ज़िंदगी एक बार फिर मिलना, इस दफा तुझ को प्यार कर न सके – योगेश

1 min


ना जाने क्यों, होता है यूँ ज़िंदगी के साथ, अचानक ये मन, किसी के जाने के बाद, करे फिर उसकी याद.., छोटी छोटी सी बात..। 

बी आर चोपड़ा निर्मित ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म ‘एक छोटी सी बात’ का ये गीत आपको किसी दूसरी दुनिया में पहुंचाने का माद्दा रखता है। जबकि इस गीत को आप ध्यान से पढ़ें तो न इसमें कोई क्लिष्ट हिन्दी या खालिस उर्दू शब्द हैं जो उन दिनों के गीतों में बहुत प्रचलित थे; न ही कोई फन्नेखां वाली बात है। लेकिन, द ग्रेट लिरिसिस्ट शैलेन्द्र की राह पर चलने वाले गीतकार योगेश भी अपने गीतों को बहुत सरल, सुगम और महत्वपूर्ण रखने का हुनर जानते थे।

नए दौर में गीतकार योगेश का नाम भले ही बॉलीवुड इतिहास के पन्नों में धुंधला हो गया हो लेकिन सिम्पल लिविंग-लाइफ सी फिल्में बनाने वाले बासु चटर्जी और ऋषिकेश मुखजी की फिल्मों के शौकीन दर्शक और संगीत प्रेमी ‘योगेश’ के गीतों को कभी नहीं भूल सकते।

पर जिनका नाम आज इतना धुंधला है, वो क्या तब बहुत मशहूर हुआ करते थे? जवाब है नहीं!

योगेश का नाम योगेश गौड़ था, जो लखनऊ में पले बढ़े थे। बंबई नगरीया की चकाचौंध से हज़ारों किलोमीटर दूर एक पीडब्लूडी अफ़सर के घर में उनका जन्म हुआ। उनके इतर उनकी दो बहनें और थीं। उनके पिता को सरकारी बंगला तो मिला था, लेकिन योगेश जी की नज़रों में उनके बाकी दोस्तों जैसी ठाट बाट उनकी नहीं थी। कारण उनके पिताजी का बहुत ज़्यादा ईमानदार होना था। वो न एक रुपए रिश्वत न लेते थे और न ही लेने वालों से कोई ताल्लुक रखना पसंद करते थे।

ऐसे ईमानदार बाप की एक रोज़ अचानक मृत्यु हो गयी।

उनके पिताजी हर मुरादी की मदद करने में विश्वास रखते थे, उन्होंने 95 रुपए मात्र की पेंशन में तीन-तीन परिवार पाले थे, लेकिन जब उनकी मृत्यु हुई तो उनकी बॉडी पड़ी देख रिश्तेदारों ने योगेश से पूछा “भई इनका क्रियाकर्म करने के लिए धन-रुपया तो है न? वर्ना चिता को अग्नि कहाँ से देंगे?”

योगेश के मन में ये बात बहुत भीतर तक लग गयी। पिताजी के जाने के बाद जब आर्थिक संकट गहराने लगा तो आधा बंगला किराए पर उठा दिया और नौकरी की तलाश में निकल पड़े। शॉर्ट हैंड भी सीख ली, नौकरी फिर भी न मिली।

तब उनके एक लंगोटिया यार सतेंद्र उर्फ सत्तू ने सजेस्ट किया कि चल यार, बम्बई चलते हैं। योगेश की बुआ के लड़के भी वहीं थे, उन्हें लगा चलो इन्हीं से शायद कुछ मदद मिल जाए, सो मीलों लम्बा सफ़र तय करके मुम्बई चल दिए। ज्ञात हो कि वो दौर कुछ ऐसा था जहाँ काम या तो मुम्बई में मिलता था या दिल्ली में, सो दिल्ली दूर समझ, योगेश और सत्तू मुम्बई की ओर चल दिए।

मुम्बई पहुँच दोनों उन बुआ के लड़के और रिश्ते के भाई (?) के द्वार पहुँचे तो उन्होंने ऐसे देखा जैसे वो दोनों पड़ोस के मोहल्ले से आए हों। न उनके आने की कोई ख़ुशी दिखाई न ही कोई हैरानी। बुआ के लड़के जानते थे कि योगेश के पिताजी नहीं रहे, फिर भी उन्होंने नौकर दिलवाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। हालांकि वो ख़ुद फिल्म इंडस्ट्री में सक्रिय थे, कई फिल्मों में उनका योगदान था मगर कई चक्कर लगवाने के बाद भी योगेश के हाथ कुछ न लगा।

