बॉलिवुड जहां कहानियों की तस्करी होती है

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मायापुरी अंक 01.1974

यह कितनी अजीब विडम्बना है कि जिन लेखकों का नाम भारतीय फिल्मोद्योग में अत्यन्त आदरपूर्वक लिया जाता है वही कहानियों की तस्करी जैसा अमर्यादित कार्य करके अपने यश को कलंकित तो करते ही है, साथ ही दर्शकों की साहित्यिक-रूचि सम्पन्नता को भी विकृत करते है। कहानी की तस्करी के इस व्यापार का आलम यह है कि आज एक ही विदेशी लोकप्रिय फिल्म अथवा उपन्यास पर अनेकानेक फिल्मों का निर्माण हो रहा है। हमारे फिल्म कथाकार विदेशी हिट फिल्मों अथवा सशक्त उपन्यासों को आधार बना कर मामूली परिवर्तन के साथ कई कहानियां तैयार करते है और फिल्मकारों को बेच कर मोटी रकम बटोर लेते है। फिल्मकरों के सामने तब एक भयंकर स्थिति आ जाती है जब उन्हें यह पता चलता है कि जिस कथानक पर वे फिल्म का निर्माण कर रहे हैं उसी पर अन्य निर्माताओं की भी फिल्म सम्पूर्णता की ओर अग्रसर है। फिल्म के आधी से अधिक तैयार हो जाने के बाद परिवर्तन करना असम्भव हो जाता है। इसका ताजा उदाहरण है निर्माता-निर्देशक और कलाकार फिरोजखान की फिल्म ‘धर्मात्मा’ तथा सोहन लाल कंवर कृत ‘सन्यासी’ जो एक ही विदेशी फिल्म ‘गॉड फादर’ पर आधारित है। मधुसूदन तथा यश चोपड़ा के निर्देशन में क्रमश: ‘एक नारी दो रुप’ तथा ‘जोशीला’ का निर्माण हुआ। इन दोनों फिल्मों का आधार ‘हैडले चेंज’ नामक उपन्यासकार है। निर्देशक मधुसूदन ने फिल्म ‘एक नारी दो रूप’ का स्वयम् को सिर्फ पट कथाकार कह कर अंशत ईमानदारी का परिचय दिया परन्तु हमारे गुलशन नन्दा तो ‘जोशीला’ के सर्वसर्वा बन कर बैठ गए।

यह कहना शायद अनुचित नही होगा कि आज की लोकप्रियता का आधार मात्र तस्करी है। इनके उपन्यासों का यदि गहराई से अध्ययन किया जाए तो यह बात शीशे की तरफ साफ हो जायेगी कि इनके उपन्यास (एक दो को छोड़कर) विदेशी फिल्मों या पुस्तकों का चरबा मात्र है। इनका बहुचर्चित उपन्यास ‘कटी पतंग’ नो मैन ऑफटर ओन’ का चरबा है। नया जमाना’ ज्योतिरमय की कहानी ‘हमराही’ का पोस्टमार्टम है जिस पर आज से लगभग 22 वर्ष पूर्व फिल्म बनी थी। फिल्म ‘दाग’ ‘सनफ्लावर’ नामक उपन्यास की देन है और फिल्म ‘जुगनु’ पर यह आरोप है कि उक्त फिल्म पांच विदेशी फिल्मों का मिश्रण है। इनके इस प्रकार के कृत्यों को देखकर ही इनकी ही फिल्म ‘शर्मीली पर सुप्रसिद्ध कथा लेखिका शिवानी को कहना पड़ा ‘मेरे उपन्यास’ विष कन्या का लेखक गुलशन नंदा द्वारा अपने नाम से किया गया ‘बेशर्म प्रस्तुतीकरण।

आश्यर्च तो तब अधिक होता है जब प्रतिभा सम्पन्न निर्देशक-लेखक गुलजार जैसे शीर्षस्थ लोग भी इस प्रकार के कार्य करते है। इन्होंने जापनी फिल्म ‘हैप्पीनस ऑफ अस एलोन’ पर अपनी फिल्म ‘कोशिश’ बनाई जिसके लिए वे पुरस्कृत हुए। गुलजार भी ‘साउन्ड’ ऑफ म्यूजिक के आधार पर फिल्म ‘परिचय’ का निर्माण कर फिल्मों के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ने का दावा करते है।

