जग्गू दादा, अभी हार मानने के लिए तैयार नहीं – अली पीटर जॉन

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लगभग तीस वर्ष पहले यह शख्स, ‘जग्गू दादा तीन बत्ती वाला’ के नाम से जाने जाते थे। वे मॉर्डन जमाने के रॉबिनहुड थे जो दूसरों को मुसीबतों से निकालने के लिए खुद मुसीबत में उतर जाते थे। उन्हें लोग दादा कहते थे। इस नाम से उन लोगों को पुकारा जाता था जो अक्सर दंगा फसाद करते और जिनसे शांतिप्रिय लोग जरा दूर ही रहते थे। उन दिनों ‘भाई’ का चलन नहीं था, दादा का था। जग्गू अपने बड़े भाई हेमंत के साथ, राज भवन (गवर्नर हाउस) के निकट स्थित, सेंट्रल मुंबई के तीन बत्ती इलाके में अपनी दबंगई से राज करते थे।

हर रोज हेमंत और जग्गू दादा किसी ना किसी झगड़े टंटे, लफड़े में उलझते रहते थे। वहां के लोकल पुलिस महकमे में वे दोनों पहचाने हुए थे, वहां के पुलिस स्टेशन में उन दोनों के नाम, दंगा फसाद करने वालों के रूप में दर्ज थे। शाम ढलने के बाद उस इलाके की लड़कियां अपने घरों के बाहर कदम रखने से डरती थी क्योंकि वही वक्त होता था जब जग्गू दादा अपने हमेशा के काले पोशाक, काले जूते और सर में बंधी काली पट्टी (बन्दाना) में, अपने गुर्गो के साथ इलाके में घूमने निकलते थे। लेकिन एक बात जगजाहिर था की हेमन्त और जग्गू के खिलाफ, औरतों तथा लड़कियों के साथ बदतमीजी या बुरे बर्ताव करने की कोई शिकायत कभी दर्ज नहीं थी। वे दोनों स्त्रियों की बड़ी इज्जत करते थे और साथ ही इज्जतदार, सभ्य लोगों की भी इज्जत करते थे। वे सिर्फ उनके लिए बेहद बुरे थे जो सबका बुरा करते थे। गलत काम करने वालों को वे दोनों ऐसा जबरदस्त सबक सिखाते थे कि दोबारा वे लोग कभी इन दोनों भाइयों या तीन बत्ती इलाके के आसपास फटकने की हिम्मत नहीं करते थे। उनका यह राज पाट तब तक चलता रहा जब तक कि एक दिन हेमंत की हत्या ना हो गई। खबरों के अनुसार वे किसी राइवलरी के शिकार हुए थे। बड़े भाई की ऐसी क्रूर हत्या के बाद जग्गू दादा चाहते तो भाई के हत्यारों से बदला लेने के बारे में सोच सकते थे लेकिन आश्चर्यजनक तौर से इस घटना का उल्टा असर हुआ।

