रेखा एक खूबसूरत एहसास जिसे हर कोई छू नही सकता

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वो यादें, जो भुलाये ना भूले कभी

सुलेना मजुमदार अरोरा

एक तेरह साल की कमसिन कली अपनी मासूमियत की हद उठाये, अपनी जवानी और बचपन की सीमा रेखा में ठिठकी जब बॉलीवुड की कठोर धरती पर उछाल दी जाती है तो वो किस तरह स्तंभित, चौंकी और विस्मित हो जाती है ये वो ही जानती है जिस पर यह बीतती है। मुझे याद है, बहुत साल पहले जब हमारे मायापुरी के संस्थापक, श्री ए.पी. बजाज दादू तथा पन्नालाल व्यास गुरु के साथ मैं रेखा जी से मिली थी तो उन्होंने बजाज दादू से कहा था, ”वो गुजरे दिन कुछ अजीब से थे, कितने सारे दहशत के एहसासों और प्रश्नों के उत्तर मेरे तेरह वर्षीय दिल और दिमाग समझ नहीं पाते थे, मैं इस वातावरण से भाग जाना चाहती थी पर कहाँ जाती, किसे फुर्सत थी मेरे इन असमंजसो के लिए? लिहाजा अपने आप मे गिरफ्त होती रही, बचपन की चंचलता कहीं चुपके से गुम होने लगी। मुम्बई मेरे लिए एक अनजान शहर था, मैं अपने घर चेन्नई मे ही रहना पसंद कर रही थी। लेकिन बॉलीवुड में काम करना ही था। यहाँ के तौर तरीके अलग थे। मुझे कुछ भी समझ में नहीं आता था, न हिंदी न मराठी। वलनरेबल थी, हां, मैं समझती थी कि फलां इंसान मेरा फायदा उठाना चाह रहा है। मैं उससे दूर भाग जाती थी। सोचती यह मैं कहाँ आ गयी हूँ।

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मुझे तो स्कूल में होना चाहिये था, मस्ती करनी चाहिये थी, सहेलियों से उस कमसिन उम्र की शरारतों को शेयर करके चुपके चुपके हँसना, ठिठोली करनी चाहिये थी, और इधर क्या हो रहा है? मुझे ऐसे कपड़े पहनने पड़ रहे हैं जो मेरी उम्र की लड़कियां नहीं पहनती है, मेरा बच्ची दिखना गुनाह था।, ठूस ठूस कर मुझे जवान दिखाया गया। ”रेखा जी ने बताया था कि उन दिनों उनकी माँ बीमार थी,, वे कितना चाहती थी कि माँ के पास चली जाये और उनके सिल्क की साड़ी के आँचल में छुप जाये, उनके बालों मे हरदम महकते मोगरे के गजरे की खुशबू मे खो जाये, लेकिन बॉलीवुड में उन्हें रहना ही पड़ा, फिल्मों में काम करना ही पड़ा, परिस्थिति ही ऐसी थी कि वो काम छोड़ ही नहीं सकती थी। रेखा की कच्ची नेचुरल खूबसूरती पर जलने वाले जलकर कुछ न कुछ ताने कसते रहे और रेखा सब सहती रही, सेट पर हिंदी में उनके कई सह कलाकार उनके तौर तरीके, भाषा, रंग रूप और कच्चे हाव भाव पर मजाक करते, रेखा नहीं समझ पाती और सबके हंसने पर वे भी हंस पड़ती, तब लोग और जोर से हंस पड़ते। उनकी दो फिल्में एक साथ रिलीज हुई।

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एक तेलुगु फिल्म अम्मा कोसम, दूसरी सावन भादो उनकी पहली हिंदी फिल्म। सावन भादो ऐसी सुपर हिट हुई कि फिर रेखा ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। सबके तानों ने उन्हें कुछ बनकर दिखाने की जिद से भर दिया। उन्होंने उसके बाद अपने मेक अप गेट अप, पोशाक भाषा तौर तरीके में ऐसा बदलाव किया, अपने डाइट प्लान, योगा और मेक ओवर से ऐसा जादू जगाया कि वे दीवा कहलाने लगी। रैंप वॉक पर जब रेखा होती तो सारे टॉप के मॉडल्स और खूबसूरत से खूबसूरत हीरोइन फीके पड़ जाते। उन्होंने अपने परफॉर्मेंस मे वो जादू जगाया और परिपक्वता भर दी कि उनकी एक्टिंग के करोड़ों दीवाने हो गए, उनकी आगे की फिल्में जैसे फिल्म घर, रामपुर का लक्ष्मण, कहानी किस्मत की, प्राण जाये पर वचन न जाये, दो अनजाने, मुकद्दर का सिकंदर

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खूबसूरत, सिलसिला, उमराव जान, बसेरा एक ही भूल, मुझे इंसाफ चाहिये खून भरी मांग, कलयुग, उत्सव इजाजत जैसी फिल्मों ने उन्हें बेहतरीन एक्ट्रेस के खिताब से नवाजा। उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का नेशनल अवॉर्ड प्राप्त हुआ, फिल्मफेयर अवॉर्ड प्राप्त हुआ, पद्म श्री अवॉर्ड प्राप्त हुआ, आइफा अवॉर्ड, स्क्रीन अवॉर्ड प्राप्त हुआ। वे टॉपमोस्ट, सबसे ज्यादा पेमेंट पाने वाली नायिका बन गयी। वे लगातार फिल्में करती रही क्योंकि अवॉर्ड्स पाने और करोड़ों दर्शकों के प्यार ने उन्हें एक्टिंग को एन्जॉय करना सिखा दिया, उनकी बाद की फिल्में जैसे मेरा पति सिर्फ मेरा है, फूल बने अंगारे, गीतांजलि, मैडम एक्स, कामसूत्रा अ टेल ऑफ लव, खिलाडि़यों के खिलाड़ी, आस्था, बुलन्दी, लज्जा, कोई मिल गया, यात्रा, सदियां, सुपर नानी शमिताभ वगैरा उनकी अब तक की फिल्मों ने उन्हें आज भी सुपर स्टार की चमक से चमकाए रखा। जेमिनी गणेशन और पुष्पावली की वो नादान, तितलियों से खेलने वाली बच्ची भानुरेखा आज कहाँ से कहाँ पहुँच गयी है, लेकिन यादों के साये में उनका जीवन आज भी उनकी अम्मा के बालों में टंगे मोगरे के गजरे से महक रहा है।

 


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