धन और लोकप्रियता की लूट-खसोट में लेखक एंव फिल्मकार दोनों कहानियों की तस्करी में संलग्न है। उदाहरण के लिए ‘खून खून’ वार्नर ब्रादर्स की फिल्म ‘डर्टी हेरी’ की नकल है जिस पर मुकदमा भी दायर किया गया। फिल्म ‘विक्टोरिया न.203’ की सफलता के झण्डे गड़ने का श्रेय विदेशी फिल्म ‘देअर इज ए हिप्पी ऑन दी हाइवे’ को जाता है तो ‘मायादर्पण’ फ्रांसीसी फिल्म ‘फेमिनडाक’ की नकल कही जाती है। फिल्म ‘अंदाज’ ‘दो कलियां’ ‘नन्हा शिकारी’ ‘सा-र-गा-मा-पा’ ‘अनुराग’ ‘अभिमान’ ‘गद्दार’ आदि फिल्में क्रमश ‘ए मैन’ ‘ए वू मैन दी’ ‘पैरेंट ट्रैप’ ‘माई मैन’ ‘गाड फ्राई’ ‘आई विटनेस’ ‘सैवन ब्राइज’ ‘दा क्रिस्मस ट्री’ ‘ए स्टार’ ‘इज बोर्न’ ‘सैवन गोल्ड’ मैन आदि विदेशी फिल्मों की नकल मात्र है। शम्मी कपूर की सैक्सी फिल्म ‘मनोरंजन’ के बारे में एक अंग्रेजी के प्रसिद्ध साप्ताहिक ने समीक्षा करते हुए। लिखा था, ‘इट इज ए सीन बाइ सीन कॉपी ऑफ दी शरले मैकलेन जैक लैमेन फिल्म, इरमाला हाउस, इवन दी डॉयलाग इज दी उर्दू ट्रांसलेशन ऑफ दी ऑरिजनल।

आज फिल्मोंउद्योग में भारतीय फिल्म निर्माताओं के लिए सलीम-जावेद जादू की छड़ी बने हुए है जो एक ही कहानी में थोड़ा बहुत परिवर्तन करके निर्माता के हाथ बेचकर जेब गर्म कर रहे है। इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण ‘जंजीर’ फिल्म है जो ‘डैथ रोड्स ए हार्स’ कहानी पर आधारित है। फिल्म को जब अपार सफलता मिली तो सलीम-जावेद ने इसी कहानी में हेर-फेर करके फिल्म ‘यादों की बारात’ के रूप में प्रस्तुत कर दी। इसी प्रकार जब ‘राम और श्याम’ फिल्म बॉक्स ऑफिस पर हिट हुई तो उसके संस्करण से ‘सीता और गीता’ का निर्माण हुआ। वर्षो पूर्व बॉम्बे टॉकीज ने एक फिल्म ‘नया संसार’ बनाई थी जिसमें अशोक कुमार एवं रेणुका देवी की मुख्य भूमिकाएं थी। उस फिल्म में सम्भवत पहली बार एक निर्देशक पत्रकार को कथा का प्रमुख पात्र बनाया गया था और वर्षो पहले की याद में निर्माता-निर्देशक आत्माराम द्वारा बनाई गई फिल्म ‘आरोप’ को देखने के बाद ताजा हो जाती है। हाल ही में प्रदर्शित फिल्म ‘मां बहन और बीबी’ की कहानी ‘सोने के हाथ’ की नकल ही तो है।

कहानियों की तस्करी की आंधी यदि निरंतर इसी तरह चली तो वह दिन दूर नही जब भारतीय फिल्म इतिहास ही कलंकित हो उठेगा और उस समय यह खोज पाना तक असम्भव हो जाएगा कि कौन-सी कहानी पर पहली फिल्म किस नाम से बनी।

ये तस्कर निर्माता और लेखक जो कहानी के नाम पर चूं चूं का मुरब्बा तथा साहित्य और मौलिकता के नाम पर अंट-शंट पेश करते है और तुर्रा यह कि इतनी फिल्में बनती है कि नई कहानियां तलाश करना असम्भव-सा दिखाई पड़ता है। यह लचर दलील पेश करने वाले निर्माताओं ने पुराने ग्रन्थों को उठा कर नही देखा जिनमें कहानियों का भण्डार भरा पड़ा है। हमारे आसपास बिखरे हुए कितने ही विषय है जैसे जन-जन में व्याप्त असंतोष, बेरोजगारी, भुखमरी तथा युवावर्ग में फैली आक्रोश की भावना। फिल्मोद्योग में सिर्फ आवश्यकता है एक अच्छे जौहरी की जा समाज में बिखरी हुई घटनाओं को अपनी बुद्धि की छेनी से तराश कर मर्यादित ढंग से पर्दे पर प्रस्तुत कर सके।

साहित्य, फिल्म तथा जनता से विश्वासघात करने वाले लेखकर यदि समय रहते संभल न गए तो वह दिन दूर नही जब उन्हें दूध की मक्खी की तरह निकाल कर फैंक दिया जायेगा।


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Mayapuri

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