विश्वजीत

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हैप्पी बर्थडे विश्वजीत

“किंग ऑफ़ रोमांस” के नाम से जाने जाने वाले बंगाली और हिन्दी फ़िल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता विश्वजीत का जन्म 14 दिसम्बर, सन 1936 में कलकत्ता पश्चिम बंगाल में हुआ था। उनके बाल्यकाल का अधिकांश समय कोलकाता में बीता। वे कोलकाता में ही पले और बढ़े।अपने स्वाभाविक अभिनय और आकर्षक व्यक्तित्व के लिए प्रसिद्ध विश्वजीत देव चटर्जी ने बंगाली और हिन्दी फ़िल्मों के दर्शकों के दिलों में वर्षों तक राज किया है।

विश्वजीत के अभिनय सफर की शुरुआत बंगाली फ़िल्मों से हुई। ‘माया मृग’ और ‘दुई भाई’ जैसी सफल बंगाली फ़िल्मों में अभिनय के बाद विश्वजीत ने हिन्दी फ़िल्मों का रूख किया। वे कोलकाता से मुंबई आ गए। हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री ने बंगाली फ़िल्मों के इस सफल अभिनेता को सिर-आंखों पर बिठाया। परिणामस्वरूप बेहद कम वक्त में ही विश्वजीत की झोली हिन्दी फ़िल्मों से भर गयी। 1962 में विश्वजीत की पहली हिन्दी फ़िल्म ‘बीस साल बाद’ प्रदर्शित हुई, जिसने बॉक्स ऑफिस पर सफलता के नए कीर्तिमान बनाए। देखते-ही-देखते विश्वजीत हिन्दी फ़िल्मों के तेजी से उभरते हुए अभिनेता बन गए। विश्वजीत के चाहने वालों ने उन्हें “किंग ऑफ रोमांस” की उपाधि दी। उन पर फ़िल्माए गए गीतों की लोकप्रियता ने उनके फ़िल्मी कॅरिअर में चार-चांद लगा दिए और उन्हें प्रसिद्धि की ऊँचाइयों पर बैठा दिया। फ़िल्म निर्माता-निर्देशकों ने उन पर विश्वास करना शुरू कर दिया। ‘बीस साल बाद’ की सफलता के बाद विश्वजीत ने कई यादगार फ़िल्मों में नायक की भूमिकाएं निभायीं, जिनमें ‘मेरे सनम’, ‘शहनाई’, ‘अप्रैल फूल’, ‘दो कलियां ‘और ‘शरारत’ उल्लेखनीय हैं। विश्वजीत को उस समय की लगभग सभी हीरोइनों के साथ अभिनय का अवसर मिला। विशेषकर आशा पारेख, मुमताज, माला सिन्हा और राजश्री के साथ उनकी रोमांटिक जोड़ी बेहद पसंद की गई। हिन्दी फ़िल्मों में मिली सफलता के बाद भी विश्वजीत ने बंगाली फ़िल्मों में अभिनय करना नहीं छोड़ा। वे कोलकाता आते-जाते रहे और चुनींदा बंगाली फ़िल्मों में अभिनय करते रहे, जिनमें सुपरहिट फ़िल्म ‘चौरंगी’ उल्लेखनीय है।

अभिनय के अनुभव के बाद विश्वजीत ने अपनी रचनात्मकता का रूख फ़िल्म निर्देशन की तरफ भी किया। वर्ष 1975 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘कहते हैं मुझको राजा’ के निर्माण और निर्देशन दोनों की जिम्मेदारी विश्वजीत ने संभाली। धर्मेंद्र, हेमा मालिनी, शत्रुघ्न सिन्हा और रेखा अभिनीत इस फ़िल्म ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छा बिजनेस किया। स्वयं को सक्षम निर्देशक साबित करने के बाद विश्वजीत ने एक बार फिर अभिनय का रूख कर लिया। वे हिन्दी फ़िल्मों में छोटी-छोटी भूमिकाएं निभाते रहे। विश्वजीत की कुछ खास फिल्मे हैं :-1.(1962 )बीस साल बाद ,(1962 )सॉरी मैडम,(1963 )बिन बादल बरसात-प्रभात,(1964 )शहनाई,(1964 )कोहरा,(1964 )कैसे कहूं,(1964 )अप्रैल फूल,(1965 )मेरे सनम,(1965)दो दिल,(1966 )ये रात फिर ना आएगी,(1966 )सगाई,(1966 )बीवी और मकान, (1966)आसरा, (1967)नाइट इन लंदन,(1967 )नई रोशनी,(1967 )जाल,(1967 )हरे कांच की चूडि़यां, (1967 ) घर का चिराग,(1968)वासना, (1968 ) किस्मत, (1968 )कहीं दिन कहीं रात, (1968 )दो कलियां, (1969 ) तमन्ना,(1969 )राहगीर,(१९६९)प्यार का सपना,(1970 )परदेसी,(1970 )इश्क पर जोर नहीं,(1970 )मैं सुंदर हूं,(1972 )शरारत,(1973 )श्रीमान पृथ्वीराज और भी कई फिल्मे हैं 2002 में आई इनकी फिल्म ‘ईट का जवाब पत्थर’ इनकी आखरी फिल्म थी।

अगर हम विश्वजीत का निजी जीवन देखें तो पाएंगे की उन्होंने अपने जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे शायद  उनकी दो विवाह कारण । पहली पत्नी रत्ना चटर्जी से अलग होकर उन्होंने दूसरी शादी रचायी। जब विश्वजीत ने दूसरी शादी रचायी थी, तब उनके पुत्र प्रसेनजीत और पुत्री पल्लवी चटर्जी की उम्र बेहद कम थी। यह भी उल्लेखनीय है कि पिता से मिली अभिनय की विरासत को प्रसेनजीत आगे ले जा रहे हैं। वे पिछले एक दशक से बंगाली फ़िल्मों के सुपरस्टार की कुर्सी पर विराजमान हैं। हालांकि, विश्वजीत की पहली पत्नी रत्ना चटर्जी से अलगाव के बाद उनके अपने पुत्र प्रसेनजीत के साथ संबंध मधुर नहीं रहे। यही कारण रहा कि बंगाली फ़िल्मों के प्रशंसक पिता-पुत्र की इस जोड़ी को एक साथ फ़िल्मी पर्दे पर देखने से वंचित रहे। अब विश्वजीत मुंबई में अपनी दूसरी पत्नी और पुत्री सांभवी के साथ रह रहे हैं।और ये बहुत दुःख के साथ कहना पड़ता है की पिछले एक दशक से विश्वजीत हिन्दी सिनेमा से दूर हैं। आज की फिल्मों में उनके लिए कोई किरदार, कोई भूमिका लेखक निर्देशकों को नजर नहीं आती है। ऎसा सिर्फ विश्वजीत के साथ ही नहीं है बल्कि और भी कई ऎसे सितारे हैं जिन्होंने अपने समय में जहां दर्शकों के दिलों पर राज किया था, आज वे दो वक्त की रोटी का जुगाड कर पाने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं।ये सुच है इस चकाचोंद कर देने वाली नगरी का ।


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Mayapuri

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