इस व्यहवार पर उनके मित्र सत्तू को बहुत आपत्ति हुई, उन्होंने यूँ ही कह दिया “यार ये क्या समझते हैं खुद को, योगेश सुनों, तुम फिल्म इंडस्ट्री में काम करोगे, क्या करोगे मुझे नहीं पता लेकिन करोगे… न न, रोटी पानी की दिक्कत के बारे में मत सोचना, वो मैं मैनेज कर लूंगा.. पर तुम कुछ करोगे”

इस दौरान योगेश अपनी सारी उदासी कागज़ पर निकालने लगे। और करते भी क्या, स्वभाव से सरल, ज़्यादा किसी न बोलने वाले योगेश एक झोपड़ी नुमा घर में रहने लगे और स्टूडियो-स्टूडियो चक्कर काटने लगे।

मज़े की बात देखिए, उन्हें तबतक ये नहीं पता था कि क्या काम करना है, बस जो मिला, जैसा मिला करते चले गए और चक्कर लगाते चले गए।

तब उन लोगों ने झोपड़ी से निकल चाल में रहना शुरु किया और उनकी मुलाकात गुलशन बांवरा से हुई। गुलशन तब काफ़ी गाने लिखते थे पर रहते वहीं थे। तो उनसे ऐसा याराना हुआ कि आए दिन इधर-उधर घूमना, खाना, पिकनिक मनाना होने लगा।

गुलशन जी बहुत दुबले पतले आदमी थे, उनका सारा वज़न उनके गीतों में निकलता था। उन्हें देख योगेश को भी कॉन्फिडेंस आया कि यार, मैं भी तो लिख सकता हूँ। उन्हीं दिनों जब सब लोग पिकनिक जाते और शायरी, कविताओं की महफ़िल जमती तो उसमें योगेश कुछ अपना भी सुना देते थे। जब सब लोग हैरान होकर पूछते कि अरे, ये तो पहले नहीं सुना, बहुत अच्छा गीत है, किसने लिखा? तो योगेश मुस्कुराते हुए चुप हो जाते थे पर बताते किसी को नहीं थे।

एक रोज़ सतेंद्र ने पूछ लिया कि ये तुमने लिखा है क्या, तो योगेश ने भी नहीं छुपाया। अब इंडस्ट्री में काम की नए सिरे से तलाश शुरु हुई। लेकिन यहाँ योगेश ने म्यूजिक डायरेक्टर्स के ऑफिस में एक कागज़ पर अपना नाम लिखकर चिट आगे पहुँचानी शुरु कर दी। कई चक्करों और ‘कल आना’ सरीखी बातें सुनने के बाद रॉबिन बनर्जी नामक एक संगीतकार ने उन्हें बुलाया। उनके स्टॉक से कुछ कविताएं सुनी और उनकी तारीफ भी की। लेकिन फिर?

फिर कुछ नहीं, एक साल तक योगेश चक्कर लगाते रहे, उनसे मिलते रहे। उन्होंने उन सारी कविताओं को किनारे कर एक धुन सुनाई और कहा इसपर लिखो।

उन्होंने पूछ भी लिया कि ये आप बजाते रहते हैं, लेकिन मेरे गीतों को कॉम्पोज़ क्यों नहीं करते, तो रॉबिन मुस्कुराए और बोले “तुम समझे नहीं, जो तुमने लिखा वो ठीक, लेकिन अब मैं जो धुन दूंगा तुम उसपर लिखोगे”

यहाँ योगेश को पहली बार पता चला कि गाने बनी बनाई धुन पर लिखे जाते हैं।

लेकिन फिर भी कोई काम न बना। मगर साल भर बाद, रॉबिन ने उन्हें बताया कि एक फिल्म बन रही है, उसमें 6 गाने हैं, लेकिन फिल्म मुझे हल्की लग रही है, बोलो करें न करें? योगेश को समझ न आया कि उनसे क्यों पूछा जा रहा है, उन्होंने सौम्यता से कहा “जैसा आपको ठीक लगे, कर लीजिए”

