‘‘इमेज बदलने के लिए ‘‘बदलापुर’’ नहीं की’’ – वरूण धवन

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अब तक हर फिल्म में लवर ब्वाॅय के किरदार निभाने के साथ साथ काॅमेडी करते आ रहे वरूण धवन को भी अहसास हो गया है कि यदि उसे लंबी रेस का घोड़ा बनना है, तो उसे नित नए व अलग तरह के किरदार निभाने होंगे। किरदारों को लेकर नए नए प्रयोग करने होंगे.इसी अहसास वह सोच के साथ वरूण धवन ने श्रीराम राघवन की फिल्म‘‘बदलापुर’’में अभिनय एकदम अलग तरह का किरदार निभाया है। इस फिल्म में वह 20 से 48 साल की उम्र तक के किरदार में नजर आने वाले हैं।

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क्या आपने अपनी लवर ब्वाॅय की ईमेज को बदलने के लिए ‘बदलापुर’ में अभिनय किया है?

सच यह है कि ईमेज बदलने की बात सोचकर मैने यह फिल्म नहीं की.बल्कि मुझे इस फिल्म की स्क्रिप्ट व किरदार में कुछ चुनौती नजर आयी.इस फिल्म में भी मेरा किरदार एक लवर ब्वाॅय का ही है,जो कि अंत में बदला लेता है.इसमें मेरा किरदार एक ऐसे युवक का है,जो कि किसी से प्यार करता है,पर एक दिन वह उस खो देता है.तब वह उससे बदला लेता है,जिसकी वजह से उसने अपना प्यार खोया है.पर इसके यह मायने नहीं हैं कि ‘बदलापुर’से पहले मैंने जो फिल्में कीं,वह महत्वपूर्ण नहीं थी।

‘‘बदले की भावना’’के काॅंसेप्ट पर अनगिनत फिल्में बन चुकी हैं. तो उनसे ‘बदलापुर’अलग कैसे है?

मैं दावे के साथ कह सकता हॅूं कि ‘‘बदलापुर’’जैसी एक भी फिल्म अब तक नहीं बनी है.यह श्रीराम राघवन की फिल्म है। हर किसी को पता है कि उन्होंने अतीत में भी अलग मूड़ की ही फिल्में बनायी हैं.

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‘‘बदलापुर’’करना आपके लिए कितना सहज रहा?

इस फिल्म में अभिनय करना मेरे लिए बहुत कठिन रहा.क्योंकि इस फिल्म में मैंने एक ऐसा किरदार निभाया है,जो कि मेरी अपनी निजी जिंदगी से एकदम विपरीत है। मैं निजी जिंदगी में ‘हम्टी शर्मा की दुल्हनियां’ का हम्टी या ‘मैं तेरा हीरो’के शीनू जैसा ही हूं। पर ‘बदलापुर’के रघू जैसा नहीं हूं। निजी जिंदगी में मुझे गुस्सा आता ही नहीं है.पर कैमरे के सामने रघू को निभाते समय अपने अंदर के गुस्से को निकालना मेरे लिए बहुत कठिन था। मेरे लिए यह समझना बहुत मुश्किल हो रहा था कि एक आम इंसान आखिर कितना दर्द सह सकता है?इस किरदार को यथार्थ रूप देने के लिए मुझे काफी दर्द का अहसास करना पड़ रहा था.

रघू के किरदार को निभाने के लिए आपने किस तरह से तैयारी की?

