सर जब फिल्म इंडस्ट्री के कई अन्य बड़े फिल्ममेकर, अपनी अगली फिल्म में अमिताभ को लेकर फिल्म बनाने का दावा करते हैं तो यह सोच उभरती है कि कब तक और कितने वर्षों तक यह अद्भुत शख्सियत के मालिक, अपना भव्य व्यक्तित्व और हुनर का जादू कायम रखेंगे। आज भी, दूर-दूर तक कोई इस खिलाड़ी को मात नहीं दे पा रहे हैं क्योंकि वे इस खेल के महारथी हैं। फिल्मों में इनका जबरदस्त डिमांड तो है ही, साथ ही छोटे बड़े परदे के तमाम प्रोडक्ट्स के लिए वे एक बेहतरीन, पसंदीदा, बिकाऊ चेहरा, नाम और आवाज है। वे पोलियो, टीबी, अस्थमा, हेपेटाइटिस जैसे गम्भीर रोगों को दूर करने वाली, लोकहित से जुड़ी, जनजागरण मुहिम की फिल्में करते रहते हैं। इसके अलावा उन्हें न जाने कितने उत्सव, इवेंट्स में मुख्य अतिथि के रुप में निमंत्रण स्वीकार करना पड़ता है और किसी को दुखी किये बिना यह तय करने का कठिन काम भी करना पड़ता है कि किस निमंत्रण पर उपस्थित हो और किस में नहीं। जिसने भी अमिताभ को ‘स्टार ऑफ द मिलेनियम’ नाम से सुशोभित किया है, उसे अब दोबारा बैठकर, फिर से इस महान हस्ती की नई नई उपलब्धियों को ध्यान में रखते हुए, एक नई उपाधि ढूंढ निकालनी पड़ेगी, क्योंकि यह हस्ती कालजई है। हजारों वर्षों में एक बार ही पैदा होते हैं।


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Mayapuri

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