अब गाने लिखने की बात आई तो प्रोड्यूसर ने मेहनताने के नाम पर 25 रुपए प्रति गाने का ऑफर दिया। योगेश की तो बांछें खिल गयीं। लेकिन अपने स्वभाव के चलते वो कुछ बोले नहीं तो प्रोड्यूसर ने टोक दिया, अरे ये मत सोचो कि कम है, हमने आनंद बक्शी साहब से 15-15 रुपए में गाने लिखवाए हैं। योगेश हड़बड़ा गए, बोले नहीं नहीं ठीक हैं।

उन दो दिनों की रिकॉर्डिंग के बाद उन्हें 150 रुपए मिले। उनके मित्र सत्तू पढ़े लिखे होकर भी कभी प्यून, कभी लेबर बनकर घर चला रहे थे; योगेश ने उस दिन उनकी छुट्टी कराई और कहा चलो, आज हम तुम बम्बई घूमेंगे और ख़ूब खायेंगे, मज़े करेंगे।

अब वो गाने भला सुने कहाँ जाते? तो उन दिनों रेडियो और 8 से 9 के वक़्त वही गाने आते थे जो लोगों को सबसे ज़्यादा पसंद आएं। सो योगेश के दो गाने उस दौरान रेगुलर सुनाए जाने लगे। जिनमें एक था – तुम जो आओ तो प्यार आ जाए, ज़िंदगी में बहार आ जाए। मन्ना डे की आवाज़ में, फिल्म सखी रॉबिन का ये गाना सुपरहिट हो गया पर फिल्म न चल सकी।

इस फिल्म के गाने इतने चले कि रॉबिन बनर्जी को एक के बाद एक नौ फिल्में मिली और योगेश के पास काम की कमी न रही। उस दौरान गाने हिट होने पर या तो गायक की वाह-वाह होती थी या संगीतकार की, गीतकार कौन है, ये बहुत कम लोग जानना चाहते थे, बहुत ही कम जान पाते थे। बहुत बड़ी संख्या में तो लोग यही समझते थे कि स्क्रीन पर जो हीरो गाने पर परफॉर्म कर रहा है, वही गायक भी है।

इस तरह योगेश की गाड़ी तो चल निकली, लेकिन रॉबिन बनर्जी ज़्यादा दूर न चल सके। बी-ग्रेड सी-ग्रेड फिल्में करने लग गए।

इसी बीच अंधेरी स्टेशन पर योगेश की नज़र अंजान पर पड़ी। वही अंजान जो अपने नाम की तरह ही अंजान थे, जिनके पिता ने उन्हें घर से निकाल दिया था। 1964 में गोदान नामक एक फिल्म आने वाली थी। उस फिल्म में अंजान के लिखे गीत थे। संगीत रवि शंकर का था और राज कुमार सरीखी कास्ट से फिल्म सजी थी। योगेश को उम्मीद थी कि फिल्म और फिल्म के गाने बहुत चलेंगे। लेकिन फिल्म फ्लॉप हो गई। अंजान को भी किसी ने पूछने से मना कर दिया। उसी अंधेरी स्टेशन पर अंजान के कंधे पर योगेश ने हाथ रख दिया और जहां-जहां खुद गए, उन्हें भी अपने साथ काम दिलवाते गए।

योगेश फिर जी-एस कोहली, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल आदि के साथ भी काम करने लगे।

जी-एस कोहली को योगेश ने ही एक फिल्म एडवेंचर ऑफ रॉबिन दिलवाई थी, लेकिन कोहली साहब ने उन्हें बस एक गाना लिखने का मौका दिया।

माना मेरे हसीन सनम तू रश्क ए माहताब है, पर तू है लाजवाब तो मेरा कहाँ जवाब है। मजे की बात, मुहम्मद रफ़ी का ये गाना ही सिर्फ हिट हुआ, पर योगेश अब भी नज़र में न आये।

सत्तर का दशक आते-आते योगेश ने इतने गाने ज़ुल्फ़ों पर, अदाओं पर, लिख लिए कि वो उकता गए। बोले ये सब लिखते-लिखते तंग आ गया हूँ। वो उन दिनों शैलेन्द्र, मजरूह सुल्तानपुरी, शकील बदायूंनी, हसरत जयपुरी के गाने सुन रहे थे और उसकी तुलना में लिख रहे थे बिल्कुल हल्के गाने। हालांकि गाने पसंद किए जाते थे, महनताने में 100 रुपए प्रति गाना मिलता था। फिर भी संतुष्टि नहीं थी।