फिल्म के निर्देशक श्रीराम राघवन ने खुद मेरे लिए सारी योजनाएं बना रखी थी.उन्हें मेरी प्रतिभा पर और मुझ पर यकीन था.फिल्म की शूटिंग से पहले श्रीराम राघवन ने मुझे पूरे एक माह के लिए उसी माहौल में रहने के लिए भेजा था, जिस माहौल में फिल्म के अंदर रघू का पात्र है। हम लोगों ने इस फिल्म को मुंबई से करीबन 200 किलोमीटर दूर इगतपुरी में फिल्माया है। शूटिंग के दौरान हम जहाॅं ठहरे हुए थे, वहाॅं एसी तो छोडि़ए पंखे भी नहीं थे. उन्होंने जानबूझकर मुझे ऐसे माहौल में रखा, जिससे मैं रघू के चरित्र में घुस सकूं। सच कहूं तो मैंने तमाम कलाकारों के मुंह से सुना है कि वह चरित्र में घुसने के लिए इस तरह की ‘मैथड एक्टिंग’का उपयोग करते हैं. पर पहली बार मुझे अहसास हुआ कि किसी चरित्र में घुसने के लिए इस तरह का प्रोसेस उपयोग में लाया जा सकता है।

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इस फिल्म में आपने पिता का भी किरदार निभाया है। इसके लिए किस तरह का होमवर्क किया?

जी हां!मैंने 27 साल की उम्र में ही 48 साल के इंसान और पिता का किरदार निभाया है.मेरे बड़े भाई रोहित धवन की शादी हो चुकी है.मेरे कई कजीन की शादी हो चुकी है.उनके बच्चे भी हैं.तो इन सबको मैं देखता आया हूं। मैंने अपने कजीन को देखा है कि वह अपनी पत्नियों के सामने किस तरह से बच्चे बन जाते हैं.पर अपने बच्चों के साथ वह किस तरह से कड़ाई के साथ पेश आते हैं.हां पिता का किरदार निभाने के लिए मुझे थोडा सा वजन बढ़ाना पड़ा। बाॅडी लैगवेज बदलनी पड़ी।

रघू का असर आपने घर पर भी दिखाया होगा?

जी हां !मेरे इस गुस्से का ज्यादातर शिकार मेरी मां हुई हैं.पर वह मुझे बहुत अच्छी तरह से समझती हैं.

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लोगों का मानना है कि कलाकार जिस चरित्र को निभाता है,उसका उसकी निजी जिंदगी पर भी असर होता है.तो क्या रघु का आपकी निजी जिंदगी पर असर हुआ?

जी हां! ऐसा होता है.मेरे साथ भी ऐसा हुआ.फिल्म‘‘बदलापुर’’की शूटिंग खत्म होने के बाद भी काफी दिनों तक रघु मेरी निजी जिंदगी पर हावी रहा। रघु का किरदार निभाते हुए मैं काफी गंभीर रहने लगा था.मेरा गुस्सा मेरी आंखों से झलकता था.यह सब शूटिंग खत्म होने के बाद भी काफी दिनों तक मेरे साथ चिपका  रहा अब मैं कुछ काॅमेडी फिल्मों में काम करना चाहूंगा।

आपको किस तरह के जाॅनर की फिल्मों में काम करना पसंद है?

काॅमेडी.

सुना है कि आपके पिता नही चाहते थे कि आप ‘बदलापुर’में रघू का किरदार निभाएं?

इस फिल्म की स्क्रिप्ट को पढ़ने के बाद पहले वह थोड़ा सा डर गए थे. लेकिन वह भी एक फिल्म निर्देशक हैं.इसलिए बाद में उन्होंने इजाजत दे दी थी.सच कहूं तो मेरे पिता से कहीं ज्यादा मेरे बड़े भाई ने मुझे इस फिल्म को निभाने के लिए मेरा हौसला बढ़ाया.

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फिल्म का प्रोमो बाहर आने के बाद किस तरह का रिस्पांस मिल रहा है?

उम्मीदों से भी ज्यादा बेहतरीन रिस्पांस मिल रहा है.
 

कहा जा रहा है कि आपने इस फिल्म के लिए पारिश्रमिक राशि भी कम ली है?

