फिल्म इंडस्ट्री में अभिनेत्रियों का अकाल

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Actress-Collage

 

मायापुरी अंक 12.1974

आज हमारी फिल्म इन्डस्ट्री पर अनेक खतरे मंडरा रहे है।

पहला खतरा है टैक्स दिलीप कुमार से इस बारे में बात कीजिये। वह आपके सामने आंकड़े रख देगें ऐसे-ऐसे तर्क देगें कि आपका दिल करेगा अभी जाकर एन्टरटेनमेंट टैक्स और इंकम टैक्स के खिलाफ प्रधान मंत्री की कोठी पर धरना दिया जाए।

सचमुच ही इस इंडस्ट्री के प्रति सरकार का रवैया बहुत दु:खद है केवल यही इंडस्ट्री (भारत में ही नही पूरे संसार में) ऐसी है जिसके साथ में कुल आमदनी का केवल दसवां भाग लगात है। शेष सारी आमदनी इधर-उधर बंट जाती है। आमदनी का दो तिहाई भाग तो सरकारी खजाने में जमा हो जाता है। इसलिए अधिकतर फिल्में अपनी कीमत भी नही निकाल पाती। फिल्म-निर्माण एक जुआ बनकर रह गया है। फिल्म-निर्माण की लागत सातवें आसमान को छू जाती है। इस के बाद सातवें आसमान के ऊपर बैठे विधाता की मर्जी है कि वह बेचारे गरीब (फिल्म पूरी होते-होते निर्माता का बाल-बाल कर्ज में फंस जाता है.) निर्माता की लागत लौटा दे या फिल्म फ्लॉप कर उसका डोंगा डुबा दे।

दूसरा खतरा है मीसा ज्यों-ज्यों स्मगलर भाई बड़े घर के अन्दर जाते जा रहे है। उनसे सम्बन्धित फिल्मी लोगों ( खास तौर पर बेचारी हीरोइनों) के नन्हें-मुन्हें दिल बैठते जा रहे है। जिस तरह सरकार ने स्मगलर भाईयों के ‘न्याय’ मांगने के मौलिक अधिकारों को भी छीन लिया है। उससे तो यही प्रतीत होता है कि सरकार स्मगलिंग जैसी गरीब इन्डस्ट्री का पूरा विनाश करने पर तुल गई है या फिर यह सरकार का सबसे बड़ा स्टंट है।

तीसरा खतरा है, सरकार की फिल्म-वितरण अपने हाथ में ले लेने की धमकी

लेकिन इन सब खतरों से भी ऊपर एक महा खतरा इन्डस्ट्री के भीतर ही पनप रहा है। वह खतरा है हीरोइनों के अकाल का आजकल जिस गति से हीरोइनें शादी (और कम्पलसरी रिटायरमेंट) कर रही है। उससे तो लगता है, वह दिन दूर नही जब फिल्मों में धर्मेन्द्र के साथ ऋषि कपूर और राजेश खन्ना के साथ विश्वजीत हीरोइन बना करेंगी। (इन दोनों हीरोइनों ने अभी से ऐसी प्रैक्टिस शुरू कर दी है।) आज से चालीस वर्ष पहले यही होता था। तब फिल्मों में काम करना एक भद्दा पेशा समझा जाता था। साधारण घरों की लड़कियां भी फिल्मों में काम करने के नाम पर नाक-भी सिकोड़ती। तब हीरोइनों के रोल के लिए सुन्दर लड़कों की तलाश की जाती थी। लगता है, अब वे अच्छे दिन फिर से लौट आयेंगे।