उन दिनों एचएमवी के एल-पी डिस्क हर म्यूजिक डायरेक्टर और लीरिसिस्ट को मिलते थे। लेकिन योगेश के पास सुनने के लिए ग्रामोफोन तो था नहीं, इसलिए वो और सत्तू मिसेज चौधरी के घर सुनने के लिए जाते थे। मिसजे चौधरी कौन? भई मशहूर म्यूजिक डायरेक्टर सलिल चौधरी की धर्मपत्नी। अब उनके यहाँ जाते थे तो कभी-कभी अर्ज़ी भी लगा देते थे कि ‘दीदी, कभी सलिल दादा से भी मिलवा दीजिए’

कई बार कहने के बाद उन्होंने सलिल दा से मिलवा तो दिया लेकिन सलिल दा ने कोई खास भाव नहीं दिया। बल्कि उनके अससिस्टेंट ने उनकी पत्नी को कह भी दिया कि अरे क्या सी ग्रैड फिल्मों में लिखने वाले को यहाँ ले आईं।

अब दुर्भाग्य से शैलेन्द्र साहब की मृत्यु हो गई और सलिल दा के पास कोई राइटर न बचा। तो उन्होंने मन मसोसकर कहा – बुलाओ अपने राइटर को, क्या नाम है उसका?

तब योगेश जी को बुलाया गया। सलिल दा ने कहा देखो योगेश, मैं बाज़ार जा रहा हूँ, अभी आधे घंटे में आऊँगा, मुझे तबतक इस धुन पर कोई गाना सोचकर दो। योगेश ने सिर हिलाया और बोले ठीक है। लेकिन दुर्भाग्य देखिए, सलिल दा के निकलते ही वो भूल गए कि धुन क्या थी। उन्होंने सोचा कि असिस्टन्ट से पूछ लें, लेकिन असिस्टेंट से और इन्सल्ट कर दी कि ये तुम्हारा मतलब का काम नहीं है, यहाँ शैलेन्द्र, गुलज़ार सरीखे बड़े-बड़े राइटर यहाँ लिखते हैं, तुम्हारे लिए नहीं है। शर्म से लाल हुए योगेश कुछ बहाना बनाकर भाग आए कि कहीं और बेइज्ज़ती न हो जाए।

अब वो स्टूडियो से कुछ दूर, बस स्टॉप पर खड़े सोच रहे थे कि यार योगेश अगर आज भाग गया, तो कभी कहीं सामने न आ सकेगा। सोचा कुछ नहीं तो दादा से ही पूछ लूँगा कि दोबारा धुन सुना दो, डांटेगे तो कोई बात नहीं, कम से कम भगोड़ा तो न कहेंगे। ठीक उसी वक़्त एक बस आई और बस के साथ-साथ ही ट्यून दिमाग में लौट आई। वो तुरंत घर की तरफ चल दिए, रास्ते में ही जाने कैसे उन्हें कुछ शब्द भी सूझ गए।

उन्होंने डरते-डरते वो बोल सलिल दा को सुना दिए, गाना खत्म होते ही सलिल दा चिल्ला पड़े। अपनी पत्नी को बुलाया। योगेश को लगा अब ये मुझे डांट के भगाएंगे, लेकिन सलिल दादा खुशी से चिल्लाए, अरे सुनों कितना अच्छा लिखा है जोगेश ने। खुशकिस्मती से वो गाना रिकार्ड तो हुआ पर बदकिस्मती से फिल्म न बनी तो डब्बे में चला गया।

लेकिन योगेश और सलिल चौधरी के बीच जो औपचारिक दूरी थी, वो खत्म हो गई और अब दोनों एक दूसरे के साथ ज़रा खुल कर बात करने लगे।

जब मन की बात खुली तो योगेश ने बताया कि वो चाहते हैं लता जी उनका कोई गाना गाएं। फिर क्या था, सलिल दा ने एक फिल्म बताई जिसमें एक ही गाना बाकी था जो लता मंगेशकर गाने वाली थीं, वो गाना बंगाली में पहले से बन चुका था, अब हिन्दी में बनाना था। योगेश ने वो गाना एल-पी पर सुना और उसपर लिखा।

फिर जब लता जी ने ये गाना सुना तो छूटते ही कहा, सलिल दा, ये गाना शैलेन्द्र जी ने मरने से पहले लिखा था क्या?