जग्गू दादा ने कई दिनों की गंभीर सोच के बाद अपनी जीवन धारा को बदलने का निश्चय किया। अब वे एक नॉर्मल शांतिप्रिय इंसान के रूप में जीना चाहते थे। वे जीवन में कुछ कर दिखाने का निर्णय करने लगे। सौभाग्य से उनका अतीत उनके रास्ते का रोड़ा नहीं बना। अब जग्गू दादा वाल्मीकि की तरह अपना जीवन सुधारने में लगे थे। वे जग्गू से ‘जयकिशन श्रॉफ’ बन गए। उनके पिता एक गुजराती एस्ट्रोलॉजिस्ट थे और माता एक नेपाली घरेलू स्त्री। यह पुनर्जन्म वाले जयकिशन, बेहद डैशिंग और हैंडसम युवक थे जो अपने इलाके की प्रत्येक लड़कियों के हीरो थे। उनमें से कई लड़कियां तो मन ही मन उन से बेहद प्यार भी करती थी लेकिन जैकी एक हाई सोसाइटी की लड़की आयशा के प्रेम में पड़ गए। आयशा भी जैकी से प्यार करने लगी  उनका यह प्रेम सबको आश्चर्यचकित कर गया। अब जयकिशन किसी भी तरह का काम  करके पैसा कमाना चाहता था ताकि इज्जत की जिंदगी जी सके। वे ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे मुश्किल से एस एस सी पास थे। उनके कुछ अच्छे दोस्त और आयशा (जो खुद मॉडलिंग मे थी) ने उन्हें मॉडलिंग में हाथ आजमाने की सलाह दी, तब उन्होंने अपना एक फोटो सेशन करवाया और  सुभाष खांडके (जो खुद भी एक लीडिंग मॉडल थे) के साथ बड़ी बड़ी मॉडल एजेंसियों और मॉडलिंग-को-आर्डिनेटर के दफ्तरों के चक्कर लगाने और वहां अपनी तस्वीर छोड़कर आने लगे। जल्द ही उन्हें ढेर सारी मॉडलिंग के ऑफर मिलने लगी और देखते देखते वे चोटी के मॉडल्स में शुमार हो गए। उनकी वो चारमीनार सिगरेट वाली मॉडलिंग बहुत चर्चित हुई जिसने देव आनंद को भी आकृष्ट किया और उन्होंने जयकिशन को बुलवाकर फिल्म ‘स्वामी दादा’ में लीडिंग रोल का ऑफर दे दिया, इससे जयकिशन, (जो अब जैकी श्रॉफ कहलाये जाने लगे थे) खुशी से झूम उठे क्योंकि वे बचपन से ही देव आनंद के फैन थे और उनकी तरह हावभाव भी करते थे, लेकिन समस्या तब उठ खड़ी हुई जब मिथुन चक्रवर्ती जैसे पॉपुलर और सेलेबल स्टार ने वह रोल अपने लिये डिमांड किया। तब देव ने उस समस्या के बारे में जैकी को बताया।  जैकी निराश नहीं हुए, वे देव साहब से मिलकर ही बहुत खुश थे। फिर भी देव आनंद ने जैकी को खाली हाथ नहीं जाने दिया और उन्हें उस फिल्म में एक छोटा सा रोल ऑफर कर दिया जिसे जैकी ने खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया।
जैकी नहीं जानते थे कि स्वामी दादा में वो छोटी सी भूमिका उसके लिए बड़ी बात बन जाएगी। उन्हीं दिनों सुभाष घई अपनी खुद की प्रोडक्शन कंपनी ‘मुक्ता आर्ट्स लांच कर रहे थे, जिसके तहत वे फिल्म ‘हीरो’ बनाने जा रहे थे लेकिन वे जिन स्टार पुत्रों के पास इस फिल्म का ऑफर लेकर गये उन लोगों ने बहुत ज्यादा पेमेंट मांगा, तब सुभाष घई ने नए कलाकारों को लांच करने का फैसला किया। उन्होंने ‘स्वामी दादा’ में जैकी को देखा तो उन्हें वह भा गए।  उन्होंने जैकी को अच्छी तरह ग्रूम करके बतौर हीरो अपनी फिल्म ‘हीरो’  में लॉन्च कर दिया। सुभाष घई ने इसमें मीनाक्षी शेषाद्री को बतौर नायिका रीएंट्रोड्यूस किया था। जैकी ने उस फिल्म में बहुत मेहनत की, कई बार तो घबरा कर वे फिल्म इंडस्ट्री छोड़ने पर भी उतारू हो गए थे लेकिन सुभाष घई ने उन्हें  ढांढस बंधवाकर रोक लिया और जीत दिलवाई। फिल्म रिलीज होते ही सुपर डुपर हिट हो गई और जैकी सुपर हीरो की बुलंदी छूने लगे। जैकी जानते थे कि उनका मुकाबला बड़े-बड़े स्टार पुत्रों से है लेकिन उन्होंने सारी बाधाओं को मेहनत से मुकाबला करके जीत हासिल कर ली। जल्द ही वे मोस्ट पॉपुलर और हाइली पेड स्टार बन गए और अपने एक कमरे की खोली छोड़ कर समुंद्र किनारे के अपार्टमेंट में, अपने मेंटर सुभाष घई के पड़ोसी बन गए। जैकी श्रॉफ का वह सक्सेस स्टोरी जो 1983 में डगमगाते हुए शुरू हुई थी उसे अब 34 वर्ष पूरे हो गए हैं। क्या शानदार पारी खेली उन्होंने। जैकी, प्रबुद्ध  क्रिटिक्स द्वारा कभी महान एक्टर नहीं माने गए। ना ही जैकी ने खुद को कभी ग्रेट एक्टर माना लेकिन उन्होंने साबित कर दिया कि वे बेहतरीन डायरेक्टर सुभाष घई, विधु विनोद चोपड़ा, जेपी दत्ता, प्रियदर्शन जैसे निर्देशक के निर्देशन में बहुत उम्दा काम कर सकते हैं।