यह आम कमर्शियल सिनेमा की बजाय प्रयोगात्मक सिनेमा है.इस फिल्म को एक सीमित बजट के अंदर बनाया गया है। ऐसे में हमें भी अपनी पारिश्रमिक राशि में कटौती करनी पड़ी पारिश्रमिक राशि में कटौती कर मैंने कोई अनूठा काम नही किया है। हर कलाकार बेहतरीन किरदार निभाने का मौका मिलने पर फिल्म के बजट के अनुसार अपनी पारिश्रमिक राशि को घटाते रहते हैं. बदलापुर जैसी फिल्म बनाने का साहस दिनेश विजन जैसे चंद फिल्म निर्माता ही दिखा पाते हैं।

एक कलाकार के तौर पर आपकी ताकत और कमजोरी क्या है?

मेरी राय में हर कलाकार की सबसे बड़ी ताकत यह होती है कि वह निर्देशक को ध्यान से सुने.मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि यदि मैंने श्रीराम राघवन जैसे निर्देशक के साथ काम ना किया होता,तो ‘बदलापुर’ जैसी फिल्म नहीं कर सकता था। उन्होंने मुझ पर यकीन किया,मेेरे लिए यह बहुत बड़ी बात है। यदि उन्होंने मेरी प्रतिभा पर यकीन ना किया होता, तो मैं तीन काॅमेडी फिल्में करने के बाद इस तरह की फिल्म कभी न कर पाता. उनके यकीन ने मेरे साहस को बढ़ाया।

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फिल्म की टैगलाइन है-‘‘डॉन्ट मिस द बिगनिंग’’.आप अपनी जिंदगी में किस शुरूआत को नहीं भूलना चाहेंगे?

कलाकार के तौर पर जब हम किसी फिल्म को साइन करते हैं,तो फिल्म की शुरूआत का जो प्रोसेस होता है, उसे नजरंदाज नहीं किया जाना चाहिए.फिल्म की शुरूआत के प्रोसेस में ही वर्कशॉप वगैरह होते हैं। जिससे एक कलाकार को फिल्म व चरित्र के ‘सुर’ को पकड़ने में मदद मिलती है.‘बदलापुर’के निर्माण में आठ माह का समय लगा.पर मैं शूटिंग के शुरूआती दिनों को कभी नहीं भुला सकता।

श्रीराम राघवन की पिछली फिल्म ‘‘एजेंट विनोद’’ बॉक्स आफिस पर नहीं चली थी.ऐसे में उनके निर्देशन में ‘बदलापुर’जैसी फिल्म में अभिनय करने का निर्णय ‘रिस्की’नहीं लगा?

मैंने इस ढंग से कभी सोचा ही नहीं.वैसे भी किसी भी फिल्म की सफलता या असफलता का दावा कोई नहीं कर सकता। एक फिल्म की असफलता की वजह से निर्देशक की प्रतिभा पर सवाल उठाना मूर्खता के अलावा कुछ नहीं। मेरे पिता ने भी कुछ सफल और कुछ फ्लाॅप फिल्में बनायी हैं। श्रीराम राघवन एक बेहतरीन निर्देशक हैं.उन्हें सिनेमा और तकनीक का बहुत अच्छा ज्ञान है.इसी के साथ इस फिल्म की कहानी बहुत बेहतरीन है।

आप तो ‘बदलापुर’की सफलता को लेकर कुछ ज्यादा ही आत्मविश्वासी नजर आ रहे हैं?

फिल्म की सफलता को लेकर मेरे आत्मविश्वास से भी ज्यादा बड़ी बात यह है कि यह एक ऐसी फिल्म है, जिसके साथ दर्शक खुद जुड़ सकेगा.‘बदलापुर’जैसी फिल्म में अभिनय करना रिस्क है.पर मैंने यह रिस्क उठायी.क्योंकि मुझे स्क्रिप्ट पढ़ते पढ़ते एहसास हो गया था कि इसके साथ हर इंसान जुडे़गा।


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Mayapuri

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