सलिल दा मुस्कुराये और बोले, नहीं लता, ये गाना नए लड़के योगेश ने लिखा है। तब उन्होंने योगेश से मिलने की इच्छा ज़ाहिर की। लता जी जब मिलीं तो उन्होंने तारीफ भी की और कहा कि आइंदा कोई भी गाना लिखना हो तो योगेश को दिया जाए। गाना कुछ यूँ था –

कोई पिया से कहो अभी जाए ना, जाए ना,
दीवाने सैयां को समझा के मैं हारी, किसको पता सावन घटा फिर छाए न छाए न।

इस गाने के फ़ोनेटिक्स बहुत मुश्किल थे। अब फिर मुसीबत ये हुई कि वो फिल्म रिलीज ही नहीं हुई।

लेकिन अब उनकी ज़िंदगी में एक ऐसा शख्स आया जिसकी बदौलत योगेश का नाम योगेश बन सका। ये खास और इन्टरिस्टिंग किस्सा है।

बासु चटर्जी किसी डॉक्यूमेंटरी की तैयारी कर रहे थे तो उन्होंने सलिल चौधरी को कहा कि गुलज़ार से बात करके तीन गाने लिखवा लो। सलिल दा ने टोका भी कि ‘ये जोगेश है, अच्छा लिखता है, इससे लिखवाते हैं न’

लेकिन बासु दा ने मना कर दिया, अरे वो ऐसा आसान काम नहीं है, तुम गुलज़ार से बात करो। अब गुलज़ार बिज़ी भी थे और सलिल दा चाहते भी यही थे कि योगेश से लिखवाया जाए।

अब तीन गाने लिखे गए, तीनों मुकेश जी की आवाज़ में रिकार्ड किए। फिल्म डांवाडोल होने लगी और योगेश इंडस्ट्री से उकताकर कुछ पैसा जमा करके वापस लखनऊ चले गए। उन्हें फिर वहाँ एक तार मिला, उन्होंने तय कर लिया था कि अब ये सब नहीं लिखेंगे। यहीं लखनऊ में कुछ काम धंधा कर लेंगे। पर किस्मत को कुछ और मंज़ूर था।

बासु चटर्जी की फिल्म बंद हो गई। लेकिन वो तीनों गाने एक बड़े प्रोड्यूसर लक्ष्मण ने खरीद लिए। अब उन गानों को ऋषिकेश मुखर्जी ने भी सुना और अड़ गए कि इनमें से दो गाने मेरी फिल्म की सिचूऐशन पर सूट करेंगे, मुझे दे दो।

लक्ष्मण दा ने दो तो नहीं, पर एक गाना दे दिया। और उस गाने ने, उस इकलौते गाने ने 10 साल से स्ट्रगल करते, गुमनामी में जीते योगेश को भारत भर में पहचान दे दी। ऋषि दा ने वो गाना फिल्म आनंद के लिए लिया था और वो गाना था –

कहीं दूर जब दिन ढल जाए, साँझ की दुल्हन, बदन चुराए, चुपके से आए।
मेरे खयालों के आँगन में, कोई सपनों के, दीप जलाए। दीप जलाए।

योगेश ने बताया कि उनका थोड़ा बहुत नाम भी इसलिए हो गया था क्योंकि उनको गाने भी ऐसे मिले जो उनकी ज़िंदगी से तालुक रखते थे। उन्होंने इसी गीत को याद करते हुए बताया कि “मेरे दोस्त सत्तू के लिए ही मैंने ये पंक्ति लिखी थी कि – कभी तो दिल कहीं, मिल नहीं पाते, कहीं पे निकल आएं, जन्मों के नाते’, इस तरह के सिम्पल सोबर से गीत लिखते हुए उन दिनों योगेश, कवि नीरज, अंजान आदि ने गीतकार शैलेन्द्र की सौम्यता को उनके जाने के बाद भी जीवित रखा।

फिल्म आनंद का ही ब्लॉकबस्टर गाना – ज़िंदगी, कैसी ये पहेली हाए, कभी तो हँसाए, कभी ये रुलाये’ मन्ना डे की आवाज़ में हम सबको याद है, पर लिखा गुलज़ार ने नहीं योगेश ने है, ये बहुत कम लोग जानते हैं।