रोजमर्रा के जीवन में आप देखते होगें कि नौकरी-पेशा लड़कियों के लिए वर मिलने में कोई कठिनाई नही होती, वर महोदय आधी आंख लड़की पर और ड़ेढ आंख नौकरी पर रखते है। फिल्म इन्डस्ट्री में इसका उल्टा होता है। वहां किसी साहब की हीरोइन से शादी हुई नही कि झट उसे फिल्मों से सन्यास दिला लेते है या हीरोइन स्वंय ही इन्डस्ट्री छोड़ जाती है। ऐसा क्यों होता है? आइए, जरा खोज-बीन करें। कहते है शादी के बाद हीरोइन अपनी अपील खो बैठती है। उसकी इमेज बदल जाती है. कुछ हद तक यह सही भी है. एक बूट-पॉलिश करने वाला छोकरा भी जब सिनेमा-हाल में बैठता है तो अपनी कल्पना में हीरोइन, के साथ रोमांस लड़ा सकता है। मगर जब वही डिम्पल श्रीमती राजेश खन्ना बन जाती है तो उस छोकरे को रोमांस लड़ाने में (कल्पना में ही सही) तकलीफ होती है। एक समय था जब फिल्म में साधना का होना फिल्म की सफलता की गारंटी थी। जिस दिन साधना ने नैय्यर से शादी की। हजारों लोगों ने सर्द आहें भरी और अगले ही दिन वे साधना को भूल गये। तब साधना की फिल्में धड़ाधड़ फ्लॉप होने लगी। तो शादी के बाद हीरो की इमेज में कोई परिवर्तन आये या नही। हीरोइन की इमेज बदल जाती है। ऐसा अमेरिका में भी होता है। हॉलीवुड के निर्माता अपने सितारों की प्राइवेट जिन्दगी को जनता से एकदम छिपा कर रखते है। भारत में भी निर्माता नही चाहते कि फिल्म-निर्माण के दौरान किसी हीरोइन की शादी हो. इसीलिए कि शादी के बाद हीरोइन की डिमांड कम होने लगती है। हीरोइन इस कम्पलसरी रिटायरमेंट की बजाय स्वयं ही त्याग-पत्र दे देना अधिक सम्मान जनक समझती है।

केवल एक ही नैया ऐसी है जिसके सहारे हीरोइन बिना किसी खतरे के शादी की वैतरणी पार कर सकती है। वह यह नैया नई हीरोइनों में से किसी के पास नही है। मीना कुमारी, माला सिन्हा, नूतन पर समय अपना प्रभाव भले ही छोड़ गया. शादी ने कोई अन्तर नही डाला। उनका हथियार अभिनय था। जया भादुड़ी को मिलने वाली फिल्मों पर शादी और मातृत्व से कोई फर्क नही पड़ा। कारण यही कि जया किसी सैक्स-अपील या अंग-प्रदर्शन से नही अपने अभिनय के लिए प्रथम श्रेणी की हीरोइऩ गिनी जाती है। दूसरी और बेचारी रेखा को शादी करने के बाद भी अपनी शादी की घोषणा करने का साहस न पड़ा उन्हें डर था कि इस घोषणा से उसके अपने और विनोद मेहरा के करियर पर असर पड़ेगा इस ट्रेजडी का क्लाईमैक्स यह हैं कि रेखा ने शादी की घोषणा से पहले ही तलाक भी ले लिया।

अब हम आपको हीरोइन की शादी के बाद रिटारयमेंट का असली कारण (हमारी नजर में ) बताते हैं। इस इन्डस्ट्री में ऐसी आपाधापी फैली हुई है कि वहां कोई भी अपने आपको सुरक्षित महसूस नही करता चाहे कोई सुपर स्टार हो या सुपर-स्टारनो, सबको हौव्वा लगा रहता है कि जाने कब पांव तले से जमीन खिसक जाए आज सब आपके तलवे चाटते है तो कल को आप सड़क पर भी हो सकते है। हीरोइन भी उसका अपवाद नही। वह सुरक्षा के लिए अधिक-से-अधिक फिल्में अपने हाथ में रखना चाहती है। इसका परिणाम होता है डबल-शिफ्ट डबल-शिफ्ट में काम करते करते हीरोइन को फिल्मी-जीवन से घृणा हो जाती है, बोरडम आने लगती है। साथ ही कुछ फिल्मों में काम करने के बाद हीरोइन के लिए पैसे का महत्व नही रह जाता। पास में पचास लाख हो पचपन लाख हो जैसे ही उसकी शादी होती है, हीरोइन इसे फिल्में छोड़ने का ईश्वर-का-भेजा अवसर समझती है और चूकना नही चाहती।

हीरोइन को इंडस्ट्री में अपना स्थान बनाने के लिए वितरक, निर्माता, निर्देशक से लेकर हीरो तक से अनेक कटु समझौते करने पड़ते है। अक्सर देखा जाता है कि जब एक हीरोइन का स्थान बन जाता है तो वह उन्ही लोगों (जिन्होंने शुरू-शुरू में हीरोइन का गलत फायदा उठाया था।) से बदला भी लेती है। उन्हें नाक रगड़वा कर शूटिंग की डेट देती है। क्या फिल्म इंडस्ट्री का वातावरण इतना ही गंदा है कहीं-न-कही दाल में काला है जरुर क्या आपने नोट किया कि फिल्मी दुनिया के जमे हुए दिग्गज अपने घर-परिवार की महिलाओं को फिल्मी हंगामे से कितना दूर रखते है लीजिये कुछ उदाहरण सुनिये।


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Mayapuri

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