पिछले 34 वर्षों में जैकी ने डेढ़ सौ से ज्यादा फिल्में की है। उनकी हाल की फिल्म ‘धूम-3’ में भी वे एकदम अलग तरह के चरित्र निभा रहे हैं जिसके बारे में अभी वे कुछ कहना नहीं चाहते। वे हमेशा सफल रहे, उनकी सफलता के कई कारण है जैसे उनका अच्छा बर्ताव, डिसिप्लिन, निर्माता की समस्याओं को समझना, अपनी ताकत और कमजोरियों को पहचानना और सबका गुडविल अर्जित करना। एक समय जैकी और आयशा ने मिलकर अपनी खुद की फिल्म कम्पनी शुरू करना चाहा लेकिन वे समझ गए कि प्रोडक्शन उनको रास आने वाली नहीं। जैकी आज भी लोकप्रिय एक्टर है, हर तरीके का रोल करने में माहिर। उन्होंने ‘सरकार 3’ में विलेन का रोल भी किया लेकिन वे इतनी समझ रखते हैं कि अब पहले जैसा हीरो बनना या अमिताभ बच्चन जैसे रोल पाना उनके लिए संभव नहीं। वे बदलते वक्त के साथ बदलाव में यकीन करते हैं। एक समय हीरो रह चुके जैकी अब सत्य साईं बाबा का रोल करने में भी नहीं झिझकते। वक्त और उम्र की इज्जत करते हुए अब वे नायक नायिकाओं के पिता का रोल करने को भी तैयार है। उनकी नर्मयी और मानवीयता उनकी सबसे बड़ी ताकत है जिसने उन्हें वह जगह दी है जिसके वे हकदार हैं। उन्हें इस बात की फिक्र नहीं कि फिल्म इतिहास में उन्हें क्या स्थान मिलेगा, वे बस अपने वर्तमान और भविष्य में बेहतर से बेहतर कर्म करने में विश्वास रखते हैं।

जैकी के बारे में विस्तार से

० जैकी के पिता जो एक छोटे मोटे एस्ट्रोलॉजर थे को यह तो अंदेशा था कि जैकी कुछ कर दिखाएगा लेकिन फिल्म स्टार बनेगा यह उन्होंने सोचा नहीं था।

० जैकी अपनी माता जी के बहुत करीब थे जो हर वक्त जैकी को एक अच्छे इंसान बनाने के लिए प्रार्थना करती रहती थी। जैकी का मानना है कि उनकी माता की प्रार्थनाओं की वजह से ही उनकी जिंदगी बदल गई है।

० जैकी अपनी अच्छाइयों, बड़प्पन और दयालू स्वभाव के लिए जाने जाते हैं। एक वक्त वह था जब उन्होंने अपनी एक टीम के तहत, डेविड नामक शख्स को मुखिया बनाया था, जो ढूंढ ढूंढ कर हजारों जरुरतमंदों की खबर लाता था जिसे जैकी मदद करते थे। जैकी को ‘वन मैन धर्मशाला’ कहा जाता था। लेकिन धीरे-धीरे उन्हें  पता लगा कि लोग उनकी इस अच्छाई का गलत फायदा उठा कर उनसे चीटिंग करके उन्हें लूटने लगे हैं। तब उन्होंने इसे बंद कर दिया और अब वे खुद या उनकी पत्नी आयशा ही अपने हाथों से चैरिटी करते हैं।

० जैकी अपनी जड़ों को कभी नहीं भूले और आज भी उनसे जुड़े हैं।

० वे आज भी बेहद सिम्पल, मासूम, और जीवन के अच्छे मूल्यों  से जुड़े हुए हैं। वे अपनी पुरानी यादों से इतने जुड़े हुए हैं कि उन्होंने अपनी, पुरानी एक कमरे की खोली को नहीं बेचा और आज भी जब मर्जी वहां जाकर पुरानी यादों को खंगालते हैं।

० अपने विशाल अपार्टमेंट में एक छोटा-सा कोना ही उनका फेवरेट कोना है, जहां वे लुंगी कुर्ता पहने आराम करते हैं।

० एक जमाने में जैकी कारों के बेहद शौकीन थे और उन्हें खरीदने का सपना देखते थे। आज उनके पास हर शेप, साइज और ब्रांड ( विंटेज से लेकर आज की लेटेस्ट मॉडल )की  कारें है जिसे वे अपने से कभी दूर नहीं करते हैं।  उन्हें कारों की हर मैकेनिज्म की जानकारी भी है। अपने बेटे हेमन्त (स्व. भाई हेमन्त के नाम पर) को चार वर्ष की उम्र में ही कार के व्हील पर बैठाया था। कारों के प्रति दिलचस्पी के कारण ही उनकी दोस्ती कई महाराजाओं और करोड़पतियों से हुई थी