इसके बाद उन्होंने बासु चटर्जी और ऋषिकेश मुखर्जी के साथ कई गाने किए। फिल्म मिली से ‘आए तुम याद मुझे, गाने लगी हर धड़कन, या बड़ी सूनी-सूनी है, ज़िंदगी, मैंने कहा फूलों से, हंसों तो वो खिलखिलाकर हंस दिए’ भी इनमें शामिल हैं।

फिर बासु चटर्जी की ही फिल्म एक छोटी सी बात के सारे गाने योगेश ने ही लिखे। जिसमें ‘न जाने क्यों, होता हैं यूं ज़िंदगी के साथ, अचानक ये मन, किसी के जाने के बाद, करे फिर उसकी याद छोटी-छोटी सी बात, न जाने क्यों’ रेडियो पर सालों बजता रहा। बहुत हिट हुआ।

फिल्म अन्नदाता के गाने भी उन्होंने ही लिखे, जो जया बच्चन की पहली फिल्म थी।

इन्हीं के एक गाने के लिए गायक मुकेश ने नैशनल अवॉर्ड भी जीता, वो गीत था – कई बार यूं ही देखा है, वो जो मन की सीमा रेखा है, दिल तोड़ने लगता है.., ये गीत फिल्म रजनीगंधा से था जो फिल्म क्रिटिकली बहुत पसंद की गई थी। फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिला था।

लेकिन योगेश को पूरे करियर में कोई अवॉर्ड नहीं मिला। उनके गानों को बाद में सिर्फ इसलिए नहीं बजाया गया कि उनके संगीतकार या म्यूजिक लेबल की तरफ से पैसा नहीं पहुँचता था। उन्होंने ‘जानेमन-जानेमन तेरे दो नयन, चोरी-चोरी ले के गए देखो मेरा मन, जानेमन जानेमन हाँ जानेमन’ लिखा, जो कई महीनों तक चार्टबस्टर से उतरा ही नहीं। फिर भी उन्हें बहुत कम जगह इन्टरव्यू के लिए इन्वाइट किया गया।

उनके नाम को भी एलपी के पीछे लिखा जाता था, जबकि बाकी गीतकार का नाम संगीतकार के साथ लिखा होता था। लेकिन सीधे-साढ़े शरीफ से योगेश ने न कभी पूछा कि ऐसा क्यों है, न ही उन्होंने कभी इस बात की परवाह की।

हाँ, एक रोज़ मजरूह सुल्तानपुरी उन्हें मिले और बोले – “वाह योगेश, क्या लिखते हो तुम तुम्हें तो शायर योगेश कहना चाहिए।” उन्होंने एक गाना ऐसा लिखा था कि ‘सौ बार बनाकर मालिक ने, सौ बार मिटाया होगा, ये हुस्न मुजस्सिम तब तेरा, इस रंग पे आया होगा।’

मजरूह साहब ने इस गाने को खूबसूरती पर तबतक का बेस्ट सॉन्ग बताया था।

इसी गाने पर सिमी गिरेवाल ने परफॉर्म किया था, जब उन्हें पता चला कि ये गाना लिखा किसने है तो कहा मुझे उस शायर से मिलना है।

कुछ इस तरह का गुमनामी में नाम ढूंढते योगेश ने अपनों से बहुत धोखे खाए और गैरों ने उन्हें अपनों से भी ज़्यादा मुहब्बत दी। लेकिन अपनी आखिरी सांस तक उन्होंने काम करना बंद नहीं किया। पिछले साल 29 मई को योगेश ने अंतिम सांस ली और अपने गीत की शाम की तरह ही ढल गए।

ज़िंदगी एक बार फिर मिलना,
इस दफा तुझ को प्यार कर न सके,
तेरा दामन खुशी से भर न सके,
तुझको कह भी सके न हम अपना,
ज़िंदगी एक बार फिर मिलना..

हमने तुझसे किया था ये वादा,
तेरा हाथ पर चाँद रख देंगे,
तुझको देकर खुशी देकर जमाने की,
तेरी वफ़ा पारख लेंगे,
वक़्त ने वक़्त न दिया इतना,
ज़िंदगी एक बार फिर मिलना। – योगेश

आज उनके जन्मदिन पर उन्हें याद करते हुए, मायापुरी ग्रुप उन्हें श्रद्धाजलि देता है।

सिद्धार्थ अरोड़ा सहर


Like it? Share with your friends!

अपने दोस्तों के साथ शेयर कीजिये