० जैकी उन लोगों को कभी नहीं भूलते जिन लोगों ने कभी उनका फेवर किया था। वे अपने मेंटर देवानंद और सुभाष घई को कभी नहीं भूले और उन्हें अपना, ‘धरती का भगवान’ मानते हैं। उन्होंने कभी अपने को बड़ा एक्टर करार नहीं दिया। वे कहते हैं, ‘‘अपुन को कहां एक्टिंग आती है? एक्टिंग करने वाले तो बड़े बड़े बाप बैठे हैं, अपुन तो बस तकदीर से बन गया एक्टर। यह ऊपर वाले की मेहरबानी है।’’

० जैकी और अनिल कपूर ने 12 फिल्मों में साथ काम किया। एक्टिंग के मामले में जैकी अनिल को ‘मेरे बाप’ कहते हैं।

० खुद इमोशनल होने के बावजूद वे इमोशनल सीन में कंफर्टेबल नहीं है। कई बार ऐसे दृश्यों में उन्होंने साठ रिटेक्स भी दिए लेकिन वक्त के साथ उनमे काफी सुधार आया।

० वे जीवन भर स्टूडेंट रहने में यकीन करते हैं, हाल ही में उन्होंने पूरी ईमानदारी से इंटरनेट द्वारा दुनिया भर की खबरें और डेवलपमेंट की जानकारी लेना शुरू कर दिया है।

० वे बड़े-बड़े पब्लिक फंक्शंस से दूर रहना पसंद करते हैं और अगर जाते भी है तो दूर, अंतिम रो में चुपचाप खड़े रहते हैं, ना तो वे कभी चीफ गेस्ट बनना पसंद करते हैं और ना भाषण देना, लेकिन अपनी चोली में रहने वाले आम लोगों के हर उत्सव, शादी, बर्थडे खूब खुशी-खुशी अटेंड करते हैं।

० जैकी ने कभी देश या विदेश के किसी शो में भाग नहीं लिया। पैसों की उन्हें कई बार कितनी भी जरूरत पड़ी हो लेकिन उन्होंने ये पक्का फैसला कर रखा है कि कभी अपनी कारों को नहीं बेचेंगे और कभी कोई शो में परफॉर्म नहीं करेंगे।

० उन्होंने हमेशा अपने फिल्म निर्माताओं की मदद की। उनके लिए कई बार फ्री में काम किया और कई बार निर्माताओं की हालत पहचान कर अपनी फीस लेना भी जानबूझकर भूल गए।

० जैकी को बच्चों से बहुत प्यार है। जैकी अपने बेटे हेमन्त (टाइगर) और कृष्णा को बहुत प्यार करतें है और दूसरों के बच्चों को भी अपने बच्चे जैसा ट्रीट करते है। उन्होंने जरूरतमंद और खराब परिस्थितियों में जीने वाले बच्चों की खूब मदद की है और आज भी करते है।

० एक समय उन्हें ‘द मोस्ट हैंडसम मैन’ माना जाता था, आज भी वे पहले की तरह ही सिर्फ भारत मे ही नहीं बल्कि अमेरिका, ग्रेट ब्रिटेन, इजिप्ट, यहाँ तक की सऊदी अरब में भी बेहद पॉपुलर हैं (वहाँ भी, जहाँ भारतीय फिल्में बैन है)।

० वे नए कलाकारों की भी बहुत मदद करते हैं, उन्हें तरह तरह के टिप्स देते हैं, उनके प्रति बहुत प्रोटेक्टिव है और उन्हें निर्माताओं से मिलवाते हैं ताकि उन्हें काम मिल सके।

० जैकी अमीरों की कम्पनी में जितने कम्फर्टेबल है उससे ज्यादा गरीबों की कम्पनी में खुश रहतें हैं।

Actor Jackie Shroff with his son Tiger Shroff. Express archive photo

० वे पॉलिटिक्स से हमेशा दूर रहतें है जब कि उस क्षेत्र में उनके कई अच्छे मित्र है लेकिन वे कभी किसी पोलिटिकल प्रोग्राम में नहीं गयें।

० जैकी को यह आकांक्षा नहीं कि उनका नाम फिल्मी इतिहास में दर्ज हो या वे पीढ़ी दर पीढ़ी याद रखे जाय। वे वर्तमान में जीना पसंद करते हैं।

० जैकी श्रॉफ ‘जीयो और जीने दो’ में यकीन करते हैं। उनके अनुसार, ‘‘जिंदगी बहुत खूबसूरत है। एक ही जिंदगी हमें मिलती है। खूब जीयो और सबकी जिंदगी खूबसूरत बनाने की कोशिश करो।

० फिल्मों में 34 वर्ष पूरे करने और अपने आने वाले कल के बारे में वे कहते हैं, ‘‘ऊपरवाले ने अब तक हाथ पकड़ कर चलाया। वही शक्ति हैं, वही शरण हैं, वही सहारा है।, वही तारनहार है, वही करेगा जो उसे करना है।’’

 


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Mayapuri

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